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इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने कर्ज की गारंटी देने वालों के लिए एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि ऋण चुकाने में चूक होने पर बैंक को पहले मुख्य कर्जदार से ही रकम वसूलने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता। बैंक अपनी बकाया राशि की वसूली कर्जदार और गारंटर दोनों से एक साथ कर सकता है। न्यायमूर्ति शेखर बी सराफ और न्यायमूर्ति एके चौधरी की खंडपीठ ने यह फैसला विनीत पांडेय और अनूप कुमार मिश्रा की दो अलग-अलग याचिकाओं को खारिज करते हुए सुनाया। इन दोनों याचिकाकर्ताओं ने अपने सहकर्मी विक्रांत दूबे द्वारा लिए गए ऋण की गारंटी दी थी। विक्रांत दूबे ने वर्ष 2022-23 में यूपी पोस्टल प्राइमरी कोऑपरेटिव बैंक से कुल 21.5 लाख रुपये के विभिन्न ऋण लिए थे, जिनमें 50 हजार रुपये का फेस्टिवल लोन, तीन लाख रुपये का शॉर्ट टर्म लोन और 18 लाख रुपये का व्यक्तिगत ऋण शामिल था। ऋण की अदायगी में चूक होने पर बैंक ने वसूली प्रक्रिया शुरू की और डाक विभाग को दोनों गारंटरों के वेतन से हर महीने 10-10 हजार रुपये काटकर बैंक में जमा कराने का निर्देश दिया। गारंटरों ने इस कार्रवाई का विरोध करते हुए तर्क दिया था कि बैंक को पहले मुख्य कर्जदार से बकाया वसूलना चाहिए। उनके अनुसार, मुख्य कर्जदार से वसूली के बाद भी यदि कोई रकम शेष रह जाए, तभी गारंटर के खिलाफ कार्रवाई की जा सकती है। हालांकि, हाईकोर्ट ने गारंटरों के इस तर्क को स्वीकार नहीं किया। कोर्ट ने भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 128 का हवाला देते हुए कहा कि सामान्य परिस्थितियों में गारंटर की देनदारी मुख्य कर्जदार के बराबर होती है। इसलिए, बैंक को पहले कर्जदार के खिलाफ कार्रवाई करने की कोई कानूनी बाध्यता नहीं है। खंडपीठ ने यह भी कहा कि यदि गारंटी अनुबंध में गारंटर की देनदारी को सीमित करने या उसे बाद के चरण के लिए निर्धारित करने वाली कोई विशेष शर्त नहीं है, तो बैंक कर्जदार और गारंटर दोनों से एक साथ वसूली कर सकता है। चूंकि इस मामले में गारंटी अनुबंध में ऐसी कोई शर्त नहीं थी, इसलिए बैंक द्वारा गारंटरों के वेतन से प्रतिमाह 10 हजार रुपये की कटौती कर ऋण की वसूली की कार्रवाई को न्यायालय ने वैध माना और दोनों याचिकाएं खारिज कर दीं।
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बैंक कर्जदार-गारंटर दोनों से एक साथ कर सकता है वसूली:हाईकोर्ट ने कहा- पहले मुख्य कर्जदार से वसूली जरूरी नहीं