यहूदी जड़ों की तलाश में केरल के सीरियन ईसाई:डीएनए जांच से खोज रहे पूर्वजों का इतिहास,BHU के वैज्ञानिक शोध में शामिल


केरल के कुन्नमकुलम-एर्णाकुलम क्षेत्र के सीरियन ईसाई समुदाय में अपने संभावित यहूदी पूर्वजों की जड़ों को जानने की उत्सुकता बढ़ रही है। इसी क्रम में काशी हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) और हैदराबाद स्थित डीएनए फिंगरप्रिंटिंग एवं निदान केंद्र (सीडीएफडी) के वैज्ञानिकों ने समुदाय के 100 से अधिक लोगों के डीएनए नमूने एकत्र किए हैं, जिनका वैज्ञानिक विश्लेषण किया जाएगा। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद और विशेषकर 1948 में इजरायल की स्थापना के पश्चात केरल के अधिकांश कोचीन (मालाबार) यहूदी परिवार इजरायल चले गए थे। वर्तमान में कोच्चि और आसपास के क्षेत्रों में केवल कुछ ही यहूदी परिवार शेष हैं। ऐसे में सीरियन ईसाई समुदाय के कुछ लोग अपनी मौखिक परंपराओं, पारिवारिक इतिहास और सांस्कृतिक रीति-रिवाजों के आधार पर यहूदी या मध्यपूर्वी मूल से संबंध होने का दावा करते रहे हैं। BHU के वैज्ञानिक भी शोध में शामिल इसी विषय पर 23 मई को कुन्नमकुलम स्थित अरथाट बिशप हाउस में ‘डायस्पोरा’ विषयक एक दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी आयोजित की गई। संगोष्ठी में बीएचयू के प्राणी विज्ञान विभाग के जीन विज्ञानी प्रो. ज्ञानेश्वर चौबे के नेतृत्व में वैज्ञानिकों की टीम ने भाग लिया। टीम में आमला इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज, त्रिशूर की प्रो. डॉ. मिनी कारियप्पा, सीडीएफडी हैदराबाद के डॉ. प्रज्ज्वल प्रताप सिंह और शैलेश देसाई भी शामिल थे। यहूदी की पहचान पर इजरायल में गये हजारों लोग प्रो. ज्ञानेश्वर चौबे ने बताया कि शोध का उद्देश्य किसी दावे की पुष्टि या खंडन करना नहीं, बल्कि भारत की विविध आबादियों के प्रवासन इतिहास, आनुवंशिक संबंधों और सांस्कृतिक विरासत को वैज्ञानिक दृष्टि से समझना है। उन्होंने कहा हालांकि समुदाय में बढ़ती इस वैज्ञानिक पहल ने देश के अन्य हिस्सों में भी चर्चा को जन्म दिया है। उल्लेखनीय है कि मणिपुर और मिजोरम के बनेई मेनाशे समुदाय के हजारों लोग पिछले तीन दशकों में अपनी यहूदी पहचान के आधार पर इजरायल जाकर बस चुके हैं।

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