आरोपियों के रिश्तेदारों को परेशान नहीं कर सकती पुलिस:हाईकोर्ट ने कहा- ये 'औपनिवेशिक प्रथा, यह अनुच्छेद 21 का उल्लंघन


इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अपने एक आदेश में कहा कि पुलिस द्वारा किसी आरोपी के रिश्तेदारों को प्रताड़ित करना या परेशान करना एक ‘औपनिवेशिक प्रथा’ है, जो भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत गारंटीकृत जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का उल्लंघन करती है।
जस्टिस जे.जे. मुनीर और जस्टिस तरुण सक्सेना की पीठ ने कहा कि आज के समय में पुलिस के पास आरोपी का पता लगाने और उसे न्याय के कटघरे में लाने के लिए वैज्ञानिक तरीके मौजूद हैं, न कि उसके रिश्तेदारों को डराना-धमकाना। जानिये क्या है पूरा मामला खंडपीठ ने ये टिप्पणियां एक दंपति ( मुनिता देवी और अन्य) द्वारा दायर आपराधिक याचिका की सुनवाई करते हुए की, जिसमें उन्होंने प्रयागराज पुलिस द्वारा लगातार उत्पीड़न किए जाने का आरोप लगाया था। यह उत्पीड़न कथित तौर पर उनके बेटे के खिलाफ दर्ज एक एफआईआर के कारण हो रहा है। बेटे पर एक लड़की (शिकायतकर्ता की बेटी) को बहला-फुसलाकर ले जाने का आरोप है। खंडपीठ को बताया गया कि फरार दंपति का पता लगाने के लिए, पुलिस याचिकाकर्ताओं को रोज़ाना थाने बुलाती है, उन्हें पूरे दिन बिठाए रखती है और उन्हें केवल शाम को ही जाने दिया जाता है। पुलिसवाले घूस मांगते हैं याचिकाकर्ताओं ने यह भी दावा किया कि पुलिसकर्मी उनसे अवैध रूप से पैसे (घूस) की मांग कर रहे थे। इस पर कड़ी आपत्ति जताते हुए खंडपीठ ने पुलिस उपायुक्त, यमुनापार, प्रयागराज और थाना प्रभारी, करछना, यमुना नगर (कमिश्नरेट प्रयागराज) को निर्देश दिया कि वे अपने-अपने हलफनामे दायर करके बताएं कि किन परिस्थितियों में याचिकाकर्ताओं को रोज़ाना थाने बुलाया जा रहा है। पीठ ने यह भी जानना चाहा कि क्या याचिकाकर्ताओं की पुलिस को किसी मामले में तलाश है।
अदालत ने इस याचिका में पुलिस आयुक्त, प्रयागराज और पुलिस उपायुक्त, यमुनापार, प्रयागराज को भी प्रतिवादी के रूप में पक्षकार बनाया। इस बीच, अदालत ने प्रतिवादियों को निर्देश दिया कि वे संबंधित एफआईआर के सिलसिले में याचिकाकर्ताओं को किसी भी बहाने से थाने न बुलाएं, न ही उन्हें हिरासत में लें और न ही उन्हें किसी तरह की धमकी दें।

Source link

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *