लखनऊ में शायर बशीर बद्र को श्रद्धांजलि:यूपी प्रेस क्लब में हुई सभा, कई हस्तियां शामिल


लखनऊ के यूपी प्रेस क्लब, कैसरबाग में रविवार को मशहूर शायर बशीर बद्र की याद में एक श्रद्धांजलि सभा आयोजित की गई। ‘इत्तेहाद-ए-मिल्लत’ के सहयोग से हुए इस कार्यक्रम में साहित्य, राजनीति और समाज से जुड़े कई प्रमुख लोगों ने भाग लिया।वक्ताओं ने बशीर बद्र को उर्दू साहित्य का एक बड़ा नाम बताते हुए उनके साहित्यिक योगदान को याद किया। पूर्व कैबिनेट मंत्री अम्मार रिजवी ने सभा को संबोधित करते हुए कहा कि बशीर बद्र केवल एक शायर नहीं थे, बल्कि वे प्रेम और इंसानियत की आवाज थे। उनके शेर लोगों के दिलों को जोड़ने का काम करते थे। रिजवी ने आगे कहा कि साहित्य जगत को बशीर बद्र की कमी हमेशा महसूस होगी। आम आदमी की भावनाओं को अपनी शायरी में पिरोया सिराज मेंहदी ने उल्लेख किया कि बशीर बद्र ने आम आदमी की भावनाओं को अपनी शायरी में पिरोया। उनकी गजलें आज भी लोगों के दिलों में बसी हुई हैं। सर्वेश अस्थाना ने उनकी सादगी और रचनाओं की गहराई की सराहना करते हुए कहा कि उनकी कृतियाँ आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा बनी रहेंगी। कार्यक्रम के दौरान वक्ताओं ने बशीर बद्र के कई चर्चित शेर भी सुनाए। इनमें से एक था: ‘उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो, न जाने किस गली में जिंदगी की शाम हो जाए।’ इस शेर को सुनते ही सभागार तालियों से गूंज उठा। वक्ताओं ने बताया कि उनकी शायरी जीवन की सच्चाइयों को बेहद सरल शब्दों में व्यक्त करती थी। उनका हर शेर जीवन का संदेश रमेश दीक्षित ने इस बात पर जोर दिया कि बशीर बद्र ने हमेशा गंगा-जमुनी तहजीब को मजबूत किया। इकराम अली और सोयाब खान ने कहा कि उनका हर शेर जीवन का कोई न कोई संदेश देता है।सभा में उनकी एक और मशहूर पंक्ति को भी याद किया गया: ‘कोई हाथ भी न मिलाएगा जो गले मिलोगे तपाक से, ये नए मिजाज का शहर है, जरा फासले से मिला करो।’मोहम्मद और नासिर सहित अन्य उपस्थित लोगों ने भी शायर को श्रद्धासुमन अर्पित किए।

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