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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक याची द्वारा दाखिल समीक्षा याचिका (रिव्यू पिटीशन) में एकल न्यायाधीश के लिए इस्तेमाल की गई भाषा को अवमाननापूर्ण करार देते हुए रजिस्ट्री को इसे आपराधिक अवमानना याचिका के रूप में दर्ज कर उचित पीठ के समक्ष रखने का निर्देश दिया है। मुख्य न्यायाधीश अरुण भंसाली और न्यायमूर्ति क्षितिज शैलेन्द्र की खंडपीठ ने विश्राम सिंह मामले में यह आदेश पारित किया। क्या है मामला जानिये याची विश्राम सिंह ने विशेष अपील डिफेक्टिव में 9 जुलाई 2026 को पारित उस आदेश के विरुद्ध समीक्षा याचिका दाखिल की थी, जिसमें उनकी विशेष अपील को पोषणीय न मानते हुए खारिज कर दिया गया था। याची इस मामले में स्वयं अपनी पैरवी कर रहे हैं। पीठ ने पाया कि समीक्षा याचिका में उस एकल न्यायाधीश के संदर्भ में, जिनके निर्णय के विरुद्ध अपील दायर की गई थी, ऐसी भाषा का प्रयोग किया गया है जो प्रथम दृष्टया अवमाननापूर्ण है। कोर्ट ने अपने आदेश में उन विशिष्ट अंशों को भी चिन्हित किया, जिनमें याची ने आपत्तिजनक शब्दावली का प्रयोग करते हुए आरोप लगाया कि आदेश धोखे से, अवैध रूप से, बिना कारण और अधिकारिता के पारित किया गया। न्यायालय की गरिमा के खिलाफ कोर्ट ने कहा कि याची द्वारा व्यक्तिगत रूप से पैरवी करते हुए इस्तेमाल की गई भाषा से न्यायालय की गरिमा को कम करने का प्रयास किया गया है, जो आपराधिक अवमानना की श्रेणी में आता है। इसे देखते हुए रजिस्ट्री को निर्देश दिया गया कि मामले को आपराधिक अवमानना याचिका के रूप में दर्ज कर उपयुक्त पीठ के समक्ष रखा जाए। पीठ ने स्पष्ट किया कि मूल समीक्षा याचिका पर सुनवाई आपराधिक अवमानना याचिका के निस्तारण के बाद ही की जाएगी।
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अर्जी में अपमानजनक भाषा के इस्तेमाल पर कोर्ट नाराज:हाईकोर्ट ने याची के खिलाफ आपराधिक अवमानना की कार्यवाही का आदेश दिया