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15 मिनट पहले

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भारत और रूस के बीच रेसिप्रोकल एक्सचेंज ऑफ लॉजिस्टिक सपोर्ट (RELOS) रक्षा समझौता अब लागू हो गया है। इसके तहत दोनों देश एक-दूसरे की जमीन पर 3000 सैनिक तक तैनात कर सकेंगे। साथ ही 5 युद्धपोत और 10 सैन्य विमानों की तैनाती की भी अनुमति दी गई है।

दोनों देशों की सेनाएं एक-दूसरे के मिलिट्री बेस, एयरबेस और बंदरगाहों का इस्तेमाल कर सकेंगी, जिससे लंबे समय तक सैन्य तैनाती और ऑपरेशन आसान होंगे।

डील में लॉजिस्टिक सपोर्ट भी शामिल है। इसके तहत ईंधन, पानी, मरम्मत, तकनीकी संसाधन और अन्य जरूरी सप्लाई उपलब्ध कराई जाएंगी। वहीं, विमानों के लिए एयर ट्रैफिक कंट्रोल और फ्लाइट से जुड़ी सेवाएं भी मिलेंगी।

यह समझौता फरवरी 2025 में साइन हुआ था और दिसंबर 2025 में रूस ने इसे मंजूरी दी। यह 5 साल के लिए लागू रहेगा, जिसे आपसी सहमति से आगे बढ़ाया जा सकता है।

हालांकि, यह समझौता युद्ध के लिए नहीं है। इसका इस्तेमाल केवल शांति के समय ट्रेनिंग, संयुक्त अभ्यास और लॉजिस्टिक सहयोग के लिए किया जाएगा।

इस डील को भारत और रूस के बीच मजबूत होती रणनीतिक साझेदारी का अहम कदम माना जा रहा है, जिससे दोनों देशों के बीच सैन्य तालमेल और सहयोग और बेहतर होगा।

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उत्तर कोरिया ने बैलिस्टिक मिसाइलें दागीं, 140 किमी दूर समुद्र में गिरीं; इस महीने चौथा मिसाइल परीक्षण

उत्तर कोरिया ने रविवार सुबह एक बार फिर बैलिस्टिक मिसाइलें दागकर अपनी सैन्य ताकत का प्रदर्शन किया। मिसाइलें पूर्वी तट के सिनपो शहर के पास से समुद्र की ओर दागी गईं और करीब 140 किमी तक गईं।

यह इस महीने चौथा और साल का सातवां मिसाइल परीक्षण है। दक्षिण कोरिया के पूर्व सुरक्षा सलाहकार किम की-जुंग के मुताबिक, यह कदम अमेरिका और दक्षिण कोरिया के साथ संभावित बातचीत से पहले ताकत दिखाने की रणनीति का हिस्सा है।

दक्षिण कोरिया ने इस कार्रवाई को उकसावे वाला बताते हुए संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्तावों का उल्लंघन कहा है और आपात बैठक बुलाई। जापान ने भी पुष्टि की कि ये उसके आर्थिक क्षेत्र में नहीं गिरीं।

अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी के प्रमुख राफेल ग्रोसी ने हाल ही में कहा कि उत्तर कोरिया अपनी परमाणु क्षमता तेजी से बढ़ा रहा है और नए यूरेनियम संवर्धन केंद्र पर काम कर सकता है।

मार्च में किम जोंग उन ने कहा था कि उनका देश परमाणु शक्ति बना रहेगा और राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए इस क्षमता का विस्तार जरूरी है।

जापान ने रक्षा नीति बदली, अब हथियारों का निर्यातक बनेगा

दूसरे विश्व युद्ध के बाद शांतिवादी नीति अपनाने वाला जापान अब अपनी रक्षा नीति में बड़ा बदलाव कर रहा है। सरकार ने हथियार निर्यात के नियमों में ढील देने का फैसला किया है, जिससे वह वैश्विक डिफेंस मार्केट में उतरने की तैयारी कर रहा है।

करीब 80 साल तक जापान हथियारों के निर्यात से दूर रहा, लेकिन अब बदलते वैश्विक हालात के चलते उसने अपना रुख बदल दिया है। रूस-यूक्रेन युद्ध और पश्चिम एशिया के तनाव के कारण हथियारों की मांग बढ़ी है, जिससे कई देश जापान की ओर देख रहे हैं।

जापान का रक्षा बजट भी तेजी से बढ़कर करीब 60 अरब डॉलर तक पहुंच गया है। देश की कंपनियां अब निर्यात बढ़ाने के लिए नई यूनिट बना रही हैं और अपने ऑपरेशन का विस्तार कर रही हैं।

फिलीपींस और पोलैंड जैसे देश जापान के साथ रक्षा सहयोग बढ़ाने में दिलचस्पी दिखा रहे हैं। वहीं, जापान की इस नई नीति से चीन चिंतित है और उसने क्षेत्रीय संतुलन बदलने की आशंका जताई है।

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