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लखनऊ के अंतरराष्ट्रीय बौद्ध शोध संस्थान में डॉ. हरिओम लिखित चर्चित कहानी ‘भूसा’ का प्रभावशाली मंचन किया गया। रंगयात्रा, लखनऊ द्वारा प्रस्तुत इस नाटक का आयोजन संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार और उत्तर प्रदेश के संस्कृति विभाग के सहयोग से किया गया । यह नाटक ग्रामीण समाज में गहरे पैठ चुके अंधविश्वास और आधुनिक विज्ञान के बीच के संघर्ष को व्यंग्यात्मक शैली में प्रस्तुत करता है। कहानी एक युवा डॉक्टर के इर्द-गिर्द घूमती है, जो शहर से पढ़ाई पूरी कर अपने गांव लौटता है। उसका लक्ष्य लोगों का इलाज करने के साथ-साथ उन्हें जागरूक करना भी है। अंधविश्वास से लोगों को जागरूक किया गया डॉक्टर इलाज के अतिरिक्त भूसा बेचने का कार्य भी करता है। वहीं, गांव का प्रधान, जो एक ओझा भी है, अपनी झाड़-फूंक और अंधविश्वास के बल पर ग्रामीणों पर अपना प्रभाव बनाए रखता है। कहानी में तब मोड़ आता है जब गांव की एक गाय बीमार होकर मर जाती है। प्रधान अपने टोने-टोटकों से गाय को बचाने में विफल रहता है, लेकिन वह ग्रामीणों को यह विश्वास दिलाता है कि गांव पर दैवी संकट आया है और डॉक्टर के घर रखा भूसा विषैला हो गया है। ग्रामीण बिना किसी तर्क के उसकी बात मान लेते हैं और डॉक्टर को दोषी ठहराने लगते हैं। अंततः चुनाव में तर्क और विज्ञान की हार होती है इसी दौरान प्रधान पद के चुनाव होते हैं। शुरुआत में ग्रामीण डॉक्टर को प्रधान बनाना चाहते हैं, लेकिन अंधविश्वास और अफवाहों के कारण पूरा माहौल बदल जाता है। अंततः चुनाव में तर्क और विज्ञान की हार होती है, जबकि अंधविश्वास विजयी होता है।यह नाटक समाज को संदेश देता है कि जागरूकता के अभाव में अंधविश्वास आज भी सच्चाई पर हावी हो सकता है। इन कलाकारों ने शानदार अभिनय किया नाटक में कोमल प्रजापति, योगेंद्र पाल, अभय सिंह रावत, गुरुदत्त पांडेय, मुकुल कुमार, अनिल कुमार, अज़हर जमाल, अभिषेक कुमार, राजनंदनी वर्मा, कंचन शर्मा, लावण्या बाजपेयी, लता बाजपेयी, अंशिका सक्सेना और सुरुचि सक्सेना ने प्रभावशाली अभिनय किया, जिसकी दर्शकों ने खूब सराहना की।
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डॉ. हरिओम की चर्चित कहानी 'भूसा' का मंचन:लखनऊ में अंधविश्वास और विज्ञान के संघर्ष को दर्शाया गया