आधुनिक उर्दू गजल के मशहूर और मकबूल शायर डॉ. बशीर बद्र का आज दोपहर करीब 12 बजे इंतकाल हो गया। 91 वर्ष की उम्र में उन्होंने अंतिम सांस ली। उनके निधन की खबर आते ही अदबी हलकों और सोशल मीडिया पर शोक की लहर दौड़ गई। देशभर के साहित्यकार, शायर और उनके चाहने
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बताया जा रहा है कि बशीर बद्र लंबे समय से डिमेंशिया (Dementia) जैसी गंभीर बीमारी से जूझ रहे थे। बीमारी के चलते उनकी स्मरण शक्ति काफी हद तक कमजोर हो गई थी और वे लोगों को पहचानने में भी असमर्थ हो गए थे। पिछले कुछ समय से उनकी सेहत लगातार गिरती जा रही थी।

बशीर के साथ बेटे तैयब और उनकी पत्नी राहत।
अंतिम संस्कार का समय अभी तय नहीं
उनके अंतिम संस्कार का समय अभी तय नहीं हुआ है, लेकिन परिजनों के अनुसार आज शाम अस्र (Asr) के समय उनका अंतिम संस्कार किए जाने की संभावना है। बशीर बद्र का साहित्यिक सफर बेहद समृद्ध और प्रेरणादायक रहा है।
साल 1969 में उन्होंने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (एएमयू) से स्नातकोत्तर की उपाधि प्राप्त की। इसके बाद 12 अगस्त 1974 को उन्होंने मेरठ कॉलेज के उर्दू विभाग में बतौर लेक्चरर ज्वाइन किया और वर्ष 1990 तक वहां अपनी सेवाएं दीं।
वर्ष 1974 से 1990 के बीच का दौर उनके जीवन का स्वर्णिम काल माना जाता है। इस दौरान उनकी शायरी ने नई ऊंचाइयों को छुआ और वे देश-विदेश में पहचान बनाने में कामयाब रहे। उनकी गजलों की सादगी, गहराई और आम बोलचाल की भाषा ने उन्हें आम लोगों के दिलों तक पहुंचाया।
बशीर बद्र की शायरी में मोहब्बत, दर्द और ज़िंदगी के अनुभवों की झलक मिलती है। उनके कई शेर आज भी लोगों की जुबां पर हैं और मुशायरों की जान बने रहते हैं।
बता दें साल 1969 में बशीर बद्र ने एएमयू से स्नातकोत्तर की उपाधि भी ली थी। शायर बशीर बद्र ने मेरठ कॉलेज के उर्दू विभाग में 12 अगस्त 1974 को बतौर लेक्चरर ज्वाइन कर लिया था। वे यहां वर्ष 1990 तक रहे। वर्ष 1974-1990 का दौर बशीर बद्र के लिए काफी अहम रहा। तब वे शायरी के बुलंदी को छू रहे थे।
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बच्चे की तरह चहक उठे बशीर बद्र
अलहदा लहजे के शायर एवं पद्मश्री बशीर बद्र को अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (एएमयू) से 46 साल बाद पीएचडी की डिग्री मिली है। डिग्री मिलने पर किसी मासूम की तरह चहक उठे। डिग्री को सीने से लगा लिया। बशीर बद्र की सेहत इन दिनों काफी नासाज है। वे अपनी स्मरण शक्ति खो चुके है। पढ़ें पूरी खबर…