Supreme Court on POCSO Act Misuse

नई दिल्ली9 मिनट पहले

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सुप्रीम कोर्ट ने किशोर-किशोरियों के बीच सहमति से बने संबंधों में पॉक्सो (POCSO) कानून के कथित दुरुपयोग पर चिंता जताई है। अदालत ने सोमवार को कहा कि जब किसी लड़के और लड़की के बीच संबंध हो और वे साथ चले जाएं, तो हर मामले को स्वतः पॉक्सो का केस नहीं माना जा सकता।

जस्टिस बीवी नागरत्ना और न्यायमूर्ति आर महादेवन की पीठ ने सुनवाई के दौरान पूछा-

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सरकार किसी लड़के और लड़की को साथ भागने से कैसे रोक सकता है? 15 से 18 साल की उम्र बेहद संवेदनशील और नई चीजें आजमाने की उम्र होती है। यह प्रयोग और भावनात्मक समझ विकसित होने का भी दौर होता है।

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पीठ ने कहा कि कई मामलों में जब किशोरियां अपनी मर्जी से अपने साथी के साथ चली जाती हैं, तो परिवार अपनी तथाकथित इज्जत बचाने के लिए लड़के के खिलाफ आपराधिक मुकदमा दर्ज करा देता है। अदालत ने कहा कि ऐसे मामलों में अंततः आरोपियों को बरी करना पड़ता है।

सहमति वाले संबंधों में भी कई किशोर जेल पहुंच जाते हैं: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट यह टिप्पणी किशोरों के निजता के अधिकार से जुड़े स्वतः संज्ञान (सुओ मोटू) मामले की सुनवाई के दौरान कर रहा था। यह मामला 2023 में कलकत्ता हाईकोर्ट की उस विवादित टिप्पणी के बाद शुरू हुआ था, जिसमें किशोरियों को रिश्तों में पड़ने के बजाय अपनी यौन इच्छाओं पर नियंत्रण रखने की सलाह दी गई थी। बाद में सुप्रीम कोर्ट ने उस फैसले को रद्द कर दिया था।

सीनियर एडवोकेट माधवी दीवान ने अदालत को बताया कि मूल मामला एक नाबालिग लड़की और 25 वर्षीय युवक के साथ भाग जाने से जुड़ा था। उन्होंने कहा कि युवती बाद में उसी व्यक्ति के साथ रहने लगी, दोनों का एक बच्चा भी है और वह अपने वैवाहिक जीवन में खुश है।

उन्होंने तर्क दिया कि ऐसे मामलों में पॉक्सो कानून का दुरुपयोग रोकने के लिए प्रभावी व्यवस्था बनाई जानी चाहिए, क्योंकि सहमति वाले संबंधों में भी कई किशोर जेल पहुंच जाते हैं।

केंद्र सरकार ने दिया राष्ट्रीय डैशबोर्ड बनाने का सुझाव

केंद्र सरकार की ओर से अदालत को बताया गया कि इस संबंध में कुछ सिफारिशें तैयार की गई हैं। यदि इन्हें स्वीकार किया जाता है तो राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में इन्हें लागू किया जा सकता है। वहीं, वरिष्ठ अधिवक्ता माधवी दीवान ने पॉक्सो मामलों की निगरानी के लिए एक राष्ट्रीय डैशबोर्ड बनाने का सुझाव दिया।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि प्रत्येक हाईकोर्ट में बाल अधिकारों से जुड़ी समितियां पहले से मौजूद हैं और राज्य सरकारें भी ऐसे मामलों की प्रभावी निगरानी कर सकती हैं। मामले की अगली सुनवाई 17 जुलाई को होगी।

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