38 साल पुराने अपहरण-दुष्कर्म मामले में आरोपी बरी:कोर्ट ने कहा- पीड़िता बालिग थी सहमति की संभावना से इंकार


इलाहाबाद हाई कोर्ट ने मेरठ के 1986 के एक दुष्कर्म मामले में सजा पाए सुभाष को बरी कर दिया है। न्यायमूर्ति अब्दुल शाहिद की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अपील पांचवें अपर सत्र न्यायाधीश, मेरठ के 26 सितंबर 1988 के फैसले के खिलाफ थी। सत्र परीक्षण में सुभाष को भारतीय दंड संहिता की धारा 363, 366 और 376 के तहत दोषी ठहराया गया था। मामला थाना ट्रांसपोर्ट नगर, मेरठ का है। जानिये क्या है मामला अभियोजन के अनुसार 25 फरवरी 1986 को सुभाष और उसके पिता शेरा पीड़िता को बहन की बीमारी का बहाना बनाकर घर से ले गए। रिपोर्ट अगले दिन 26 फरवरी को दर्ज हुई। पीड़िता 11 मार्च 1986 को बरामद हुई। निचली अदालत ने शेरा को बरी कर दिया था, जबकि सुभाष को सजा दी थी।एक्स-रे रिपोर्ट के आधार पर पीड़िता की उम्र 19 वर्ष से अधिक पाई गई। गवाही के समय (23.जून.1988) उसने खुद अपनी उम्र करीब 25 वर्ष बताई। रिपोर्ट में तारीख की गलती (12.मार्च.1985 की जगह 12.मार्च.1986) को अदालत ने डॉक्टर के स्पष्टीकरण के बाद मानवीय भूल माना। शरीर पर कोई चोट नहीं मिली। डॉ. मंजू अग्रवाल गवाह ने बलात्कार के बारे में निश्चित राय देने से इन्कार किया, क्योंकि पीड़िता यौन संबंधों की अभ्यस्त पाई गई। कोर्ट ने उठाए सवाल अदालत ने कहा कि वह कई जिलों में ट्रेन और बस से घूमी, बस अड्डों और रेलवे स्टेशनों जैसी भीड़ वाली जगहों से गुजरी, फोटो खिंचवाए और कागजों पर अंगूठे के निशान लगाए। गन्ने के खेत में दो दिन-रात रहने के दौरान आरोपी के सोने और दोनों के अलग-अलग शौच जाने के बावजूद उसने न शोर मचाया, न भागने की कोशिश की। अदालत ने इन परिस्थितियों को सहमति की ओर संकेत करने वाला माना। विश्वसनीय गवाही नहीं मान सकते हाईकोर्ट ने कहा कि पीड़िता की गवाही को ऐसी विश्वसनीय गवाही नहीं माना जा सकता, जिस पर अकेले सजा दी जा सके। चाय विक्रेता कृष्णा देवी गवाह ने आरोपी और पीड़िता को पहचानने से इन्कार कर दिया और पक्षद्रोही घोषित हुईं। बरामदगी के समय कोई स्वतंत्र गवाह नहीं था और बरामदगी ज्ञापन में स्थान व समय दर्ज नहीं थे, इसलिए बरामदगी को संदिग्ध माना गया। पीड़िता के पिता ने स्वीकार किया कि उन्हें उसी दिन पता चल गया था, फिर भी रिपोर्ट अगले दिन लिखाई गई। अदालत ने आरोपी और उसके पिता को झूठा फंसाए जाने के तर्क में बल पाया। अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष संदेह से परे आरोप साबित करने में विफल रहा। पूरी कहानी में गंभीर विसंगतियां हैं, जिसे न मेडिकल साक्ष्य का समर्थन मिलता है और न मौखिक साक्ष्य का। निचली अदालत के निष्कर्षों को विकृत मानते हुए 1988 का फैसला रद्द कर अपील स्वीकार कर ली गई। अपीलकर्ता जमानत पर है, इसलिए उसे आत्मसमर्पण नहीं करना होगा। उसके जमानती बंधपत्र रद्द कर जमानतदार उन्मुक्त कर दिए गए हैं।

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