Babri Masjid Vs Ram Mandir; Ayodhya Mosque Project Donation Crisis

रामजन्मभूमि पर नवंबर 2019 में आए सुप्रीम कोर्ट के फैसले से दो रास्ते निकले थे। विवादित 2.77 एकड़ जमीन रामलला को मिली और बाबरी की जगह नई मस्जिद के लिए अयोध्या से 25 किलोमीटर दूर धन्नीपुर में 5 एकड़ जमीन दी गई। राम मंदिर का निर्माण लगभग पूरा हो गया है।

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यहां मस्जिद के साथ अस्पताल और म्यूजियम बनना था। 300 करोड़ रुपए की जरूरत थी, लेकिन सिर्फ डेढ़ करोड़ रुपए चंदा मिल पाया। जरूरी सरकारी मंजूरियां न मिलने से काम शुरू ही नहीं हो पाया। अब ट्रस्ट छोटी मस्जिद बनाने की तैयारी में है। धन्नीपुर के लोग मस्जिद बनने की उम्मीद छोड़ चुके हैं। वे कहते हैं- अल्लाह की मर्जी होगी, तो बन जाएगी।

जमीन पर सिर्फ बोर्ड, कब्जा न हो जाए इसलिए तारबंदी

अयोध्या-लखनऊ हाईवे छोड़ते ही धन्नीपुर गांव की सड़क शुरू होती है। कुछ मिनट बाद बाईं तरफ लोहे की फेंसिंग से घिरी मस्जिद की जमीन दिखती है। अंदर कोई मशीन नहीं, कोई मजदूर नहीं। सिर्फ खाली मैदान। करीब तीन हजार की आबादी वाले धन्नीपुर में 60% मुस्लिम आबादी है। ज्यादातर लोग मस्जिद पर बात करने से बचते हैं। महिलाएं तो बिल्कुल नहीं बोलतीं।

मस्जिद की जमीन से सटी चाय की दुकान पर कुछ लोग अखबार पढ़ रहे थे। मस्जिद के बारे में पूछने पर एक-दूसरे को देखने लगे। एक बुजुर्ग मुस्कुराते हुए बोले, ‘हम खेती-किसानी वाले लोग हैं। यहां जानवर चराने आते हैं। मस्जिद कब बनेगी, कौन बनाएगा, ये तो लखनऊ और दिल्ली वाले जानें।’ नाम पूछने पर बुजुर्ग ने जवाब दिया- रहने दीजिए, हम इस मसले से दूर ही रहना चाहते हैं।

धन्नीपुर में मस्जिद के लिए मिली जमीन पर बच्चे क्रिकेट खेलते हैं। लोग जानवर चराने आते हैं।

धन्नीपुर में मस्जिद के लिए मिली जमीन पर बच्चे क्रिकेट खेलते हैं। लोग जानवर चराने आते हैं।

खाली पड़ी जमीन के ठीक सामने माजिद खान का घर है। वे बात करने के लिए तैयार हो गए। बोले, ‘सुप्रीम कोर्ट के फैसले से धन्नीपुर के लोग खुश थे। न्यूज से पता चला कि मस्जिद के साथ मेडिकल कॉलेज और अस्पताल भी बनेगा।’

‘गांव के आसपास 30 किमी तक अच्छा अस्पताल नहीं है। सीरियस केस में इलाज के लिए 150 किमी दूर लखनऊ जाना पड़ता है। मस्जिद बन जाती तो गांव में इलाज मिलता। बच्चे पढ़ पाते और काम मिलता, लेकिन कुछ नहीं हुआ।’

आखिर सात साल में मस्जिद क्यों नहीं बन पाई

पहली वजह: फंड नहीं है

नवंबर 2019 में सुप्रीम कोर्ट ने राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद पर फैसला सुनाते हुए सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड को अयोध्या में नई मस्जिद बनाने का आदेश दिया था। अयोध्या की विवादित 2.77 एकड़ जमीन हिंदू पक्ष को मिली। मस्जिद बनाने के लिए अयोध्या से 25 किमी दूर जमीन धन्नीपुर गांव में दी गई।

3 अगस्त, 2020 को फैजाबाद DM अनुज कुमार झा ने जमीन वक्फ बोर्ड को सौंप दी। मस्जिद बनाने के लिए इंडो-इस्लामिक कल्चरल फाउंडेशन बनाया गया। अगस्त 2021 में फाउंडेशन ने लोगों से मदद की अपील की। बैंक अकाउंट की डिटेल पब्लिक की। नवंबर, 2022 तक ट्रस्ट को देशभर से करीब 40 लाख रुपए डोनेशन मिला।

इंडो-इस्लामिक कल्चरल फाउंडेशन के चेयरमैन जुफर अहमद फारूकी कहते हैं, ‘5 साल में हम बमुश्किल 1.5 करोड़ रुपए ही जुटा पाए हैं। इतने में बड़ी मस्जिद बना पाना मुमकिन नहीं है। हमने सोचा है कि पब्लिक के पास न जाकर अपने लोगों से 5 करोड़ रुपए जुटाएं और कम से कम छोटी मस्जिद का काम शुरू कर दें।’

पेशे से जर्नलिस्ट अरशद खान मस्जिद के काम से शुरुआत से जुड़े हैं। वे कहते हैं, ‘पहले लोगों में मस्जिद को लेकर जोश था। 21 हजार रुपए का पहला चंदा लखनऊ यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर रोहित श्रीवास्तव ने दिया। फैजाबाद के DM रहे अनुज कुमार झा ने जमीन दिलवाने में मदद की। इसके बाद जैसे-जैसे वक्त बीता, काम रुक गया।’

हमने पहला दान देने वाले लखनऊ यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर रोहित श्रीवास्तव से बात की। वे मस्जिद न बनने से नाराज हैं। कहते हैं, ‘अफसोस होता है कि मैंने जिस चीज के लिए चंदा दिया, उस पर आज तक काम शुरू नहीं हो पाया। मैं अयोध्या में राम मंदिर के दर्शन के लिए जाता हूं, तो धन्नीपुर गांव जरूर जाता हूं। हर बार मुझे वहां खाली जमीन ही नजर आती है।’

दूसरी वजह: लोगों का जुड़ाव नहीं धन्नीपुर की शाहगदा शाह मजार पर ‘मोहम्मद-बिन-अब्दुल्लाह’ मस्जिद की फोटो वाले पोस्टर चिपकाए गए थे। इनमें अंग्रेजी में लिखा गया- A MASTERPIECE IN MAKING यानी एक नायाब मस्जिद तैयार हो रही है। धन्नीपुर के लोग खुश थे कि गांव में देश की सबसे चर्चित मस्जिद बनेगी। धीरे-धीरे वक्त बीतता गया, लेकिन काम शुरू नहीं हो पाया। मजार पर चिपके पोस्टर हटा दिए गए।

इंडो-इस्लामिक कल्चरल फाउंडेशन के चेयरमैन जुफर अहमद फारूकी कहते हैं, ‘अफसोस है कि अयोध्या में बनने वाली मस्जिद अब वैसी नहीं बन पाएगी, जैसा हमने सोचा था। फैजाबाद और अयोध्या के लोगों, खासकर मुस्लिम समुदाय ने भी इसमें इंट्रेस्ट नहीं दिखाया।’

जर्नलिस्ट अरशद खान बताते हैं, ‘नई इबादतगाह अयोध्या से दूर है। इसलिए मुसलमान खुद को इससे कनेक्ट नहीं कर पाए। अगर इसके लिए अयोध्या में जमीन मिलती तो सूरत कुछ और होती।’

‘सुप्रीम कोर्ट के फैसले में भी साफ कहा गया था कि मस्जिद की जमीन अयोध्या के मुख्य स्थान पर होगी। (MOSQUE WILL BE CONSTRUCTED AT PROMINENT PLACE OF AYODHYA) हमें शहर से 25 किलोमीटर दूर जमीन मिली। वहां जाने का रास्ता बहुत संकरा है। इंफ्रास्ट्रक्चर नहीं है। लोग इतनी दूर क्यों नमाज पढ़ने जाएंगे।’

तीसरी वजह: अयोध्या डेवलपमेंट अथॉरिटी की मंजूरी नहीं अरशद खान आगे कहते हैं, ‘ट्रस्ट बना, तब टीम अच्छी थी। अतहर हुसैन सेक्रेटरी थे। लखनऊ के सीनियर एडवोकेट इमरान अहमद शिबली मेंबर थे। मैं था, राशिद मोहम्मद साहब थे। हम लोगों ने मस्जिद बनवाने के लिए बहुत मेहनत की। नया नक्शा बनाया। उस वक्त अयोध्या जिला प्रशासन ने काफी सपोर्ट किया। हमें मस्जिद के लिए जरूरी NOC नहीं मिली।’

‘ट्रस्ट के चेयरमैन जुफर अहमद फारुकी ने बताया था कि मुंबई के बड़े बिजनेसमैन हाजी अराफात शेख धन्नीपुर आएंगे और मस्जिद-अस्पताल का काम शुरू होगा। हाजी साहब ने बताया कि मस्जिद बनने से पहले मक्का-मदीना से ईंटें आएंगी, लेकिन जमीन पर कुछ नहीं हुआ। हमने चेयरमैन से भी कॉन्टैक्ट किया, लेकिन उनका फोन नहीं उठता। वे कई साल से आउट ऑफ कॉन्टैक्ट हैं। हमने अयोध्या डेवलपमेंट अथॉरिटी में नक्शा जमा किया था, वो भी निरस्त हो गया।’

नक्शा क्यों रिजेक्ट हो गया, इस पर हमने ट्रस्ट और अयोध्या डेवलपमेंट अथॉरिटी में बात की। पता चला कि इसके पीछे सियासी रुकावट नहीं, बल्कि कागजी पेचीदगियां हैं। कोई संस्था नॉर्मल बिल्डिंग के बजाय बड़ा पब्लिक कॉम्प्लेक्स बनाती है, तो इसके लिए नियम बहुत सख्त हो जाते हैं। इसकी प्रोसेस को तीन पॉइंट्स में समझिए…

1. लैंड यूज के कागजों में बार-बार बदलाव

किसी भी बड़े निर्माण के लिए लोकल डेवलपमेंट अथॉरिटी (इस मामले में ADA) से ऑनलाइन और ऑफलाइन मंजूरी लेनी होती है। सबसे पहले जमीन का लैंड यूज देखा जाता है। इससे पता चलता है कि जमीन किस काम के लिए है। खेती की जमीन पर कॉमर्शियल या संस्थागत निर्माण नहीं हो सकता। सरकार ने कृषि भूमि दी, तो पहले उसका लैंड यूज बदलकर उसे संस्थागत करना पड़ा। इससे प्रोजेक्ट बनने में देरी हुई।

2. अथॉरिटी की तरफ से NOC न मिलना

नक्शा पास होने से पहले PWD, प्रदूषण नियंत्रण विभाग, अग्निशमन विभाग, सिंचाई, नगर निगम जैसे विभागों से नो ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट लेना होता है। अब तक मस्जिद कमेटी को इन विभागों से NOC नहीं मिली है।

अयोध्या डेवलपमेंट अथॉरिटी के सेक्रेटरी आरके मिश्रा बताते हैं कि किसी भी बड़े निर्माण से पहले जमीन के मालिक को अलग-अलग विभाग की NOC लेनी पड़ती है। इसमें ये होता है कि बिल्डिंग कितनी ऊंची होगी। फायर सिस्टम कैसा होगा। इंफ्रास्ट्रक्टर कैसा है। ये सब मानक के हिसाब से होता है, तो अथॉरिटी NOC देती है। मस्जिद कमेटी ने NOC क्लीयर करने के लिए भी एप्लीकेशन नहीं दी है।’

ट्रस्ट के चेयरमैन जुफर अहमद फारुकी ने 2022 में ये लेटर अयोध्या डीएम को लिखा था। इसमें उन्होंने मस्जिद का रास्ता चौड़ा करने की मांग की थी, ताकि NOC मिल सके।

ट्रस्ट के चेयरमैन जुफर अहमद फारुकी ने 2022 में ये लेटर अयोध्या डीएम को लिखा था। इसमें उन्होंने मस्जिद का रास्ता चौड़ा करने की मांग की थी, ताकि NOC मिल सके।

3. ले-आउट और डेवलपमेंट चार्ज का पेमेंट न होना

NOC मिलने के बाद अथॉरिटी के इंजीनियर नक्शे की जांच करते हैं कि सड़क कितनी चौड़ी है, भूकंप झेलने की क्षमता क्या है। इसके बाद डेवलपमेंट चार्ज जमा करना पड़ता है और नक्शा पास हो जाता है। ADA के मुताबिक, मस्जिद कमेटी को अभी 1.22 करोड़ रुपए डेवलपमेंट चार्ज जमा करना है। सभी जरूरी डॉक्यूमेंट पूरे होने पर ही कंस्ट्रक्शन शुरू हो सकेगा।

23 जून, 2021 को मस्जिद ट्रस्ट ने नक्शे की मंजूरी के लिए आवेदन किया था। बाद में नक्शा वापस ले लिया। 2023 में नक्शे में छोटी मस्जिद के साथ कुछ बदलाव कर फिर से अप्लाई किया। सितंबर 2025 तक ट्रस्ट ने NOC नहीं ली और जरूरी डॉक्यूमेंट पोर्टल पर अपलोड नहीं करवाए। इससे उनकी एप्लिकेशन रिजेक्ट हो गई है।

हमने मस्जिद कमेटी के जनरल सेक्रेटरी अतहर हुसैन से पूछा कि 2024 के बाद नक्शे के लिए क्यों अप्लाई नहीं किया गया? उन्होंने जवाब दिया- प्रोजेक्ट के हिसाब से जितने फंड की उम्मीद की थी, उसे जुटा नहीं पाए। यही वजह है कि हम नए नक्शे पर आगे बढ़ने से पहले फंड इकट्ठा कर लेना चाहते हैं। छोटी मस्जिद बनाने लायक रकम जुट जाएगी तो हमारे चैयरमैन नक्शे के लिए एप्लीकेशन फाइल करेंगे।

बाबरी केस के पक्षकार बोले- ट्रस्ट ही नहीं चाहता कि मस्जिद बने

राम जन्मभूमि मंदिर के गेट नंबर 11 के सामने बाबरी मस्जिद का केस लड़ने वाले इकबाल अंसारी का घर है। मस्जिद का काम बार-बार अटकने पर इकबाल कहते हैं, ‘देखिए, मस्जिद की जमीन सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड को मिली है। उसके चेयरमैन ने अपना प्राइवेट ट्रस्ट बनाया है।’

इकबाल अंसारी के अलावा जर्नलिस्ट अरशद खान ने भी ट्रस्ट पर सवाल उठाए थे। इसके जवाब में मस्जिद कमेटी के जनरल सेक्रेटरी अतहर हुसैन कहते हैं, ‘इकबाल अंसारी इस प्रोजेक्ट पर क्या सोचते हैं और क्या कह रहे हैं, इस पर कोई कमेंट नहीं करना है। अरशद खान हमारी टीम के सबसे पुराने सदस्यों में से एक रहे हैं। उन्होंने शुरुआती दौर में फंड कलेक्शन से लेकर मस्जिद में म्यूजियम बनाने का प्लान तैयार किया।’

‘ये सच है कि वक्त बीतने के साथ हमारी टीम के सामने कई रुकावटें आईं, इससे सदस्यों के बीच बातचीत भी कम हो गई। मैं आपको यकीन दिलाता हूं कि हम जल्द ही नए प्लान के साथ जमीन पर उतरने वाले हैं।’

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