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इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने पहली शादी की जानकारी छिपाकर पुलिस कार्रवाई से संरक्षण मांगने वाले एक दंपती पर एक लाख रुपये का हर्जाना लगाया है। न्यायालय ने इसे अदालत की प्रक्रिया का दुरुपयोग और धोखाधड़ी करार दिया। न्यायमूर्ति राजनिश कुमार और न्यायमूर्ति बाबिता रानी की खंडपीठ ने कुसुम मौर्या व अन्य की याचिका खारिज करते हुए यह आदेश दिया। दंपती को यह राशि चार सप्ताह के भीतर हाईकोर्ट के वरिष्ठ रजिस्ट्रार के समक्ष संयुक्त रूप से जमा करनी होगी। परिजनों के डर का हवाला देकर मांगा था संरक्षण मामले की शुरुआत में याचिकाकर्ताओं ने पुलिस उत्पीड़न और किसी भी दंडात्मक कार्रवाई से संरक्षण की मांग की थी। 26 मई को सुनवाई के दौरान उनके वकील ने बताया था कि दोनों बालिग हैं और पति-पत्नी की तरह रह रहे हैं। उन्होंने यह भी कहा था कि परिजनों के डर के कारण वे विवाह नहीं कर पा रहे हैं और पुलिस संरक्षण मिलने पर तुरंत शादी कर लेंगे। इस पर न्यायालय ने कहा था कि यदि दो बालिग व्यक्ति आपसी सहमति से विवाह करना चाहते हैं, तो कोई भी व्यक्ति या प्राधिकरण उनके शांतिपूर्ण जीवन में बाधा नहीं डाल सकता। न्यायालय ने उन्हें एक महीने के भीतर विवाह कर उसका पंजीकरण कराने का निर्देश दिया था और अगली सुनवाई तक पुलिस सहित किसी भी निजी या सरकारी व्यक्ति द्वारा उत्पीड़न से संरक्षण प्रदान किया था। पहले से शादीशुदा था पुरुष चार अगस्त को जब मामला दोबारा सुनवाई के लिए आया, तो याचिकाकर्ताओं ने बताया कि वे अदालत के निर्देशानुसार विवाह नहीं कर सके। इसका कारण यह बताया गया कि पुरुष पहले से ही विवाहित था। पुरुष ने जानकारी दी कि उसने 3 अप्रैल, 2026 को हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13 के तहत बलरामपुर फैमिली कोर्ट में तलाक की याचिका दाखिल कर रखी है। न्यायालय ने पाया कि पहली शादी से संबंधित यह महत्वपूर्ण जानकारी याचिका दाखिल करते समय और पिछली सुनवाई के दौरान अदालत से छिपाई गई थी। याचिकाकर्ताओं ने पहले शादी न कर पाने का कारण केवल परिजनों का डर बताया था, जबकि वास्तविक तथ्य कुछ और था।
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दंपती ने कोर्ट से छिपाई पहली शादी:पुलिस संरक्षण लेने की कोशिश, लखनऊ हाईकोर्ट ने लगाया एक लाख हर्जाना