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मथुरा में मोहर्रम की आठवीं तारीख पर हजरत इमाम हुसैन और कर्बला के शहीदों की याद में पारंपरिक दुल-दुल का जुलूस निकाला गया। बुधवार देर रात बैरागपुरा स्थित विशायती खिड़की इमामबाड़े से शुरू हुआ यह जुलूस गुरुवार सुबह करीब 5 बजे ठेक नारनोर पर जाकर संपन्न हुआ। जुलूस में बड़ी संख्या में अकीदतमंद शामिल हुए और मातम कर इमाम हुसैन को श्रद्धांजलि दी। मोहर्रम कमेटी के तत्वावधान में निकाले गए जुलूस का नेतृत्व जाकिर खान ने किया। इस दौरान अलमदारों और अखाड़ेदारों ने भी अपनी भागीदारी निभाई। जुलूस के दौरान मजलिस-ए-हुसैन का आयोजन किया गया, जिसमें जाकिरों ने कसीदे पढ़े और कर्बला की घटना का वर्णन किया। वक्ताओं ने कहा कि हजरत इमाम हुसैन और उनके 72 साथियों ने सत्य, न्याय और इंसानियत की रक्षा के लिए अपनी जान कुर्बान कर दी थी। उनके बलिदान का संदेश आज भी समाज को अन्याय के खिलाफ खड़े होने की प्रेरणा देता है। गमगीन माहौल में युवाओं ने जंजीरों से मातम कर अपनी अकीदत पेश की। जगह-जगह लगीं सबीलें और लंगर जुलूस मार्ग पर विभिन्न स्थानों पर ठंडे शरबत, दूध, खीर, पूरी, हलवा और लंगर की व्यवस्था की गई थी। बड़ी संख्या में लोगों ने सबीलों और लंगर में हिस्सा लेकर सेवा कार्यों में सहयोग किया। मोहर्रम कमेटी के पदाधिकारी और समाज के वरिष्ठ लोग पूरे मार्ग में व्यवस्थाओं की निगरानी करते रहे। इन मार्गों से होकर गुजरा जुलूस दुल-दुल का जुलूस विशायती खिड़की इमामबाड़े से शुरू होकर बैरागपुरा, कच्ची सड़क, हालनगंज, तेलीपाड़ा, चौक बाजार, कुशक गली, नक्कारची टीला, घीया मंडी, भरतपुर गेट, मछली मार्केट, मनोहरपुरा, भार्गव गली, मटिया गेट, बरवारपाड़ा, डींग गेट, नई बस्ती, शाही ईदगाह मस्जिद और मंडी रामदास होते हुए ठेक नारनोर पहुंचा। त्याग और मानवता का संदेश देता है मोहर्रम कार्यक्रम संयोजक मोहम्मद दिलशाद ने बताया कि मोहर्रम के महीने में चांद की सातवीं तारीख तक अलम के जुलूस निकाले गए थे। आठवीं तारीख को दुल-दुल का जुलूस निकालकर हजरत इमाम हुसैन और उनके साथियों की शहादत को याद किया गया। उन्होंने कहा कि मोहर्रम त्याग, सेवा और मानवता का संदेश देता है, जिसमें जरूरतमंदों की मदद, लंगर और इबादत का विशेष महत्व है।
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मथुरा में निकला दुल-दुल का जुलूस:इमाम हुसैन को लोगों ने किया याद, जगह-जगह लगीं सबीलें और लंगर