बच्चे के सांस नली में फंसा 32 MM का स्क्रू:टीबी अस्पताल में डॉक्टर्स ने बिना चीर-फाड़ और बेहोश किए दूरबीन से निकाला


उदयपुर में एक बच्चे के मुंह में खेलते हुए अचानक 32 MM का स्क्रू गले में चला गया। इसके बाद स्क्रू सांस नली में फंस गया। बच्चे को लेकर परिवार के लोग अस्पताल पहुंचे और डॉक्टरों को मामला बताया। इस बीच बच्चे को खांसी और सांस की तकलीफ होने लगी। डॉक्टरों ने एक्सरे से देखा तो स्कू फेफड़े में फंसा था, जिसे बाद में दूरबीन के जरिए निकाला गया। यह सर्जरी उदयपुर के टी.बी. और चेस्ट अस्पताल बड़ी में डॉक्टर्स की टीम ने की। रवींद्रनाथ टैगोर मेडिकल कॉलेज उदयपुर के प्रिंसीपल डॉ. राहुल जैन ने बताया- कॉलेज के अधीन बड़ी में संचालित टी.बी. अस्पताल में मरीज की जान बचाई गई। डॉ. जैन ने बताया- जटिल मामले में 17 वर्षीय बच्चे की सांस नली में फंसे 32.4 मिमी के लोहे के स्क्रू को बिना चीर-फाड़ और मरीज को बिना बेहोश किए निकाला गया। मामा के घर आया था बच्चा, खेलते हुए निगल गया उत्तरप्रदेश के बरेली का रहने वाला 17 साल का बच्चा उदयपुर में अपने मामा के यहां आया हुआ था। मामा कारपेंटर का काम कर रहे थे, तब बच्चे के हाथ में स्कू था। अचानक स्क्रू बच्चे मुंह में चला गया। मरीज 25 अप्रैल को अस्पताल में आया। उसे सांस लेने में दिक्कत और खांसी होने की बात कहते हुए स्क्रू गले में जाने की बात बताई। इसके बाद डॉक्टर ने उसे भर्ती किया। स्थिति की गंभीरता को देखते हुए 26 अप्रैल को बच्चे की दूरबीन से सर्जरी की गई। डॉक्टर्स ने 20 मिनट में निकाला टीबी अस्पताल के सहायक प्रोफेसर डॉ. महेश माहिच ने बताया- बच्चे का एक्सरे किया तो पता चला कि उसके दाएं फेफड़े की सांस नली में स्क्रू फंसा था। इस कारण मरीज को लगातार खांसी, छाती में दर्द और बलगम में खून आने की समस्या हो गई थी। अस्पताल के प्रिंसिपल डॉ. राहुल जैन ने बताया- टीम ने बिना जनरल एनेस्थीसिया (बेहोश किए) और बिना किसी सर्जरी के फ्लेक्सिबल ब्रान्कोस्कोपी (कम चीर-फाड़ की प्रक्रिया) के जरिए स्क्रू को निकाल दिया। जैन ने बताया कि आमतौर पर ऐसे मामलों में बड़े ऑपरेशन की आवश्यकता होती है, लेकिन टीम ने करीब 15 से 20 मिनट में स्क्रू निकाल दिया। बिना बेहोश किए निकाला स्क्रू सीनियर प्रोफेसर डॉ. महेंद्र कुमार बैनाड़ा ने बताया- अक्सर सांस नली में फंसी वस्तु निकालने के लिए मरीज को बेहोश करना पड़ता है, लेकिन टीम ने फ्लेक्सिबल ब्रान्कोस्कोपी का उपयोग कर जोखिम कम किया और मरीज का इलाज किया। इस दौरान टीम में डॉ. महेश माहिच, डॉ. महेंद्र कुमार बैनाड़ा, डॉ. प्रकाश बिश्नोई, डॉ. भावना, डॉ. हेमकरण, डॉ. गोविन्द, डॉ. राहुल, नर्सिंग अधिकारी गीता और ओ.टी. स्टाफ का योगदान रहा।

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