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बंगाल ने तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के ‘बंगाली अस्मिता’ नैरेटिव के मुकाबले पीएम नरेंद्र मोदी के ‘डबल इंजन’ के वादे को चुना। कमल की आंधी में तृणमूल बिल्कुल तिनकों की तरह ही उड़ गई। भाजपा लंबे समय से संगठन के स्तर पर तैयारी में जुटी थी। पोलिंग एजेंट चुनने के लिए भी मौखिक और लिखित परीक्षाएं तक ली गई थीं। पिछले छह महीने से पार्टी का ध्यान दो लक्ष्यों के साथ जमीनी नेटवर्क पर रहा। पहला, ग्रामीण इलाकों में डर के माहौल का मुकाबला और सुनिश्चित करना कि वोटर पोलिंग बूथ तक पहुंचे। ग्राउंड पर तमाम प्रयासों का नतीजा ये रहा कि भाजपा अपने साथ नए वोटर्स को जोड़ने में सफल रही। पिछले चुनाव में टीएमसी का वोट शेयर 48.5% था, जो इस बार 40.80% रह गया। वहीं, भाजपा 38.4% से बढ़कर 45.85% वोट पर पहुंच गई। इसके पीछे हिंदू वोटों का ध्रुवीकरण बड़ा कारण है। हालांकि, सिर्फ ध्रुवीकरण ही इकलौती वजह नहीं है। रोजगार की कमी, पलायन, औद्योगिक ठहराव, पंचायत स्तर की दादागिरी और स्थानीय टीएमसी कैडर से नाराजगी निर्णायक रही। पश्चिमी औद्योगिक पट्टी आसनसोल, दुर्गापुर और बैरकपुर जैसे इलाकों में भाजपा ने बंद मिलों, नौकरी, लॉजिस्टिक्स हब और सिंडिकेट राज के खिलाफ अभियान चलाया। हर क्षेत्र में अलग रणनीति, कहीं ध्रुवीकरण तो कहीं रोजगार मुद्दा बंगाल का राजनीतिक भूगोल बदल गया। 2021 में भाजपा उत्तर बंगाल, जंगलमहल और मतुआ बेल्ट में सिमटी थी। इस बार टीएमसी के गढ़ दक्षिण बंगाल में भी भगवा रंग में रंग गए। भाजपा ने हर क्षेत्र की अलग रणनीति बनाई। टीएमसी के गढ़ दक्षिण बंगाल में एंटी इंकंबेंसी, ध्रुवीकरण और गुंडागर्दी का मुद्दा उठाया। प्रेसीडेंसी में सीटें 14 से 27 तक पहुंच गईं। उत्तर बंगाल में चाय-बागान मजदूर और राजबंशी समुदाय साधा। जंगलमहल में आवास-पानी, राष्ट्रपति के अपमान जैसे मुद्दों से टीएमसी को पीछे धकेला। टीएमसी अल्पसंख्यक बेल्ट में टूटी करीब 115 सीटें मुस्लिम बहुल हैं। इनमें से 69 पर टीएमसी जीती। करीब 39 सीटें भाजपा के खाते में गईं। मुस्लिम-सेक्युलर वोट टीएमसी के पक्ष में एकजुट माने जाते रहे हैं। पर, इस बार स्थिति अलग दिखी। मालदा की 12 में से 6 और उत्तर दिनाजपुर की 9 में से 4 भाजपा के खाते में गई। इससे टीएमसी की ‘अभेद्य अल्पसंख्यक बेल्ट’ का भरोसा कमजोर हुआ। मुर्शिदाबाद जैसे कोर मुस्लिम जिलों में टीएमसी का दबदबा अभी बचा है। यहां की 22 सीटों में से टीएमसी 9 और भाजपा 8 सीटें जीती। भाजपा की असली बढ़त चार बड़े इलाकों से आई। जंगलमहल-आदिवासी बेल्ट में 40 में से करीब 36 सीटें निकालकर टीएमसी की 2021 वाली वापसी को पलट दिया। उत्तर 24 परगना में भाजपा 33 में से 18 सीटों पर पहुंची। हुगली में भाजपा ने 18 में से 16 सीटें जीत टीएमसी के दक्षिण बंगाल किले को भी झटका दिया है। नदिया में भाजपा 17 में से 14 सीटों पर विजयी रही। यहां मतुआ-नामशूद्र और सीमावर्ती हिंदू वोट निर्णायक रहे। माटीगाड़ा-नक्सलबाड़ी सीट पर भाजपा के आनंदमय बर्मन ने टीएमसी के शंकर मालाकार को 1,04,265 वोटों से हराया। राज्य में जीत का सबसे बड़ा अंतर है। लोकल नेताओं को तवज्जो, पुराने लोगों को पद देकर मैदान में उतारा भाजपा ने बंगाल में सिर्फ दिल्ली मॉडल नहीं चलाया। पुराने और वरिष्ठ नेताओं को तवज्जो दी। वाजपेयी-आडवाणी के दौर से जुड़े रहे शमिक भट्टाचार्य प्रदेशाध्यक्ष बनाए। सुवेंदु ग्रामीण बंगाल में चेहरा रहे। वहीं, भट्टाचार्य ने कोलकाता और उपनगरीय बंगाल के ‘भद्रलोक’ को जोड़ा। पूर्व प्रदेशाध्यक्ष दिलीप घोष को सक्रिय किया। राहुल सिन्हा राज्यसभा सांसद बनाए। पीएम मोदी ने एक रैली में घोष से लेकर पूर्व राज्यपाल तथागत रॉय तक बंगाल के वरिष्ठ नेताओं को मंच पर बुला अभिनंदन किया। ईडी 7 मामलों की जांच कर रही है, इन पर कार्रवाई तेज हो सकती है भ्रष्टाचार संबंधी मामले नई सरकार की प्राथमिकता हो सकते हैं। शिक्षक भर्ती, नगरपालिका भर्ती, राशन घोटाला, कोयला तस्करी, मवेशी तस्करी और संदेशखाली सहित कम से कम सात मामलों की जांच ईडी कर रही है। इन पर कार्रवाई में तेजी आ सकती है। पुरानी फाइलों की पड़ताल भी शुरू हो सकती है। दूसरी तरफ, राज्य सरकार के समक्ष सातवां वेतन आयोग लागू करना, तीन हजार रुपए मासिक नकद सहायता और डीए देने जैसे वादों पर अमल की चुनौती भी रहेगी। ———————————– ये खबर भी पढ़ें… 49 साल में पहली बार देश में लेफ्ट सरकार नहीं:1957 में केरलम में नंबूदरीपाद ने सत्ता दिलवाई; 2026 में केरलम से ही खत्म केरलम विधानसभा चुनाव में पिनराई विजयन की अगुवाई वाले लेफ्ट एलायंस LDF को हार का सामना करना पड़ा है। कांग्रेस की अगुवाई वाली UDF ने 140 में से 90 से ज्यादा सीटें जीतकर 10 साल बाद सत्ता में वापसी कर ली है। पूरी खबर पढ़ें…
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भाजपा ने पोलिंग एजेंट भी परीक्षा लेकर बनाए:कुछ पॉकेट्स से निकल भाजपा पूरे प्रदेश में छाई; जनता ने ‘बंगाली अस्मिता’ की जगह ‘डबल इंजन’ चुना