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नई दिल्ली14 मिनट पहले
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सुप्रीम कोर्ट की 9 जजों की बेंच ने मंगलवार को सबरीमाला मंदिर में महिलाओं को एंट्री देने का आदेश जारी रहे या नहीं इस पर पहले दिन 5 घंटे सुनवाई की। केंद्र ने शुरुआत में ही सुप्रीम कोर्ट में सबरीमाला मंदिर में मासिक धर्म आयु की महिलाओं के प्रवेश पर लगी रोक का समर्थन किया।
सरकार ने कहा, ‘2018 में सभी वर्ग की महिलाओं को एंट्री देने का सुप्रीम कोर्ट का फैसला गलत था। यह मामला पूरी तरह धार्मिक आस्था और संप्रदाय के अपने अधिकार से जुड़ा है। अदालतें महिलाओं के धार्मिक स्थलों में प्रवेश के मामले में दखल नहीं दे सकतीं।
सरकार ने कहा कि अगर कोई प्रथा गैर-वैज्ञानिक लगती है, तो उसका हल संसद या विधानसभा के पास है, न कि अदालत के पास।
जस्टिस नागरत्ना ने कहा-
इस मामले में ‘अनुच्छेद 17’ यानी छुआछूत के खिलाफ अधिकार पर दलील किस तरह पेश की जाए, यह मेरी समझ से बाहर है। एक महिला होने के नाते मैं यह कहना चाहूंगी कि ऐसा नहीं हो सकता कि हर महीने 3 दिन तक तो महिला को ‘अछूत’ माना जाए और चौथे दिन अचानक कोई ‘अछूतपन’ न रह जाए।

केंद्र ने कहा- हर धार्मिक प्रथा का सम्मान करना चाहिए, 5 पॉइंट्स

- सरकार ने कहा, ‘हर धार्मिक समूह की प्रथाओं का सम्मान करना चाहिए और हर चीज को गरिमा या व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जोड़कर नहीं देखा जा सकता। उदाहरण के तौर पर, अगर किसी मजार या गुरुद्वारे में सिर ढकना जरूरी है, तो इसे अधिकारों का हनन नहीं कहा जा सकता।
- जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि अगर कोई सामाजिक बुराई है, जिसे धार्मिक प्रथा का नाम दे दिया गया हो तो अदालत उनके बीच फर्क कर सकती है कि वह एक सामाजिक बुराई है या कोई अनिवार्य धार्मिक प्रथा है। इस पर केंद्र ने कहा कि संवैधानिक दृष्टि से इसका जवाब यह होगा कि इसका समाधान अनुच्छेद 25(2)(b) में है, यानी संसद इस पर कानून बना सकती है।
- केंद्र ने कहा कि अगर कोई प्रथा सीधे तौर पर सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता या स्वास्थ्य के खिलाफ है (जैसे मानव बलि), तो अदालत उसे तुरंत खारिज कर सकती है।
- केंद्र का तर्क था कि अदालत को यह तय करने से बचना चाहिए कि कोई धार्मिक प्रथा तर्कसंगत, आधुनिक या वैज्ञानिक है या नहीं, क्योंकि इससे न्यायपालिका अपने विचार धर्म पर थोपने लगेगी।
- केंद्र ने कहा कि संविधान धार्मिक स्वतंत्रता इसलिए देता है क्योंकि धर्म में कई ऐसी मान्यताएं और प्रथाएं होती हैं जो सामान्य तर्क या बहुमत की सोच से मेल नहीं खातीं।

सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद 2 जनवरी 2019 को बिंदु कनकदुर्गा (45) और बिंदु अम्मिनी (46) ने पुलिस सुरक्षा में सबरीमाला मंदिर में प्रवेश किया। वे ऐसा करने वाली पहली महिलाएं थीं। दोनों ने मंदिर में जाने के लिए पारंपरिक काले कपड़े पहने।
सुप्रीम कोर्ट में 50 से ज्यादा रिव्यू पिटीशन
धार्मिक स्थलों पर महिलाओं के साथ भेदभाव से जुड़े ये सवाल पिछले 26 साल से देश की अलग-अलग अदालतों में पेंडिंग हैं। सुप्रीम कोर्ट में आज से 22 अप्रैल तक 50 से ज्यादा याचिकाओं पर अंतिम सुनवाई कर रही है।
सुप्रीम कोर्ट में रिव्यू पिटीशनरों और उन्हें सपोर्ट करने वाले 7 अप्रैल से 9 अप्रैल तक, जबकि विरोध करने वाले 14 अप्रैल से 16 अप्रैल तक दलीलें दे सकेंगे।
दरअसल, सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट सबरीमाला के अलावा मस्जिदों में महिलाओं की एंट्री, दाऊदी बोहरा समुदाय में महिला का खतना और दूसरे धर्म में शादी करने वाली पारसी महिलाओं को धार्मिक स्थलों में जाने का अधिकार मिले या नहीं, कोर्ट इस पर भी फैसला करेगा।
9 जजों की बेंच के सामने सुनवाई के 5 मुद्दे
1. सबरीमाला मंदिर में महिलाओं का प्रवेश: 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने सभी उम्र की महिलाओं को मंदिर में प्रवेश का अधिकार दिया था। अब बड़ी पीठ तय करेगी कि यह फैसला सही था या नहीं। इस फैसले के खिलाफ मंदिर के पुजारी और कुछ संस्थाओं ने पुनर्विचार याचिकाएं दायर की हैं।
2. दाऊदी बोहरा समुदाय में महिलाओं का खतना: दाऊदी बोहरा समुदाय में महिला खतना के मुद्दे पर 2017 में एडवोकेट सुनीता तिवारी ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी। कोर्ट यह तय करेगा कि क्या यह प्रथा मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है?
3. मस्जिदों में महिलाओं का प्रवेश: यास्मीन जुबैर अहमद पीरजादा नाम की महिला ने 2016 में मुस्लिम महिलाओं के मस्जिद में प्रवेश के लिए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की। कोर्ट तय करेगा कि क्या मुस्लिम महिलाओं को मस्जिद में नमाज पढ़ने से रोका जा सकता है?
4. पारसी महिलाओं का अग्निमंदिर में प्रवेश: 2012 में पारसी महिला गुलरुख एम गुप्ता ने हिंदू व्यक्ति से शादी के बाद अग्नि मंदिर में प्रवेश से रोके जाने के खिलाफ बॉम्बे हाईकोर्ट में याचिका दायर की। मामला अब सुप्रीम कोर्ट में है, जो तय करेगा कि क्या गैर-पारसी से शादी करने पर पारसी महिला को मंदिर में प्रवेश से रोका जा सकता है।
5. मुस्लिम पर्सनल लॉ से जुड़े लैंगिक भेदभाव के प्रश्न: धार्मिक गतिविधियों में जेंडर के आधार पर भेदभाव को क्या मौलिक अधिकार का हनन माना जा सकता है?
सुप्रीम कोर्ट ने फैसला बरकरार रखा तो क्या बदलेगा

धार्मिक स्थलों पर महिलाओं के साथ भेदभाव का मामले से जुड़ी सुनवाई की पल-पल की अपडेट्स के लिए नीचे ब्लॉग से गुजर जाएं…
अपडेट्स
14 मिनट पहले
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भास्कर नॉलेज: जानिए क्या है आर्टिकल 25 (2) (b) और आर्टिकल 26(b)
जस्टिस नागरत्ना देवरू मंदिर मामले जिक्र किया। कहा कि सुप्रीम कोर्ट संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 पर विचार करेगा, जो धर्म की स्वतंत्रता और धार्मिक समूहों के अधिकारों से जुड़े हैं।
1. आर्टिकल 25(2)(b): समाज सुधार के लिए:
ये आर्टिकल सरकार को शक्ति देता है कि वह हिंदुओं के धार्मिक संस्थानों ‘समाज के सभी वर्गों’ के लिए खोलने का कानून बना सके।
उदाहरण: अगर कोई मंदिर कहता है कि यहां अमुक जाति के लोग नहीं आएंगे, तो सरकार इस आर्टिकल का इस्तेमाल करके उन्हें अंदर जाने का हक दिला सकती है। इसे समाज सुधार माना जाता है।
2. आर्टिकल 26(b): धार्मिक आजादी का अधिकार
यह आर्टिकल किसी भी धार्मिक संप्रदाय को यह हक देता है कि वह अपने धार्मिक मामलों में फैसले खुद ले सकते हैं।
उदाहरण: कोई मंदिर अपनी पूजा की पद्धति क्या रखेगा, कौन से मंत्र पढ़ेगा या कौन सी विशेष परंपरा निभाएगा, इसमें सरकार दखल नहीं देगी।
क्या है देवरू मामला: देवरू मामला 1958 में सुप्रीम कोर्ट का एक ऐतिहासिक फैसला है। कर्नाटक के देवरू में श्री वेंकटरमण मंदिर है। इसे ‘गौड़ा सारस्वत ब्राह्मण’ समुदाय चलाता था। सरकार ने एक कानून बनाया कि सभी हिंदू मंदिर दलितों के लिए खोले जाएंगे।
इसपर मंदिर ने कहा कि ये हमारा निजी मंदिर है। हमें आर्टिकल 26(b) के तहत अपने धार्मिक मामलों को खुद मैनेज करने का हक है, इसलिए हम तय करेंगे कि कौन अंदर आएगा और कौन नहीं।
लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मंदिर सबके लिए खोलना जरूरी है पर कुछ विशेष अवसरों पर मंदिर का समुदाय बाहरी लोगों अंदर आने से को रोक सकता है।
10:57 AM7 अप्रैल 2026
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सबरीमाला मंदिर में महिलाओं की एंट्री विवाद की टाइम लाइन

10:52 AM7 अप्रैल 2026
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SG मेहता बोले- दरगाह कमेटी के मामले में अलग नजरिया अपनाया गया
SG मेहता: अब मैं ‘दरगाह कमेटी’ मामले पर आता हूं, इस मामले में पहले के फैसलों से हटकर नया नजरिया अपनाया है, जिसमें यह कहा गया है कि ‘आवश्यक धार्मिक प्रथा’ ही किसी मामले को परखने का सही मापदंड है। मेरा निवेदन है कि न्यायिक व्याख्या के आधार पर दिया गया यह कथन गलत है, क्योंकि यह निष्कर्ष न तो आर्टिकल 25 और आर्टिकल 26 से निकलता है और न ही ‘शिरूर मठ’ मामले में दिए गए फैसले से।
जस्टिस नागरत्ना: देवरू मामले में, आर्टिकल 25(2)(b) के बजाय आर्टिकल 26(b) लागू होने की संभावना हो सकती है।
SG मेहता: जी हां, बिल्कुल।
जस्टिस नागरत्ना: लेकिन आपने यह बात नहीं कही।
(आज की बहस पूरी हुई, कल जारी रहेगी)
10:17 AM7 अप्रैल 2026
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SG मेहता बोले- सबरीमाला मामले में गलत फैसला दिया गया था
SG मेहता ने कहा कि मैं अभी सबरीमाला मामले पर कोई बात नहीं कर रहा हूं। फिलहाल, आप सभी कानून से जुड़े सवालों की जांच कर रहे हैं। इसलिए अभी इस चर्चा को ‘सुई जेनेरिस’ (सुई जेनेरिस-अद्वितीय/विशेष प्रकृति) जैसे मामलों से प्रभावित होने देना सही नहीं होगा, हालांकि मेरा यह मानना है कि सबरीमाला मामले में गलत फैसला दिया गया था और उसे एक गलत कानून घोषित किया जाना चाहिए।
इस नियम को लागू करते हुए, अगर अपील करने वालों की बात मान ली जाए, तो आर्टिकल 25(2)(b) अलग-अलग धार्मिक मंदिरों पर लागू होने में पूरी तरह से बेकार हो जाएगा, हालांकि, उस आर्टिकल की भाषा में वे शामिल हैं। दूसरी ओर यदि प्रतिवादियों की दलील को स्वीकार कर लिया जाता है तो धर्म से जुड़े सभी मामलों में अनुच्छेद 26(b) को पूर्ण प्रभाव दिया जा सकता है। बशर्ते इसके कि इन मामलों के एक विशिष्ट पहलू यानी पूजा के लिए मंदिर में प्रवेश के संबंध में अनुच्छेद 25(2)(b) के तहत घोषित अधिकार ही प्रभावी माने जाएंगे।
जहां एक ओर, पहले मामले में, अनुच्छेद 25(2)(b) पूरी तरह से निष्प्रभावी हो जाएगा; वहीं दूसरी तरफ उस प्रावधान और अनुच्छेद 26(b)- दोनों को ही प्रभावी बनाया जा सकता है। अब यह आपको तय करना है कि उन्होंने ऐसा किसी खास मामले की वजह से किया या कानून के किसी सिद्धांत की वजह से। मेरी राय में, यह कानून का एक सिद्धांत है।

10:17 AM7 अप्रैल 2026
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SG मेहता ने अमेरिकन-ऑस्ट्रेलियन केस का जिक्र किया
केंद्र की ओर से पेश SG मेहता ने कहा- इस बारे में हम कुछ अमेरिकन और ऑस्ट्रेलियन केस का जिक्र कर सकते हैं, जो सभी ‘जेहोवाज विटनेसेज’ नाम के धार्मिक संगठन से जुड़े लोगों की एक्टिविटीज से पैदा हुए थे। ऑस्ट्रेलिया, यूएसए और दूसरे देशों में ढीले-ढाले तरीके से ऑर्गनाइज किए गए लोगों का यह संगठन बाइबल की सीधी-सादी व्याख्या को सही धार्मिक विश्वासों के लिए जरूरी मानता है। बाइबल की सबसे बड़ी अथॉरिटी में यह विश्वास उनके कई पॉलिटिकल विचारों को प्रभावित करता है।
वे राजा या किसी दूसरी बनी हुई इंसानी अथॉरिटी के लिए वफादारी की शपथ लेने से मना कर देते हैं और यहां तक कि नेशनल फ्लैग का भी सम्मान नहीं करते, और वे देशों के बीच सभी लड़ाइयों और सभी तरह के लड़ाई-झगड़ों की बुराई करते हैं।
1941 में ऑस्ट्रेलिया में बनी ‘जेहोवाज विटनेसेज’ की एक कंपनी ने उन मामलों की घोषणा और शिक्षा देना शुरू किया जो वॉर एक्टिविटीज और कॉमनवेल्थ की रक्षा के लिए नुकसानदायक थे और उनके खिलाफ स्टेट के नेशनल सिक्योरिटी रेगुलेशन के तहत कदम उठाए गए।
यह बात महत्वपूर्ण है कि अमेरिकी और ऑस्ट्रेलिया के संविधान में, धर्म की स्वतंत्रता के अधिकार को बिना किसी रोक-टोक या सीमा के, पूरी तरह से असीमित शब्दों में घोषित किया गया है। इसलिए इन देशों की अदालतों ने नैतिकता, व्यवस्था और सामाजिक सुरक्षा के आधार पर इस अधिकार के लिए कुछ सीमाएं लागू की हैं।
सबसे जरूरी बात यह है कि किसी धार्मिक संप्रदाय को खुद यह तय करने का अधिकार हो, जैसा कि ‘शिरूर मठ’ मामले में माना गया था, लेकिन ‘दरगाह कमेटी’ मामले में इस सिद्धांत से हटकर फैसला दिया गया।
‘रतिलाल पानचंद गांधी’ मामले के फैसले का हवाला देते हुए कहते हैं कि इस मामले में भी बेंच की संरचना लगभग वैसी ही है। मेरी राय में, यह फैसला भी वही दृष्टिकोण अपनाता है, क्योंकि दोनों ही मामलों में फैसला लिखने वाले जज एक ही थे।
वेंकटरमण देवरू केस संभवत: पहला और एकमात्र ऐसा फैसला है जिसमें संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 को एक साथ पढ़ा गया है। इस मामले में मुख्य चुनौती यह थी कि क्या अनुच्छेद 26(b) के तहत किसी धार्मिक संप्रदाय को दी गई गारंटीकृत स्वतंत्रता के अधिकार को, अनुच्छेद 25(2)(b) के तहत कंट्रोल किया जा सकता है।
09:39 AM7 अप्रैल 2026
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केंद्र बोला- धर्म का जरूरी हिस्सा क्या है, इसके सिद्धांत के आधार पता लगाया जाए
केंद्र की ओर से पेश SG मेहता ने कहा- हमें लगता है कि इतने बड़े पैमाने पर कही गई बात का समर्थन नहीं किया जा सकता। सबसे पहले किसी धर्म का जरूरी हिस्सा क्या है, यह मुख्य रूप से उस धर्म के सिद्धांतों के आधार पर ही पता लगाया जाना चाहिए।
अगर हिंदुओं के किसी धार्मिक पंथ के नियम यह कहते हैं कि दिन के खास समय पर मूर्ति को भोग लगाया जाना चाहिए, साल के कुछ खास समय पर एक खास तरीके से समय-समय पर रस्में की जानी चाहिए, रोज पवित्र ग्रंथों का पाठ किया जाना चाहिए, पवित्र अग्नि में हवन किया जाना चाहिए, तो इन सभी को धर्म का हिस्सा माना जाएगा।
सिर्फ इस बात से कि उनमें पैसा खर्च होता है या पुजारियों और सेवकों को काम पर रखा जाता है या बिकने वाली चीजों का इस्तेमाल होता है, वे कमर्शियल या आर्थिक तरह की सेक्युलर गतिविधियां नहीं बन जाएंगी, वे सभी धार्मिक हैं।
आर्टिकल 25(2)(a) में जिस बारे में सोचा गया है, वह राज्य के धार्मिक रीति-रिवाजों का रेगुलेशन नहीं है, जिसकी आजादी संविधान की गारंटी में दी गई है, सिवाय तब जब वे पब्लिक ऑर्डर, हेल्थ और नैतिकता के खिलाफ हों, बल्कि उन गतिविधियों का रेगुलेशन है जो अपने तरीके से आर्थिक, कमर्शियल या पॉलिटिकल हैं, भले ही वे धार्मिक रीति-रिवाजों से जुड़ी हों।
इस बारे में हम कुछ अमेरिकन और ऑस्ट्रेलियन केस का जिक्र कर सकते हैं, जो सभी “जेहोवाज विटनेसेज” नाम के धार्मिक संगठन से जुड़े लोगों की एक्टिविटीज से पैदा हुए थे।
09:33 AM7 अप्रैल 2026
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लंच के बाद दोबारा सुनवाई शुरू
SG मेहता: बेंच की संरचना पर गौर करें, क्योंकि रतिलाल गांधी मामला इसके दो दिन बाद का है। शिरूर मठ मामले में, हिंदू बंदोबस्ती अधिनियम के तहत एक योजना बनाने का निर्देश जारी किया गया था, और उस अधिनियम को भी चुनौती दी गई थी। दो कार्यवाहियां दायर की गईं- एक दीवानी मुकदमा और दूसरी रिट पिटीशन।
SG मेहता: शिरूर मठ मामले के अनुसार, अनुच्छेद 26(b) एक स्वतंत्र प्रावधान है और इसमें कोई हस्तक्षेप नहीं किया जा सकता। यहीं पर दरगाह समिति का फैसला गलत हो जाता है- धर्म का अभिन्न अंग, न कि अनिवार्य अंग।
जस्टिस नागरत्ना: अनुष्ठान कोर्ट के फैसलों का विषय नहीं हो सकते।
जस्टिस आर महादेवन: एक किताब है जिसका नाम ‘रियाद-उस-सालिहीन’ है, जो अबू जकारिया अल-नवावी की लिखी गई हदीसों का संग्रह है। यह आत्म-साक्षात्कार के बारे में बात करती है। इसी तरह का सिद्धांत दक्षिण भारत के कुछ हिस्सों में विशेष रूप से तमिलनाडु में, शैव धर्म में भी देखने को मिलता है। वह भी आत्म-साक्षात्कार की बात करता है।
SG मेहता: इसमें कोई द्वैत नहीं है। आदि शंकराचार्य भी यही कहते हैं कि कोई द्वैत नहीं है। आप ही ब्रह्म हैं और ब्रह्म आपके भीतर ही है।

08:33 AM7 अप्रैल 2026
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सबरीमाला केस में सुनवाई के दौरान SG की दलीलें 4 पॉइंट्स में…
- कोर्ट को सीमित दखल देना चाहिएहर धार्मिक प्रथा में कोर्ट का हस्तक्षेप सही नहीं।
- आवश्यक धार्मिक प्रथा (ERP) का सम्मानअगर कोई प्रथा धर्म का मूल हिस्सा है, तो उसे बचाया जाना चाहिए।
- सभी धर्मों पर समान सिद्धांत लागू होंसिर्फ एक मंदिर नहीं, बल्कि सभी धर्मों के मामलों पर समान दृष्टिकोण जरूरी है।
- संतुलन जरूरीमौलिक अधिकार (Equality) और धार्मिक स्वतंत्रता के बीच संतुलन बनाया जाए।
07:28 AM7 अप्रैल 2026
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जस्टिस नागरत्ना बोलीं- महिला की महीने के 3 दिन अछूत मानें, चौथे दिन अछूतपन नहीं, ऐसा कैसे
जस्टिस नागरत्ना: सबरीमाला के मामले में ‘अनुच्छेद 17’ को किस तरह से दलील के तौर पर पेश किया जा सकता है, यह मेरी समझ से बाहर है। एक महिला होने के नाते मैं यह कहना चाहूंगी कि ऐसा नहीं हो सकता कि हर महीने तीन दिन तक तो उसे ‘अछूत’ माना जाए और चौथे दिन अचानक कोई ‘अछूतपन’ न रह जाए।
SG मेहता: मैं यहां ‘मासिक धर्म’ या मेन्स्ट्रुएशन के मुद्दे पर बात नहीं कर रहा हूं।
जस्टिस नागरत्ना : एक महिला होने के नाते मैं फिर यही कहूंगी कि ‘अनुच्छेद 17’ सिर्फ तीन दिनों के लिए लागू नहीं हो सकता और चौथे दिन अचानक उसका प्रभाव खत्म नहीं हो सकता।
SG मेहता: मैं सबरीमाला का बचाव अपने ही एक अलग अंदाज में करूंगा, यहां बात सिर्फ ‘चार दिनों’ की नहीं है, बल्कि यह एक विशिष्ट ‘आयु-वर्ग’ से जुड़ा मामला है। भगवान अय्यप्पा के मंदिर पूरी दुनिया में महिलाओं के सभी वर्गों के लिए खुले हुए हैं, सिवाय एक विशेष मंदिर के, जिसका मामला अपने आप में बिल्कुल अनोखा है। दिल्ली में भगवान अय्यप्पा के तीन मंदिर हैं, जो सभी के लिए खुले हैं।
SG मेहता: हमें हर संप्रदाय की प्रथाओं का सम्मान करना चाहिए, हर चीज गरिमा या शारीरिक स्वतंत्रता से जुड़ी नहीं होती। अगर मैं किसी मजार या गुरुद्वारे जाता हूं और मुझे अपना सिर ढकना पड़ता है, तो मैं यह नहीं कह सकता कि मेरी गरिमा, अधिकार या पसंद मुझसे छीन ली गई है।
SG मेहता: जब हम गुरुद्वारे या अजमेर शरीफ जाते हैं, तो हम अपना सिर ढकते हैं। अब एक नया न्यायशास्त्र विकसित हुआ है। हिंदुओं के सभी वर्गों का मतलब है कि कोई जाति-आधारित भेदभाव नहीं होगा।
जस्टिस बागची: सवाल है यही तो है कि क्या धार्मिक संप्रदाय का प्रबंधन अनुच्छेद 25 (हर किसी के अंतरात्मा के अधिकार) पर भारी पड़ता है?
SG मेहता: मेरा तर्क यह नहीं है। अनुच्छेद 26(b) अपने आप में कंप्लीट नहीं है, इसे अनुच्छेद 25 के साथ मिलाकर पढ़ा जाना चाहिए। अनुच्छेद 25 और 26, अनुच्छेद 14 और 15 से कंट्रोल होंग। मैं इसे बहुत बढ़ा-चढ़ाकर पेश नहीं कर रहा हूं।
एक मत यह है कि अनुच्छेद 26 पर कोई रोक नहीं है, लेकिन मैं यह नहीं कह रहा हूं कि कोई एक अनुच्छेद अपने आप में एक अलग इकाई हो सकता है। कुछ तर्क ऐसे भी हैं जिनके अनुसार अनुच्छेद 26(b) को अनुच्छेद 25(2)(b) के साथ मिलाकर नहीं पढ़ा जा सकता, और इसके तहत कोई सामाजिक सुधार नहीं किया जा सकता।
SG मेहता: सबरीमाला एक देवता के गुण से जुड़ा विषय है, इसकी न्यायिक जांच कैसे की जा सकती है?
07:22 AM7 अप्रैल 2026
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SG मेहता की बेंच को दलील
SG मेहता ने कहा- संवैधानिक दृष्टि से इसका जवाब यह होगा कि इसका समाधान ‘अनुच्छेद 25(2)(b)’ में है, यानी संसद इस पर कानून बना सकती है।
सबरीमाला मामले में एक राय यह थी कि ‘अनुच्छेद 17’ महिलाओं पर भी लागू होता है कि आप उनके साथ ‘अछूतों’ जैसा बर्ताव कर रहे हैं, मुझे इस पर कड़ी आपत्ति है।
भारत उतना ‘पितृसत्तात्मक’ या ‘लैंगिक रूढ़ियों’ से ग्रस्त समाज नहीं है, जितना कि पश्चिमी दुनिया इसे समझती है।
07:14 AM7 अप्रैल 2026
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‘धार्मिक प्रथा’ को लेकर SG मेहता की बेंच को दलीलें
SG मेहता: महोदय, सबसे पहले यह तय करना होगा कि ‘धार्मिक प्रथा’ किसे कहते हैं। उसके बाद यह तय करना होगा कि ‘आवश्यक धार्मिक प्रथा’ किसे कहते हैं।
जस्टिस बागची: आस्था पर राय और मानी गई आस्था में अंतर होता है। किसी की कोई विशेष आस्था हो सकती है, लेकिन उस संप्रदाय में राय का अस्तित्व है या नहीं, यह स्वयं आस्था की जांच से अलग है।
जस्टिस बागची: आस्था कहती है कि यह मेरी आस्था है और अनुयायी इसका पालन करते हैं। धार्मिक नेता ने जो कहा वही विश्वास न्यायालय के अधिकार क्षेत्र में आता है, जिसके तहत उचित कानूनी प्रक्रिया अपनाई जा सकती है, लेकिन क्या वह विश्वास वास्तव में मौजूद है, यह निर्णय धार्मिक नेता को करना है।
यह एक अनूठा मामला है, जिसे मौलिक कर्तव्यों के संदर्भ में समझा जा सकता है। ऐसा कोई विश्वास हो सकता है जिसे वैज्ञानिक सोच शायद न सुलझा पाए, लेकिन यह शायद सवाल न हो; बल्कि सवाल यह हो सकता है कि क्या किसी धार्मिक संप्रदाय के सदस्यों के बीच ऐसा विश्वास वास्तव में मौजूद था।
SG मेहता: लेकिन यह नहीं कि क्या यह एक अनिवार्य धार्मिक प्रथा है। महोदय, अगर आपको लगता है कि कोई चीज अवैज्ञानिक है, तो उसका समाधान विधायिका के पास है। लेकिन अगर इस मामले की गहराई में जाना है, तो उसका समाधान एक ‘दीवानी मुकदमा’ है, जहां दोनों पक्ष सबूत और विशेषज्ञ गवाह पेश कर सकते हैं। ऐसा नहीं हो सकता कि हलफनामे में ऐसी कोई भी बात न हो जिससे यह साबित हो सके कि यह कोई अनिवार्य धार्मिक प्रथा नहीं है।
जस्टिस बागची: आपकी दलील इस बात पर आधारित नहीं है कि यह मामला अदालत के अधिकार में आता है या नहीं।
SG मेहता: यह मामला अदालत के विचारणीय क्षेत्र में भी आता है, और ज़्यादातर मामलों में, यह भी तय करता है कि किस मंच पर इसकी सुनवाई होनी चाहिए। कुछ धर्मों में कुछ लोग यह दावा करते हैं कि ‘नरबलि’ देने का अधिकार एक पुरानी प्रथा रही है और यह एक अनिवार्य हिस्सा है लेकिन इसके समर्थन में कोई सबूत पेश नहीं किया जाता। अगर ऐसे कुछ उदाहरण सामने आते हैं जो सीधे तौर पर सार्वजनिक स्वास्थ्य या नैतिकता को नुकसान पहुंचाते हैं, तो इस बात की जांच की जरूरत नहीं है कि वह कोई ‘अनिवार्य धार्मिक प्रथा’ है या नहीं।

07:06 AM7 अप्रैल 2026
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SG मेहता की दलील पर जस्टिस अमनुल्लाह, जस्टिस बागची और जस्टिस सुंदरेश के सवाल
जस्टिस अमनुल्लाह: क्या आप यह कहना चाह रहे हैं कि अदालत को ‘आवश्यक धार्मिक प्रथा’ के दायरे में दखल नहीं देना चाहिए?
जस्टिस बागची: अगर आपकी इस दलील को उसके तार्किक निष्कर्ष तक ले जाया जाए, तो यह बात सामने आती है कि अदालतें विज्ञान की विशेषज्ञ नहीं होतीं; लेकिन ‘साक्ष्य अधिनियम’ अदालतों को यह अधिकार देता है कि वे विशेषज्ञों की राय की जांच-परख कर सकें, और इस तरह अदालतें ‘विशेषज्ञों की भी विशेषज्ञ’ बन जाती हैं।
जस्टिस सुंदरेश: शायद इन दोनों के बीच मुख्य अंतर यह है कि विज्ञान तर्क और विवेक पर आधारित होता है, जबकि धर्म आस्था और विश्वास पर आधारित होता है।
07:03 AM7 अप्रैल 2026
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SG मेहता ने अनुच्छेद 25 पर सबरीमाला को लेकर दलील दी
SG मेहता: अब तक अनुच्छेद 25 में इसके सब सेक्शन नहीं थे, क्योंकि कोई भी धार्मिक संप्रदाय किसी खास वर्ग को रोक सकता है, लेकिन सबरीमाला मामले में इस बात पर ध्यान नहीं दिया गया।
इसमें कहा गया है कि सबरीमाला कोई धार्मिक संप्रदाय नहीं है और इसलिए उसे अनुच्छेद 25 और 26 के तहत कोई सुरक्षा प्राप्त नहीं है। मैंने निजामुद्दीन या शिरडी का उदाहरण दिया था, जहां सभी लोग जाते हैं।
मैं ऐसे 50 उदाहरण दे सकता हूं, जहां सभी समुदायों के लोग जाते हैं। जैसे श्रीनाथ जी का मंदिर, वहां शैव भी जाते हैं। आप यह नहीं कह सकते कि यह पूरी तरह से केवल वैष्णव संप्रदाय का ही है।
दरगाह कमेटी के मामले में 5 जजों की बेंच ने यह माना था कि यह एक धार्मिक संप्रदाय है और उनका यह फैसला बिल्कुल सही था। दरगाह कमेटी के मामले में एकमात्र समस्या यह थी कि इसमें पहली बार ‘आवश्यक धार्मिक प्रथा’ की अवधारणा पेश की गई थी, और बात यहां तक कह दी गई थी कि अंधविश्वास को कोई सुरक्षा नहीं है, जबकि ऐसे मामलों पर अदालतें निश्चित रूप से कोई फैसला नहीं दे सकतीं।
ऐसे कई कानून मौजूद हैं जो काला जादू जैसे अंधविश्वासों को रोकने का काम करते हैं।
06:52 AM7 अप्रैल 2026
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SG मेहता की दलील- हमें छुआछूत खत्म करनी ही होगी
SG मेहता ने कहा- 1 मई 1947 को के. मुंशी ने एक खास प्रावधान जोड़ने का प्रस्ताव रखा कि धार्मिक स्वतंत्रता, हिंदू धार्मिक संस्थाओं को सभी वर्गों के लिए खोलने वाले कानूनों को नहीं रोकेगी। यह प्रावधान सीधे तौर पर दलितों और निचली जातियों के बहिष्कार पर निशाना था।
हम एक ऐसे समाज में रह रहे थे जहां हिंदुओं के एक खास हिस्से को व्यापक हिंदू धर्म का हिस्सा बनने की अनुमति नहीं थी, लेकिन इसका लिंग से कोई लेना-देना नहीं है। यह उस दौर के लिए एक खास प्रावधान था कि कोई भी सार्वजनिक मंदिर या सार्वजनिक धार्मिक संस्थान, सभी के लिए खुला होना चाहिए, हमें छुआछूत को खत्म करना ही होगा। मैं यह इसलिए कह रहा हूं, क्योंकि एक फैसले में यह कहा गया है कि इसका मकसद महिलाओं को मंदिरों में प्रवेश की अनुमति देना था।
यह उस दौर के लिए एक खास प्रावधान था कि कोई भी सार्वजनिक मंदिर या सार्वजनिक धार्मिक संस्थान, सभी के लिए खुला होना चाहिए; हमें छुआछूत को खत्म करना ही होगा। मैं यह इसलिए कह रहा हूं, क्योंकि एक फैसले में यह कहा गया है कि इसका मकसद महिलाओं को मंदिरों में प्रवेश की अनुमति देना था।
06:45 AM7 अप्रैल 2026
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SG मेहता बोले- संवैधानिक नैतिकता एक राजनीतिक सिद्धांत
SG मेहता ने कहा- अब ‘संवैधानिक नैतिकता’ की अवधारणा सामने आती है। मैं बताना चाहूंगा कि इसे एक अलग अध्याय के रूप में क्यों रखा गया है। संवैधानिक नैतिकता एक राजनीतिक सिद्धांत है। यह इस बात से जुड़ा है कि संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों से किस तरह के आचरण, कार्य-शैली और कामकाज की अपेक्षा की जाती है। खास तौर पर उन क्षेत्रों में जहां संविधान में कोई स्पष्ट निर्देश नहीं दिया गया है।
ऐसी हालात में कुछ विशिष्ट परिपाटियां बन जाती हैं और इन्हें ‘संवैधानिक नैतिकता कहते हैं। हालांकि, पिछले कुछ समय में संवैधानिक नैतिकता अपने मूल अर्थ से हट गई है और इसे ज्यूडीशियल रिव्यू के स्टैंडर्ड के रूप में माना जाने लगा है। यह कभी भी इसकी मूल अवधारणा नहीं थी। संवैधानिक नैतिकता का अर्थ है- संवैधानिक पदाधिकारियों को किस तरह काम करना चाहिए।
06:43 AM7 अप्रैल 2026
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जस्टिस नागरत्ना बोलीं- जबरन धर्मांतरण और धर्म प्रचार करने में अंतर
जस्टिस नागरत्ना: जबरदस्ती धर्मांतरण और धर्म का प्रचार करने में अंतर है। SG: हां, यदि आप किसी का धर्मांतरण जबरदस्ती या धोखाधड़ी के आधार पर कर रहे हैं, तो वह धर्मांतरण नहीं माना जाएगा।
06:37 AM7 अप्रैल 2026
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SG मेहता ने कहा- बिल्कुल, इसका लैंगिक समानता से कोई लेना-देना नहीं
SG मेहता- बिल्कुल, इसका लैंगिक समानता से कोई लेना-देना नहीं है। पहले धार्मिक पूजा शब्द का इस्तेमाल किया जाता था, लेकिन राजकुमारी कौर ने आपत्ति जताई। उन्होंने कहा कि इससे कुछ सुधार निरर्थक हो सकते हैं।
संविधान सभा की दो प्रख्यात महिला सदस्य राजकुमारी अमृत कौर और हंसा मेहता के सुझाव के कारण ही अनुच्छेद 25(2)(b) को संविधान में शामिल किया गया।
इस बात पर भी चर्चा हुई थी कि धर्मांतरण को एक मौलिक अधिकार के रूप में अनुमति दी जानी चाहिए और इसलिए संविधान में ‘प्रचार’ शब्द को भी जोड़ा जाना चाहिए।
06:36 AM7 अप्रैल 2026
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जस्टिस नागरत्ना- कोई भी धर्म दूसरे धर्म से श्रेष्ठ नहीं
जस्टिस नागरत्ना ने कहा- कोई भी धर्म दूसरे धर्म से श्रेष्ठ नहीं है।
06:35 AM7 अप्रैल 2026
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SG मेहता बोले- संविधानसभा निर्माताओं ने संविधान में समान अधिकार’ वाली बात जोड़ी
SG मेहता ने कहा- 3 अप्रैल को सांप्रदायिक दंगे भड़क रहे थे और संविधान निर्माताओं को इस बात की चिंता थी कि कोई एक धर्म अपनी संख्या-बल के आधार पर अपनी श्रेष्ठता का दावा कर सकता है, इसलिए उन्होंने इसमें ‘समान अधिकार’ वाली बात जोड़ी, इसका लैंगिक समानता से कोई लेना-देना नहीं था। पुरुषों और महिलाओं, दोनों को ही समान अधिकार प्राप्त हैं।
06:34 AM7 अप्रैल 2026
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SG मेहता बोले- धर्म का प्रथा को प्रतिबंधित करना करने का असर सामाजिक सुधारों पर
SG मेहता ने कहा- हंसा मेहता और राजकुमारी अमृत कौर ने यह बात उठाई थी कि यदि आप ‘धर्म के अधिकार’ की बात करते हैं और कोई धर्म किसी प्रथा को प्रतिबंधित करता है, तो ऐसा करने से आप सभी सामाजिक सुधारों को ही बेअसर कर देंगे।
27 मार्च 1947 को सब कमेटी ने धर्मांतरण-विरोधी विषय पर मुंशी के प्रस्ताव को मान लिया। 31 मार्च को राजकुमारी ने अपनी और मेहता की ओर से सर बी.एन. राव को पत्र लिखकर कहा कि बाल विवाह जैसी कई दमनकारी प्रथाओं को धर्म के नाम पर सही ठहराया जाता है।
उन्होंने सुझाव दिया कि हमें ‘धर्म’ शब्द का प्रयोग नहीं करना चाहिए, बल्कि इसके स्थान पर किसी अन्य शब्द का इस्तेमाल करना चाहिए। मौलिक अधिकारों पर सब कमेटी का पहला जॉइंट ड्राफ्ट जिसमें ‘आचरण’ और ‘घोषणा’ शब्द तो शामिल थे, लेकिन ‘प्रचार’ शब्द नहीं था, ‘सभी व्यक्तियों को समान अधिकार प्राप्त हैं’, यह बात पहली बार इसमें शामिल की गई थी।
सबरीमाला मामले में यह व्याख्या की गई है कि ‘समान अधिकार’ में लैंगिक समानता भी शामिल है; लेकिन मेरा यह तर्क है कि लैंगिक समानता का ध्यान तो अनुच्छेद 14 और 15 में पहले से ही रखा गया है।
06:32 AM7 अप्रैल 2026
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जस्टिस नागरत्ना: हम उन्हें संविधान की ‘संस्थापक माताएं’ कहते हैं
जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि हम उन्हें संविधान की ‘संस्थापक माताएं’ कहते हैं।
06:31 AM7 अप्रैल 2026
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SG मेहता बोले- हम पितृसत्ता-सामान्य रूढ़ियों जैसी अवधारणा यहां न थोपें
SG मेहता ने कहा- संविधान सभा की बहसों से पहले, कई समितियां बनाई गई थीं। इसका पहला ड्राफ्ट कन्हैयालाल मुंशी ने तैयार किया था। हालिया कुछ फैसलों में पितृसत्तात्मक समाज की अवधारणाएं देखने को मिलती हैं, जबकि मूल रूप से ऐसी कोई बात नहीं थी। हम ही एकमात्र ऐसा समाज हैं, जहां महिलाओं की पूजा की जाती है। इसलिए हम पितृसत्ता और सामान्य रूढ़ियों जैसी अवधारणाओं को यहां न थोपें।
06:23 AM7 अप्रैल 2026
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SG मेहता बोले- बौद्ध धर्म कोई एक संप्रदाय नहीं है
SG तुषार मेहता ने कहा- बौद्ध धर्म कोई एक संप्रदाय नहीं है। हो सकता है कि हमारी ओर से कुछ कमी रही हो, जिसके कारण हमने यह बात नहीं उठाई कि इसमें आंतरिक विविधता मौजूद है। आप सभी को कई बातों पर फैसला लेना होगा, और सवाल यह है कि क्या कोर्ट के पास इस पर निर्णय लेने की विशेषज्ञता है?
उन्होंने कहा कि ईसाई धर्म में, सैद्धांतिक और मौलिक मतभेद हैं, लेकिन पवित्र ग्रंथ, बाइबिल, सभी के लिए समान है। मुख्य विषय पर एक बात छूट गई थी – जब हमने अनुच्छेद 25 और 26 की व्याख्या की, तो इसकी व्याख्या संविधान की प्रस्तावना के आधार की जानी चाहिए।
इसे आस्था और विश्वास को ध्यान में रखते हुए समझा जाना चाहिए। यह इसलिए जरूरी है क्योंकि ‘जरूरी धार्मिक प्रथा’ का गैरजरूरी मुद्दा उठता है। आप इसका फैसला कैसे करेंगे? इसके लिए आपको धार्मिक ग्रंथों की जांच करनी होगी, जो तब तक असंभव है जब तक हम स्प्रिचुअल सुप्रीमेसी तक न पहुंच जाएं।

06:22 AM7 अप्रैल 2026
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जस्टिस बागची ने कहा- यह आयरलैंड के संविधान से लिया गया
जस्टिस बागची ने कहा- यह आयरलैंड के संविधान से लिया गया है।
06:21 AM7 अप्रैल 2026
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SG मेहता बोले- हमने अमेरिकी संविधान से कुछ स्वतंत्रताएं ली हैं
SG तुषार मेहता मे कहा- देखिए, ‘दशम’ (दसवां) दशनामी संप्रदाय का ही एक हिस्सा है। हर किसी का एक अलग नाम होता है। अगर मैं दशनामी संप्रदाय में दीक्षित होता हूं, मान लीजिए ‘तीर्थ’ के रूप में तो मेरा नाम अमुक तीर्थ होगा।
आप किसी संत के नाम से ही यह पहचान सकते हैं कि वह ‘गिरि’ संप्रदाय, ‘तीर्थ’ संप्रदाय, ‘भारती’ संप्रदाय या किसी अन्य संप्रदाय से जुड़े हैं। हर किसी की एक अलग पहचान होती है। हर किसी का तिलक अलग होता है। इसी से आप पहचानते हैं कि वह दशनामी परंपरा और किसी खास कैटेगरी से है।
यहां तक कि उनके सलाम भी अलग-अलग होते हैं। जैसे ही कोई ‘अलख निरंजन’ कहता है तो आप पहचान सकते हैं कि वह किस कैटेगरी से है। ये 9 कैटेगरी हैं। कानूनी भाषा में 10 कैटेगरी में वह होगी, जिसे हम रेसिड्यूअरी एंट्री कहते हैं। जो लोग एक से 9 के बीच नहीं आते हैं, या नहीं आना चाहते हैं, वे भी दसवीं कैटेगरी के तहत हिंदू ही होंगे।
इसमें नास्तिक भी शामिल हैं। इसमें वे लोग भी शामिल हैं जो किताबों में विश्वास करते हैं, जैसे सिख धर्म। इसमें वे लोग भी शामिल हैं जो मूर्ति पूजा में विश्वास नहीं करते हैं, और वे भी जो शायद किसी भी चीज में विश्वास न करते हों। तो मैं नास्तिक हो सकता हूं, मूर्ति पूजा न करने वाला, यहां तक कि चार्वाक फिलॉसफी को मानने वाला भी, और फिर भी हिंदू हो सकता हूं।
यह धर्म का विस्तार है जिसे हमें ध्यान में रखना होगा। मेरा उद्देश्य हिंदू धर्म और इस्लाम को एक ही संप्रदाय के रूप में न मानना है। इसलिए अनुच्छेद 26(b) में उन्होंने विशेष रूप से न केवल संप्रदाय बल्कि उसके अंतर्गत आने वाले वर्गों को भी शामिल किया है।
उदाहरण के तौर पर देखें तो शिरडी में सभी हिंदू संप्रदायों के लोग जाते हैं। यह किसी एक संप्रदाय तक सीमित नहीं बल्कि उसके हर वर्ग के लिए है। सबरीमाला उसके वर्गों पर विचार नहीं करता है।
निजामुद्दीन औलिया दरगाह में सभी हिंदू जाते हैं, हर कोई जाता है, आप इसे किस संप्रदाय के अंतर्गत रखेंगे? यह संप्रदायों के वर्गों का ही एक हिस्सा है। हमने अमेरिकी संविधान से कुछ स्वतंत्रताएं ली हैं, लेकिन अनुच्छेद 25 और 26 विशेष रूप से भारत के संदर्भ में तैयार किए गए हैं।
06:18 AM7 अप्रैल 2026
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जस्टिस बागची बोले- हम सुख की खोज को जॉन लॉक से जोड़ते हैं, लेकिन ये चार्वाक से जुड़ा
जस्टिस बागची ने कहा- हम सुख की खोज को जॉन लॉक से जोड़ते हैं, लेकिन वास्तव में यह चार्वाक से जुड़ा है। चार्वाक कहते हैं ‘यावज्जीवेत् सुखं जीवेत्, ऋणं कृत्वा घृतं पिबेत्।’ यह भौतिक सुख की बात करता है। भले ही इसके लिए किसी को कर्ज ही क्यों न लेना पड़े, लेकिन ऐसा भौतिक सुख का आनंद लेने के लिए ही किया जाता है। इसलिए अमेरिकी संविधान में वर्णित ‘खुशी की तलाश’ का संबंध, वास्तव में चार्वाक से ही है।
06:17 AM7 अप्रैल 2026
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SG मेहता बोले- जैन मोक्ष में विश्वास करते हैं
SG मेहता ने कहा- जैन मोक्ष में विश्वास करते हैं। उनके लिए कोई परलोक नहीं है। यही तो असली मुद्दा है। न तो हम इस विषय के विशेषज्ञ होने का दावा कर सकते हैं, और न ही आप।
06:16 AM7 अप्रैल 2026
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जस्टिस अमानुल्लाह बोले- जैन धर्म में पुनर्जन्म की मान्यता
जस्टिस अमानुल्लाह ने कहा- आप कहते हैं कि जैन धर्म में मृत्यु के बाद कोई जीवन नहीं होता, लेकिन जैन धर्म में तो पुनर्जन्म की मान्यता है। जब जैन और बौद्ध परलोक में विश्वास नहीं करते तो अवतारवाद क्यों?
06:10 AM7 अप्रैल 2026
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केंद्र से सुप्रीम कोर्ट से कहा- अदालत धार्मिक मामले में हस्तक्षेप न करें
केंद्र ने सुनवाई से पहले अपने लिखित जवाब में कहा (SG मेहता केंद्र का पक्ष रख रहे हैं) – सबरीमाला में 10 से 50 साल की महिलाओं के प्रवेश पर रोक इसलिए है क्योंकि भगवान अयप्पा को ‘नैष्ठिक ब्रह्मचारी’ माना जाता है, यानी उन्होंने जीवन भर ब्रह्मचर्य का पालन किया। इसका महिलाओं की शुद्धता या उनकी स्थिति से कोई संबंध नहीं है।
केंद्र सरकार ने कहा कि अगर महिलाओं को प्रवेश दिया जाता है, तो वहां की पारंपरिक पूजा-पद्धति बदल जाएगी। इससे संविधान द्वारा संरक्षित धार्मिक विविधता पर असर पड़ सकता है। सुप्रीम कोर्ट से अनुरोध किया कि केरलम के सबरीमाला में मासिक धर्म आयु की महिलाओं के प्रवेश पर लगी रोक को बरकरार रखा जाए।
केंद्र का कहना है कि यह मामला पूरी तरह धार्मिक आस्था और किसी विशेष धार्मिक समूह के अपने नियम तय करने के अधिकार से जुड़ा है, इसलिए इस पर अदालत को हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए।
05:58 AM7 अप्रैल 2026
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SG मेहता- इस्लाम का मतलब सिर्फ एक ही तरह का इस्लाम नहीं
SG तुषार मेहता- शिया और सुन्नी मुसलमान। जज साहब आप धर्मशास्त्र से जुड़े पहलुओं की जांच नहीं कर रहे हैं, लेकिन कोर्ट को इस बात पर जरूर विचार करना चाहिए कि ‘इस्लाम’ का मतलब सिर्फ एक ही तरह का इस्लाम नहीं है और न ही ‘हिंदू धर्म’ का मतलब सिर्फ एक ही तरह का हिंदू धर्म है। धर्म और धार्मिक मामलों की व्याख्या करते समय आप सभी को इस बात को अपने जहन में रखना चाहिए।

SG मेहता ने दलील में कहा- इसे व्यापक रूप से सनातन या हिंदू धर्म कहा जाता है, उसकी संरचना विशाल और बहुआयामी है। हमारे पास चार वेद हैं – ऋग्वेद, सामवेद, यजुर्वेद और अथर्ववेद, जो जीवन जीने के व्यवहार और उसके पहलुओं को बताते हैं। फिर हमारे पास उपवेद हैं, जिनमें धनुर्वेद, गंधर्ववेद, आयुर्वेद और अर्थशास्त्र शामिल हैं, जिनमें से अर्थशास्त्र आर्थिक पहलुओं पर ज्यादा फोकस्ड है।
वेदों के संरक्षण और समझ को सुगम बनाने के लिए 6 वेदांग हैंस जिनके नाम हैं- शिक्षा, व्याकरण, छंद, निरुक्त, ज्योतिष और कल्प। हमारे पास उपांग भी हैं। उनमें से एक धर्मशास्त्र है। याज्ञवल्क्य और पराशर जैसे ग्रंथों का नाम तुरंत ध्यान में आता है।
मेरी समझ के अनुसार, पतंजलि भी इसी श्रेणी में आते हैं। इसके अलावा पुराण हैं, जिनमें 18 महापुराण और 18 उपपुराण शामिल हैं साथ ही रामायण और महाभारत जैसे महाकाव्य भी हैं। हमारे पास मीमांसा और न्याय शास्त्र भी हैं। इन सभी की जड़ें आखिरकार वेदों में निहित हैं और इन्हें छह दर्शन प्रणालियों में संरचित किया गया है- न्याय, वैशेषिक, सांख्य, योग, पूर्व मीमांसा और उत्तर मीमांसा।
05:57 AM7 अप्रैल 2026
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SG मेहता- केंद्र सरकार ने भी कोई एक्स्ट्रीम रुख नहीं अपनाया है
SG तुषार मेहता ने कहा- केंद्र सरकार ने भी कोई एक्स्ट्रीम रुख नहीं अपनाया है। ‘श्रीर मठ’ से लेकर ‘सबरीमाला’ तक के मामलों में, तीन बातों पर ध्यान नहीं दिया गया…
1. संविधान सभा में हुई बहसें।
2. इस देश में धर्मों की विशालता और उनका व्यापक दायरा है। यह देश अपनी गौरवशाली धार्मिक विविधता के लिए जाना जाता है। इसकी सबसे खूबसूरत बात इसकी ‘आंतरिक विविधता’ है।
उदाहरण के लिए- हिंदू धर्म के भीतर ही कई उप-संप्रदाय हैं और हर उप-संप्रदाय की अपनी स्वतंत्र पहचान है। इस्लाम के साथ भी यही बात लागू होती है, हालांकि उसकी एक ही पवित्र किताब और एक ही संस्थापक हैं फिर भी उसके भीतर भी कई तरह की आंतरिक विविधताएं मौजूद हैं।
05:48 AM7 अप्रैल 2026
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SG मेहता- यह देखें हम आज कोर्ट में क्यों आए हैं
SG तुषार मेहता ने कहा- जब कोर्ट ने इस मामले को 9 जजों की बेंच के पास भेजा था, तब CJI गोगोई ने ही यह आदेश लिखा था, लेकिन उन्होंने ही ‘आदि शैव’ फैसला भी लिखा था, जिसमें ‘श्रीर मठ’ से लेकर आज तक के कानून का जिक्र किया गया है।
इन बातों को ध्यान में रखते हुए कृपया यह भी देखें कि हम आज कोर्ट के सामने क्यों आए हैं। अब समय आ गया है कि कोर्ट एक ज्यूडीशियल पॉलिसी बनाए, क्योंकि यह सिर्फ किसी एक फैसले के सही या गलत होने का मामला नहीं है।
ज्यूडीशियल पॉलिसी और किसी भी बात की आधिकारिक व्याख्या के लिए कम से कम 7 जजों की बेंच होनी चाहिए, क्योंकि ‘श्रीर मठ’ मामले में भी 7 जजों की बेंच ही थी। आपको अनुच्छेद 25(1) – धर्म, अनुच्छेद 25(2) – धार्मिक प्रथाएं और अनुच्छेद 26(b) – धर्म से जुड़े मामलों का प्रबंधन करने के अधिकार की व्याख्या करनी होगी।
05:45 AM7 अप्रैल 2026
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वकील सिंघवी- सिर्फ मुख्य पक्षों की दलीलें ही सुनी जाएं
सीनियर वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा- हर सवाल पर, आपको सिर्फ मुख्य पक्षों की दलीलें ही सुननी चाहिए।
CJI सूर्यकांत ने कहा- आपने समय-सीमाएं दी हैं, और मैंने अपने साथी जजों से सलाह-मशविरा कर लिया है। चलिए देखते हैं कि आगे क्या होता है।
05:44 AM7 अप्रैल 2026
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वकील इंदिरा जयसिंह बोलीं- हम स्पष्टीकरण चाहते हैं, क्या रिव्यू पिटीशन पर सुनवाई होगी?
सीनियर वकील इंदिरा जयसिंह ने कहा- हम एक स्पष्टीकरण चाहते हैं, क्या रिव्यू पिटीशन पर सुनवाई होगी? अगर इस पर सुनवाई होनी है, तो मेरा है कि यह याचिका सुनवाई के योग्य ही नहीं है। आपको सिर्फ रेफरेंस में पूछे गए सवालों पर ही फैसला देना है। पिछले फैसले में ‘स्टे’ (रोक) को लेकर कोई ‘मैंडेमस’ (आदेश) जारी नहीं किया गया था। हम पिछले फैसले की परवाह किए बिना, सिर्फ मौजूदा मुद्दों पर ही अपनी बात रखेंगे।
05:37 AM7 अप्रैल 2026
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सबरीमाला केस का कोर्ट रूम लाइव
SG तुषार मेहता: कई मुद्दों पर इसके परिणामों और प्रभावों को देखते हुए… हम भी यह नहीं चाहेंगे कि अदालत उन बातों के अलावा किसी और चीज पर विचार करे, जिन्हें विधिवत रूप से अदालत के सामने रखा गया है
CJI सूर्यकांत: हमारा इरादा दलीलों को सीमित करना नहीं, बल्कि उनके रिपीटेशन से बचना और सीधे मुद्दे पर आना है। अदालत अनुच्छेद 25 और 26 के दायरे में आने वाली जरूरी धार्मिक प्रथाओं के सिद्धांत और आस्था से जुड़े मामलों में न्यायिक समीक्षा की सीमा की जांच करेगी।
वकील राजीव धवन: यह कोर्ट अनुच्छेद 25 और 26 की फिर से जांच करेगा। अगर आपको लगता है कि आप और सुनना चाहेंगे, तो कृपया इसका ध्यान रखें।
CJI: हां, जब हम यहां से उठेंगे और देखेंगे कि हम कोई राय बनाने के लिए बात को समझ ही नहीं पाए, तो जाहिर है, हम भी इंसाफ नहीं कर पाएंगे।
CJI: वकीलों का एक ग्रुप इस बात पर दलील देगा कि कोर्ट को पर्सनल लॉ के मामलों में दखल देने का अधिकार है, दूसरा ग्रुप यह दलील देगा कि कोर्ट को धार्मिक रीति-रिवाजों की जांच करने का कोई अधिकार नहीं है, तीसरा ग्रुप यह दलील देगा कि गुंजाइश तो है, लेकिन उसका दायरा सीमित है और आखिरी ग्रुप यह दलील देगा कि कोर्ट हर मामले की स्थिति के हिसाब से दखल दे सकता है।
वकील धवन: अनुच्छेद 26 के तहत ‘संप्रदाय’ के कॉन्सेप्ट की जांच करनी होगी। अगर इस पर नजरिया छोटा रखा गया, तो सब कुछ इससे बाहर हो जाएगा।
CJI: रेफरेंस का तीसरा सवाल इस मुद्दे को कवर करेगा।

05:11 AM7 अप्रैल 2026
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9 जजों की संविधान बेंच 7 सवालों पर सुनवाई करेगी


05:07 AM7 अप्रैल 2026
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पिछली सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने 7 सवाल तय किए
13 जनवरी 2020 को सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि वह सीधे पुनर्विचार याचिकाओं पर नहीं, बल्कि आर्टिकल 25 (धार्मिक स्वतंत्रता) और आर्टिकल 14 (समानता) के बीच संतुलन, साथ ही आवश्यक धार्मिक प्रथाएं जैसे सिद्धांतों पर विचार करेगा।
14 से 23 जनवरी के बीच चली सुनवाई में याचिकाकर्ताओं ने महिलाओं के बहिष्कार को असंवैधानिक बताया, जबकि धार्मिक पक्ष ने आस्था और आर्टिकल 26 के तहत स्वतंत्रता का हवाला देते हुए न्यायिक हस्तक्षेप सीमित रखने की मांग की। इसी दौरान कोर्ट ने आवश्यक धार्मिक प्रथाएं और ज्यूडिशिअल रिव्यू की सीमाओं पर सवाल उठाए।
3 से 7 फरवरी के दौरान भी बहस जारी रही, जहां समानता बनाम धार्मिक स्वतंत्रता और न्यायिक सीमा के मुद्दों पर चर्चा हुई। लेकिन कोविड-19 के कारण सुनवाई रोक दी गई।
05:05 AM7 अप्रैल 2026
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सबरीमाला महिला एंट्री मामले पर किसने क्या कहा
केंद्र ने रुख बदला: केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के 2018-2019 के फैसले का समर्थन किया था। कहा था कि मंदिर में महिलाओं के प्रवेश होना चाहिए, लैंगिक समानता के खिलाफ कोई भी प्रथा नहीं होनी चाहिए। हालांकि बाद में रिव्यू स्टेज 2019–2020 के दौरान में केंद्र ने थोड़ा संतुलित रुख अपनाते हुए कहा कि मामला व्यापक संवैधानिक प्रश्नों (धर्म बनाम समानता) से जुड़ा है और इसे संविधान पीठ तय करे।
अखिल भारतीय संत समिति: 2019 की याचिका में समिति ने कहा है कि अदालतें धार्मिक मामलों में तभी हस्तक्षेप करें जब वे सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता या स्वास्थ्य के खिलाफ हों। अनुच्छेद 14 का उपयोग अनुच्छेद 25 के अधिकार को खत्म करने के लिए न हो।
केरल सरकार: पुरानी धार्मिक परंपराओं में बदलाव से पहले धर्म के विद्वानों और समाज सुधारकों से सलाह जरूरी है। अदालत प्रथाओं की तर्कसंगतता नहीं, बल्कि यह देखे कि लोग उसे ईमानदारी से धर्म का हिस्सा मानते हैं।
ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड: अदालतें ‘जरूरी धार्मिक प्रथा’ तय करने से बचें, क्योंकि इससे अनुच्छेद 25-26 के तहत मिली धार्मिक स्वतंत्रता में हस्तक्षेप हो सकता है। किसी धर्म के ‘मूल’ की पहचान करना व्यक्तिगत विश्वास पर निर्भर है।
जैन समुदाय: किसी भी धर्म की प्रथाओं को तय करने का अधिकार उसी धर्म के लोगों का है। सरकार या कोर्ट को यह तय नहीं करना चाहिए कि क्या धार्मिक है और क्या नहीं।
04:58 AM7 अप्रैल 2026
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सबरीमाला में 10 से 50 साल की महिलाओं को एंट्री नहीं, पूरा मामला 5 पॉइंट्स में
सबरीमाला मंदिर में 10 से 50 साल की महिलाओं की एंट्री पर विवाद है। इसकी वजह मासिक धर्म है, क्योंकि पीरियड के दौरान महिलाओं को अशुद्ध माना जाता है। उन्हें धार्मिक अनुष्ठानों में भाग लेने से रोका जाता है। सबरीमाला मंदिर की पौराणिक मान्यता के अनुसार, भगवान अयप्पा ब्रह्मचारी हैं और इसी कारण एक निश्चित आयु वर्ग की महिलाओं को मंदिर में प्रवेश की अनुमति नहीं दी जाती थी। इसी पर विवाद है।
1990 में मंदिर में महिला की एंट्री को लेकर विवाद उठा। समय के साथ स्थानीय कोर्ट में मामला चला बाद में सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। 2006 में सुप्रीम कोर्ट ने संबंधित पक्षों को नोटिस जारी किए थे। केस 2008 में 3 जजों की बेंच को सौंपा गया।
7 साल बाद 2016 में सुनवाई हुई। इसके बाद 2017 में तत्कालीन सीजेआई की 3 जजों की बेंच ने केस 5 जजों की संविधान पीठ को सौंपा। 2018 में संविधान पीठ ने 4-1 के बहुमत से फैसला सुनाया कि सबरीमाला में सभी आयु वर्ग की महिलाओं को प्रवेश दिया जाए। प्रतिबंध असंवैधानिक है। इसके बाद बड़े विरोध के बीच 2 महिला बिंदु कनकदुर्गा और बिंदु अम्मिनी ने मंदिर में प्रवेश किया।
इसके बाद 2019 में 7 जजों की बेंच ने यह मुद्दा 9 जजों की बेंच को भेज दिया था। इस केस में अन्य धर्मों की महिलाओं से जुड़े मामले में भी जोड़ दिए गए।

04:54 AM7 अप्रैल 2026
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सबरीमाला में 2 महिलाओं की एंट्री के बाद मंदिर धोया, प्रदर्शन हुए; 5 तस्वीरें…
सबरीमाला मंदिर में महिलाओं को प्रवेश करने की इजाजत मिलने के बाद 45 साल की बिंदु कनकदुर्गा और 46 साल की बिंदु अम्मिनी ने भारी पुलिस सुरक्षा में पहली बार सबरीमाला मंदिर में एंट्री की थी। इसके दर्शन के बाद पुजारियों ने पूरे मंदिर को धोया था। वहीं, कोच्चि समेत केरल में कई जगह प्रदर्शन हुए थे।

बिंदु कनकदुर्गा (45) और बिंदु अम्मिनी (46) इन्होंने पहली बार सबरीमाला मंदिर में एंट्री की।

बिंदु कनकदुर्गा और बिंदु अम्मिनी जब भगवान अयप्पा के दर्शन करके वापस लौटी थीं, उनके जाते ही मंदिर में शुद्धि की गई थी। मंदिर में 1 घंटे तक दर्शन बंद किए गए थे।

महिलाओं के मंदिर में प्रवेश करने का जमकर विरोध हुआ था। 2 जनवरी को कोच्चि में लोगों ने प्रदर्शन किया था।

3 जनवरी को भी केरल में जगह-जगह विरोध-प्रदर्शन हुए थे। पुलिस ने भीड़ को खदेड़ा था।

विरोध-प्रदर्शन के दौरान केरल के सीएम पिनाराई विजयन के पोस्टर को चप्पल मारती महिला।
