पत्नी ने नौकरी छिपाई, भरण-पोषण का आदेश रद्द:बागपन के मामले में हाईकोर्ट ने 5 हजार रुपये हर माह का आदेश रोका


इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बागपत की फैमिली कोर्ट द्वारा पत्नी को दिए गए 5,000 रूपये प्रतिमाह के भरण-पोषण के आदेश को रद्द कर दिया है। पत्नी नौकरी कर रही थी और यह तथ्य छिपा कर भरण-पोषण मांगा था। न्यायमूर्ति अब्दुल शाहिद ने मनोज कुमार राना की पुनरीक्षण याचिका स्वीकार करते हुए यह फैसला सुनाया। जानिये क्या है मामला मनोज कुमार राना का विवाह 15 मार्च 2021 को प्रिती (प्रीति पुंडीर) से हिंदू रीति-रिवाज से हुआ था। प्रिती ने धारा 125 सीआरपीसी के तहत 20,000 रूपये प्रतिमाह भरण-पोषण की मांग की थी। बागपत की प्रधान न्यायाधीश, फैमिली कोर्ट ने 6 सितंबर 2024 को 5,000 रूपये प्रतिमाह गुजारा भत्ता देने का आदेश दिया था। इसके खिलाफ पति ने हाईकोर्ट में पुनरीक्षण याचिका दायर की थी। पति का कहना था कि पत्नी नोएडा की निम्बस एडकॉम प्राइवेट लिमिटेड में सेल्स मैनेजर के पद पर कार्यरत है और करीब 40,000 रूपये प्रतिमाह कमाती है। उसने यह भी कहा कि पत्नी स्वतंत्र रहना चाहती है और उसने पति व उसके भाई के खिलाफ नोएडा में झूठी एफआईआर दर्ज कराई। पति ने बताया कि कोविड लॉकडाउन में उसकी नौकरी छूट गई थी और वह बेरोजगार है। कम दहेज से नाखुश थे पत्नी ने दहेज उत्पीड़न का आरोप लगाया। उसके अनुसार विवाह में करीब 10 लाख खर्च हुए, लेकिन ससुराल पक्ष कम दहेज से नाखुश था। उसने कहा कि वह 2017 से 2022 तक नौकरी में थी और 30 जून 2022 को इस्तीफा दे दिया। इस्तीफे के समर्थन में उसने 1 जुलाई 2022 का कंपनी का रिलीविंग पत्र पेश किया। कोर्ट ने पत्नी के बयान को अलग पाया हाईकोर्ट ने पत्नी के बयानों और दस्तावेजों में कई विरोधाभास पाए:ट्रायल कोर्ट में पत्नी ने कहा कि उसने शादी के 5-6 महीने बाद नौकरी छोड़ी, जबकि उसके अपने रिलीविंग पत्र के अनुसार उसने 30 जून 2022 तक काम किया।जिरह में उसने कहा कि उसने “नौकरी छोड़ी, पर इस्तीफा नहीं दिया” और इस्तीफे वाले पत्र पर अपने हस्ताक्षर से इन्कार किया। पति द्वारा दाखिल दस्तावेजों में कंपनी की ओर से 20 नवंबर 2022 की जन्मदिन की शुभकामनाएं, 16 अगस्त 2025 को 8 वर्ष पूरे होने पर बधाई पत्र थे। कोर्ट ने कहा कि इससे साबित होता है कि वह इस्तीफे की तारीख के बाद भी कंपनी में सेल्स मैनेजर के रूप में कार्यरत है। पत्नी का 13 नवंबर 2021 का एक पत्र भी रिकॉर्ड में आया, जिसमें उसने कहा था कि वह पति के साथ नहीं रहना चाहती और तलाक चाहती है। ट्रायल कोर्ट और हाईकोर्ट दोनों से तथ्य छिपाया कोर्ट ने कहा कि न्यायालय में आने वाले पक्षकार को स्वच्छ हृदय और साफ उद्देश्य के साथ आना चाहिए, और महत्वपूर्ण तथ्यों को छिपाने वाले का मामला गुण-दोष पर विचार योग्य नहीं रहता। कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि पत्नी ने अपनी नौकरी और आय जैसा महत्वपूर्ण तथ्य ट्रायल कोर्ट और हाईकोर्ट दोनों से छिपाया। उसका आचरण साफ हाथों और ईमानदार नीयत से न्यायिक प्रक्रिया शुरू करने वाले व्यक्ति जैसा नहीं है। इसी आधार पर कोर्ट ने माना कि वह पति से किसी भरण-पोषण की हकदार नहीं है। फैमिली कोर्ट का 6 सितंबर 2024 का आदेश रद्द कर दिया गया और पुनरीक्षण याचिका स्वीकार कर ली गई।

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