सुप्रीम कोर्ट की सलाह- युवा वकील सीनियर्स से ट्रेनिंग लें:उनके बिना पेशे की बारीकियां नहीं जान सकते, कोर्ट में क्या नहीं बोलना यह भी सीखेंगे


सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को युवा वकीलों से कहा कि सीनियरों के साथ ट्रेनिंग के बिना वे पेशे की बारीकियां नहीं सीख पाएंगे। जस्टिस बीवी नागरत्ना और ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की बेंच ने कहा कि युवा वकीलों को कोर्ट में क्या बोलना है और क्या नहीं, यह पता होना चाहिए। जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि कुछ युवा बिना ट्रेनिंग सीधे अपना ऑफिस शुरू कर रहे हैं। यह बिल्कुल सही नहीं है। सीनियरों के साथ काम करने से ही वकालत के असली कौशल और पेशे के तौर-तरीके सीखे जा सकते हैं। ये टिप्पणियां बॉम्बे हाईकोर्ट के एक आदेश से जुड़ी याचिका पर सुनवाई के दौरान की गईं। सीनियरों से सीखने की सलाह जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि युवा वकीलों को सीनियरों के पास जाना चाहिए। सीनियर उन्हें सही दिशा दिखाएंगे। उन्होंने कहा, “हम जानते हैं कि आजकल युवा महत्वाकांक्षी हैं। लेकिन सीनियरों के साथ ट्रेनिंग के बिना वे पेशे की बारीकियां नहीं सीख पाएंगे।” उन्होंने कहा कि यह प्रक्रिया पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलती आ रही है। सम्मानित पेशे की बारीकियां और अच्छी कार्यप्रणालियां इसी तरह आगे बढ़ती हैं। डिग्री और ऑफिस के बाद जरूरी कौशल बेंच ने कहा कि युवा वकील डिग्री हासिल करने के बाद जल्द ही अपना ऑफिस शुरू कर रहे हैं। बेंच ने कहा, “लेकिन सॉफ्ट स्किल्स कहां हैं? आपके पास हार्डवेयर हो सकता है, लेकिन सॉफ्ट स्किल्स हर दिन विकसित करनी पड़ती हैं।” बेंच ने कहा कि युवा वकीलों को सीनियरों से सीखना चाहिए। उन्हें कोर्ट में बैठकर कार्यवाही भी देखनी चाहिए। बेंच ने कहा, “हमें बार और बार के भविष्य की चिंता है।” जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि कोर्ट की कार्यवाही देखकर युवा वकील समझ सकते हैं कि कौन-सी गलतियां नहीं करनी चाहिए। जस्टिस नागरत्ना ने अपने शुरुआती दिन याद किए जस्टिस नागरत्ना ने वकील के रूप में अपने शुरुआती दिनों को याद किया। उन्होंने कहा, “पहले हम सभी अपने सीनियरों के साथ ट्रेनिंग लेते थे। इसके बाद अपना ऑफिस शुरू करते थे और धीरे-धीरे आगे बढ़ते थे।” उन्होंने कहा कि जब वे युवा थीं, तब उनके पास कभी-कभार सिर्फ एक मामला या एक मेंशनिंग होती थी। उन्होंने कहा कि इसके बाद वे कुछ कोर्ट हॉल में जाकर बैठती थीं। खासकर, वे कठिन जजों की अदालतों में बैठती थीं। जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि ऐसा करने से वे जजों के सख्त रवैये की अभ्यस्त हो जाती थीं। अगली बार वहां मामला आने पर उन्हें पहले से पता होता था कि जज को देखकर कैसे जवाब देना है और क्या कहना है।

Source link

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *