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किसी ने कहा, बच्चों को चीनी-पानी पिलाकर पालते हैं, तो किसी ने कहा कि दिन में एक टाइम खाना बना पाते हैं। कई बार भूखे सोना पड़ता है। काम बंद हो जाता है, घर में सिर से ऊपर पानी घुस जाता है। हम या तो रिश्तेदारों के घर रहते हैं या खुले मैदान में सोना पड़ता है। ये कहानी सिर्फ एक मां की नहीं है। सैकड़ों मांएं बारिश के इस मौसम में इसी परिस्थिति से गुजरती हैं। गंगा में जलस्तर बढ़ने से वरुणा में पलट प्रवाह शुरू हो चुका है। वरुणा का जलस्तर तेजी से बढ़ रहा है। वरुणा के आसपास के सैकड़ों मकानों में पानी घुसना शुरू हो चुका है। इसी के साथ सैकड़ों परिवारों का संघर्ष शुरू हो चुका है। सलारपुर प्राथमिक विद्यालय में 4, सरैया राहत शिविर में 34 तथा सिटी गर्ल्स स्कूल और बड़ी बाजार स्कूल के राहत शिविरों में 37 लोगों ने शरण ली है। इनमें 25 बच्चे और दो बुजुर्ग शामिल हैं। 40 से अधिक परिवार किराये के कमरों या रिश्तेदारों के घरों में रह रहे हैं। देखें तस्वीरें बच्चों को चीनी-पानी पिलाकर पालती हूं वरुणा किनारे नक्खीघाट इलाके में रहने वाली सबनम ने बताया कि पानी भरने के बाद घर में रहना मुश्किल हो जाता है। घर छोड़कर ऊंचे मैदान में जाना पड़ता है। प्लास्टिक का टेंट लगाकर पानी उतरने तक वहीं गुजर-बसर करते हैं। उन्होंने बताया कि घर में छोटे-छोटे बच्चे हैं। उधार लेकर किसी तरह गुजारा करते हैं। कई बार दो-दो दिन खाना नहीं बन पाता। ऐसे में बच्चों को चीनी-पानी पिलाकर पालना पड़ता है। पानी उतरने के बाद घर लौटते हैं तो पूरी सफाई करनी पड़ती है। घर का सामान धोना और खराब सामान फेंकना पड़ता है। उधार लेकर घर चलाना पड़ता है। एक टाइम ही चूल्हा जलता है एक पीड़ित महिला ने बताया कि पानी भरने के बाद दिनभर चूल्हा नहीं जलता। शाम को खाना बनाते हैं और उसी से सुबह भी काम चलाते हैं। बाढ़ बढ़ने के कारण छोटे बच्चों को भी परेशानी होती है। स्कूल में पानी भर जाने से बच्चों की पढ़ाई भी बंद हो जाती है। उन्होंने बताया कि घर में पानी भरने के बाद दूसरे के घर में रहना पड़ता है। एक-दो महीने तक यही स्थिति बनी रहती है। छह बच्चों को पालना और ऐसे समय में घर चलाना बहुत मुश्किल हो जाता है। कारोबार भी बंद हो जाता है। रात में सो नहीं पाती, डर लगता है घर डूब जाएगा नाजमा बेगम ने बताया कि वह गरीब परिवार से हैं। बाढ़ आने पर घर छोड़कर कहां जाएं, यह सबसे बड़ी परेशानी होती है। उनके पैर में चोट है। बाढ़ के समय लोग उन्हें टांगकर बाहर ले जाते हैं। रात-रात भर नींद नहीं आती। डर लगा रहता है कि कब पानी बढ़ जाए और पूरा घर डूब जाए। गंदगी से बच्चों की तबीयत खराब, बीमारी बढ़ती है बाढ़ का पानी उतरने के बाद भी परेशानी खत्म नहीं होती। घरों और आसपास गंदगी जमा हो जाती है। सबनम ने बताया कि गंदगी के कारण बच्चों की तबीयत खराब होती है। खांसी, सर्दी-जुकाम आम बात हो जाती है। पानी कम होने के बाद घर में लौटकर पूरी गंदगी साफ करनी पड़ती है। नाजमा बेगम ने भी बताया कि तबीयत ज्यादा खराब होने पर लोगों की मदद से अस्पताल ले जाना पड़ता है। पानी बढ़ने से घर का सामान भी खराब हो जाता है। कई दिनों तक बिजली नहीं आती है। पीने का पानी नहीं मिलता है। पानी भरते ही कारोबार ठप, बचत से चलता है घर बाढ़ का असर परिवारों की कमाई पर भी पड़ रहा है। साड़ी बुनाई का काम करने वाले नाजिर खान ने बताया कि पानी भरने के बाद मकान खाली करके दूसरे के घर में रहना पड़ता है। घर में पानी आने के साथ साड़ी का कारोबार पूरी तरह बंद हो जाता है। उन्होंने बताया कि आम दिनों में एक साड़ी पर करीब 2 हजार रुपए तक का मुनाफा होता है, लेकिन बाढ़ में काम बंद हो जाता है। लोग घर छोड़कर जा रहे हैं और ऐसे में कोई काम नहीं हो पाता। दिन में मजदूरी, रात में जागकर घर की रखवाली जमाल अहमद ने बताया कि वह बनारसी साड़ी बनाने का काम करते हैं। बारिश के दिनों में काम करना मुश्किल हो जाता है। करीब महीनेभर कहीं और शिफ्ट होकर काम करना पड़ता है। उन्होंने बताया कि घर में पानी भरने के बाद मशीन का काम बंद हो जाता है। परिवार की रोजी-रोटी इसी काम से चलती है। ऐसे में बाहर काम करना पड़ता है। दूसरे के पावरलूम पर मजदूरी करते हैं और रात में जागकर घर देखते हैं, ताकि सामान चोरी न हो। घर खाली किया तो चोरी का डर मुहम्मद सलीम खान ने बताया कि बाढ़ के दौरान घर छोड़कर जाने के बाद सामान की सुरक्षा की चिंता बनी रहती है। घर में कोई नहीं रहता तो चोरी का डर रहता है। ताला तोड़कर सामान निकाल ले जाने की घटनाएं भी होती हैं। उन्होंने बताया कि बाढ़ के समय परिवारों के सामने दोहरी परेशानी होती है। एक तरफ घर और सामान छोड़ना पड़ता है, दूसरी तरफ यह चिंता रहती है कि लौटने के बाद सामान सुरक्षित मिलेगा या नहीं। राहत की उम्मीद, लेकिन मदद नहीं मिलने का आरोप नाजमा बेगम ने बताया कि सरकार की ओर से मदद मिलने की बात सुनाई देती है, लेकिन वह उन तक नहीं पहुंच पाती। उनका कहना है कि गरीब परिवारों को खाने तक की परेशानी होती है। जैतून बीबी ने बताया कि वे 12 साल से नक्खीघाट में रह रही हैं, लेकिन उन्हें कभी सरकारी मदद नहीं मिली। उनका कहना है कि नावें आती हैं, लोग आते हैं, लेकिन गरीबों तक मदद नहीं पहुंचती। खुले मैदान में भेज रहे बच्चे, खुद पानी में फंसे रहते हैं जैतून बीबी ने बताया कि पानी बढ़ने पर पोता-पोती, बहू-बेटा और बेटी को खुले मैदान में भेजना पड़ता है। परिवार के लोगों को पानी से निकलने का रास्ता भी तलाशना पड़ता है। उनका कहना है कि गरीब परिवारों के सामने हर साल यही परेशानी खड़ी होती है। जैतून बीबी कहा कि पोता-पोती, बहू-बेटा, बेटी को खुले मैदान में भेज देते हैं। इतना बाढ़-बंट रहा है, कोई सरकार हमको नहीं दे रही, ना कोई पब्लिक हमको दे रही है। हम गरीब आदमी हैं। हर साल बाढ़, बच्चे रोते हैं और चूल्हा बंद हो जाता है गुड़िया बेगम ने बताया कि हर साल बाढ़ आती है। पानी बढ़ने पर बच्चे भूखे-प्यासे बैठे रहते हैं, रोते हैं और कलपते हैं। घर में खाना नहीं बन पाता। जो पैसा बचा रहता है, उसी से किसी तरह गुजारा करते हैं। पानी आते ही काम-धंधा बंद हो जाता है।
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बच्चों को चीनी-पानी पिलाकर पालते हैं:बाढ़ में घर छोड़ने को मजबूर परिवार: महिलाएं बोलीं- एक टाइम चूल्हा जलता, कभी भूखे सोना पड़ता है