अपराध की कमाई पर हाईकोर्ट की टिप्प्णी:कोर्ट ने कहा- अज्ञात आय के स्रोत से मिली संपत्ति को अवैध नहीं माना जाएगा


इलाहाबाद हाईकोर्ट ने धन शोधन निवारण अधिनियम (पीएमएलए) के एक मामले में महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि केवल किसी व्यक्ति की संपत्ति का स्रोत अज्ञात होने भर से यह नहीं माना जा सकता कि वह किसी अनुसूचित अपराध से अर्जित ‘अपराध की आय’ है। अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष को यह स्पष्ट रूप से स्थापित करना होगा कि संबंधित संपत्ति किसी अनुसूचित अपराध से प्राप्त हुई। जस्टिस विक्रम डी. चौहान ने यह टिप्पणी यमुना बेसिन में अवैध खनन से जुड़े धन शोधन मामले में एक आरोपी को जमानत देते हुए की। जानिये कोर्ट ने क्या कहा अदालत ने कहा, “किसी व्यक्ति के पास अज्ञात आय के स्रोत से अर्जित संपत्ति हो सकती है, लेकिन केवल इसी आधार पर यह नहीं माना जा सकता कि वह संपत्ति किसी अनुसूचित अपराध से प्राप्त हुई।” मामला हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा और ऊना जिलों में दर्ज कई एफआईआर से जुड़ा है। आरोप था कि सरकारी भूमि पर अवैध खनन किया जा रहा था और खनिजों का ओवरलोड वाहनों से अवैध परिवहन किया जा रहा था। जांच में यह भी आरोप लगाया गया कि सह-आरोपी की फर्म जय मां ज्वाला स्टोन क्रशर रात के समय भी अवैध खनन में शामिल थी। प्रवर्तन निदेशालय की जांच में सामने आया कि उत्तर प्रदेश के सहारनपुर स्थित गढ़वाल स्टोन क्रशर को जय मां ज्वाला स्टोन क्रशर के संचालक ने खरीदा था। आरोप है कि यह क्रशर भी यमुना बेसिन में अवैध खनन में शामिल था। जमानत मांगने वाला आरोपी गढ़वाल स्टोन क्रशर में साझेदार है। अभियोजन का कहना था कि भले ही आरोपी जय मां ज्वाला स्टोन क्रशर का मालिक नहीं था, लेकिन वह दोनों संस्थानों के दैनिक कामकाज में शामिल था। वहीं, आरोपी की ओर से कहा गया कि हिमाचल प्रदेश में दर्ज एफआईआर में उसका नाम नहीं है। सह-आरोपी को पहले ही जमानत मिल चुकी है और उसके खिलाफ उत्तर प्रदेश में किसी अनुसूचित अपराध से प्राप्त धन को जोड़ने वाला कोई साक्ष्य भी नहीं है। यह भी बताया गया कि वह करीब 18 महीने से जेल में है। सुनवाई में कोर्ट ने क्या कहा हाईकोर्ट ने कहा कि धन शोधन निवारण अधिनियम की धारा 3 और 4 के तहत अपराध तभी बनता है, जब किसी अनुसूचित अपराध से प्राप्त ‘अपराध की आय’ से जुड़ी संपत्ति को छिपाने, उपयोग करने या वैध संपत्ति के रूप में प्रस्तुत करने जैसी गतिविधि साबित हो। अदालत ने स्पष्ट किया कि ‘अपराध की आय’ का अर्थ ऐसी संपत्ति से है, जो किसी अनुसूचित अपराध के परिणामस्वरूप प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से प्राप्त हुई हो। रिकॉर्ड का परीक्षण करने के बाद हाईकोर्ट ने पाया कि हिमाचल प्रदेश में दर्ज अनुसूचित अपराधों में आरोपी के खिलाफ कोई ठोस साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किया गया। अदालत ने यह भी कहा कि छह में से चार मामलों में अंतिम रिपोर्ट दाखिल की जा चुकी है, जिसे संबंधित अदालतों ने स्वीकार भी कर लिया। अदालत ने कहा कि यदि यह स्थापित नहीं हुआ कि गढ़वाल स्टोन क्रशर अनुसूचित अपराध से अर्जित धन से खरीदा गया था, तो उससे होने वाली आय को भी स्वतः ‘अपराध की आय’ नहीं माना जा सकता। हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि अवैध रूप से खनन किए गए खनिजों की खरीद-बिक्री अपने आप में अलग अपराध हो सकती है, लेकिन पीएमएलए के तहत कार्रवाई के लिए यह पहचानना आवश्यक है कि अनुसूचित अपराध से कौन-सी संपत्ति या परिसंपत्ति अर्जित हुई। अदालत ने पाया कि जांच एजेंसी यह भी नहीं बता सकी कि अवैध खनन से अर्जित धन से खरीदी गई कौन-सी संपत्तियां ‘अपराध की आय’ हैं। इस संबंध में किसी परिसंपत्ति की सूची भी रिकॉर्ड पर नहीं रखी गई। सह-आरोपी को पहले ही जमानत मिल चुकी है और मुकदमे के शीघ्र समाप्त होने की संभावना भी नहीं है। साथ ही, अभियोजन यह नहीं दिखा सका कि आरोपी के फरार होने, गवाहों को प्रभावित करने या न्यायिक प्रक्रिया में बाधा डालने की आशंका है। इन परिस्थितियों को देखते हुए हाईकोर्ट ने आरोपी की जमानत याचिका स्वीकार की।

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