Vande Mataram Not Mandatory for Public Events

नई दिल्ली10 मिनट पहले

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सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को राष्ट्रीय गीत ‘वंदे मातरम’ गाने के संबंध में MHA के सर्कुलर के खिलाफ दायर याचिका पर सुनवाई से इनकार कर दिया। कोर्ट ने कहा कि यह निर्देश अनिवार्य नहीं है। कोर्ट ने यह भी कहा कि सर्कुलर को चुनौती देने वाली याचिका समय से पहले दायर की गई है और यह भेदभाव की अस्पष्ट आशंका पर आधारित है।

CJI जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल एम पंचोली की बेंच ने कहा कि गृह मंत्रालय की एडवाइजरी में वंदेमातरम न गाने पर किसी भी तरह की सजा का प्रावधान नहीं है।

बेंच ने कहा- ये दिशानिर्देश केवल एक प्रोटोकॉल हैं और इनका पालन करना अनिवार्य नहीं है। जब दंडात्मक कार्रवाई होगी या इसे गाना अनिवार्य किया जाएगा, तब हम इन सब बातों पर ध्यान देंगे।

याचिकाकर्ता का दावा- सलाह देने के बहाने साथ गाने मजबूर किया जाएगा

याचिका मुहम्मद सईद नूरी ने दायर की थी। याचिकाकर्ता के वकील संजय हेगड़े ने कहा कि वंदेमातरम गाते समय व्यवधान करने पर सजा का प्रावधान है।

उन्होंने कहा- “जो व्यक्ति वंदेमातरम गाने या राष्ट्रगीत के समय खड़े होने से इनकार करता है, उस पर हमेशा बहुत बड़ा बोझ होता है। सलाह देने के बहाने लोगों को साथ गाने के लिए मजबूर किया जा सकता है।”

गणतंत्र दिवस के बाद जारी किए गए थे दिशा-निर्देश

गृह मंत्रालय ने 28 जनवरी को एक आदेश जारी किया था। जिसमें कहा गया था कि अब सरकारी कार्यक्रमों, स्कूलों या अन्य औपचारिक आयोजनों में ‘वंदे मातरम’ बजाया जाएगा। इस दौरान हर व्यक्ति का खड़ा होना अनिवार्य होगा। यह आदेश 28 जनवरी को जारी हुआ, लेकिन मीडिया में इसकी जानकारी 11 फरवरी को आई।

आदेश में साफ लिखा है कि अगर राष्ट्रगीत ‘वंदे मातरम’ और राष्ट्रगान ‘जन गण मन’ साथ में गाए या बजाए जाएं, तो पहले वंदे मातरम गाया जाएगा। इस दौरान गाने या सुनने वालों को सावधान मुद्रा में खड़ा रहना होगा।

नए नियमों के अनुसार, राष्ट्रगीत के सभी 6 अंतरे गाए जाएंगे, जिनकी कुल अवधि 3 मिनट 10 सेकेंड है। अब तक मूल गीत के पहले दो अंतरे ही गाए जाते थे। पढ़ें पूरी खबर…

बंकिम चंद्र ने 1875 में लिखा था, आनंदमठ में छपा था

भारत के राष्ट्रगीत वंदे मातरम को बंकिम चंद्र चटर्जी ने 7 नवंबर 1875 को अक्षय नवमी के पावन अवसर पर लिखा था। यह 1882 में पहली बार उनकी पत्रिका बंगदर्शन में उनके उपन्यास आनंदमठ के हिस्से के रूप में छपा था।

1896 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अधिवेशन में रवींद्रनाथ टैगोर ने मंच पर वंदे मातरम गाया। यह पहला मौका था जब यह गीत सार्वजनिक रूप से राष्ट्रीय स्तर पर गाया गया। सभा में मौजूद हजारों लोगों की आंखें नम हो गई थीं।

‘वंदे मातरम’ एक संस्कृत वाक्यांश है, जिसका मतलब है- हे मां, मैं तुम्हें नमन करता हूं। स्वतंत्रता संग्राम के दौरान ‘वंदे मातरम’ भारत को औपनिवेशिक शासन से मुक्त कराने के लिए संघर्ष कर रहे स्वतंत्रता सेनानियों का नारा बन गया था।

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