पंजाब में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले खडूर साहिब से सांसद अमृतपाल सिंह क्या पंथक पॉलिटिक्स के नए पावर सेंटर बन सकते हैं? खडूर साहिब से सांसद अमृतपाल की पार्टी अकाली दल (वारिस पंजाब दे) ऐलान कर चुकी है कि वह 2027 का विधानसभा चुनाव लड़ेंगे। भले ही वह
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अमृतपाल ने 2024 का लोकसभा चुनाव भी जेल में रहकर ही जीता था। वहीं इकबाल सिंह झूदा, MLA मनप्रीत सिंह अयाली और दर्शन सिंह शिवालिक जैसे अकाली नेता भी अमृतपाल की पार्टी का दामन थाम चुके हैं।
2024 के लोकसभा चुनाव में खडूर साहिब और फरीदकोट के 18 विधानसभा सीटों में से 15 पर अमृतपाल सिंह और सरबजीत सिंह खालसा की बढ़त ने इस बदलाव को चुनावी आंकड़ों में भी दिखाया।
असम की डिब्रूगढ़ जेल में राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (NSA) के तहत बंद अमृतपाल का पंजाब की पॉलिटिक्स में उभार इतना महत्वपूर्ण क्यों है, 2027 के चुनाव में इसका सबसे बड़ा नुकसान किसे होगा, कौन फायदे में रहेगा, ये जानने के लिए पढ़िए पूरी रिपोर्ट…

2024 के आंकड़ों ने क्यों बदले 2027 के समीकरण
पहली वजह: खडूर साहिब
अमृतपाल या उनकी पार्टी ने अभी कोई विधानसभा चुनाव नहीं लड़ा है। हालांकि, 2024 के चुनाव में उनकी लोकसभा की जीत में विधानसभा सीटों के रिजल्ट विरोधियों के लिए चिंता की वजह हैं।
अमृतपाल ने खडूर साहिब सीट से चुनाव जीता। उन्हें 4.04 लाख यानी 38.62% वोट पड़े। उनकी जीत का अंतर पंजाब की 13 सीटों में सबसे ज्यादा 1.97 वोटों का रहा। इसी जीत को हम विधानसभा वाइज देखें तो खडूर साहिब में आती 9 सीटों में से 8 पर अमृतपाल को बढ़त मिली थी।
यानी 2022 में जिन सीटों पर AAP, कांग्रेस और निर्दलीय जीते थे, 2024 के लोकसभा चुनाव में उनमें से 8 विधानसभा सेगमेंट में अमृतपाल सबसे आगे रहे। इस समर्थन ने यह संकेत जरूर दिया है कि इन इलाकों में अमृतपाल की राजनीतिक स्वीकार्यता बनी है। 2027 में यही समर्थन विधानसभा चुनाव तक कायम रहता है या नहीं, यह सबसे बड़ा सवाल होगा।

दूसरी वजह: फरीदकोट
यहां से निर्दलीय सरबजीत सिंह खालसा ने फरीदकोट से लोकसभा चुनाव जीता। जो अब अमृतपाल की पार्टी की अगुआई करने वाले नेताओं में शामिल हैं। फरीदकोट में 9 विधानसभा सीटें हैं।
इनमें 2024 के लोकसभा चुनाव में सरबजीत खालसा 9 में से 7 में आगे रहे। यानी 2022 के विधानसभा विजेताओं से अलग, 2024 में 7 विधानसभा सेगमेंट में सरबजीत सिंह खालसा सबसे आगे रहे। 2024 के नतीजों ने संकेत दिया है कि मालवा की इस पंथक बेल्ट में भी नया राजनीतिक समीकरण बन रहा है। 2027 में यह समर्थन कायम रहता है या नहीं, इस पर सभी दलों की नजर रहेगी।

कैसे बढ़ रहा अमृतपाल का सियासी कुनबा
अमृतपाल फिलहाल जेल में हैं लेकिन उनके पिता तरसेम सिंह ने अब वारिस पंजाब दे को संगठन नहीं बल्कि राजनीतिक पार्टी का रूप दे दिया है। फरीदकोट के सांसद सरबजीत खालसा उनके साथ हैं। अमृतपाल की पार्टी में अब तक अकाली MLA मनप्रीत अयाली, पूर्व MLA दर्शन सिंह शिवालिक, सीनियर अकाली नेता इकबाल सिंह झूंदा, संता सिंह उमेदपुरी, फिल्म एक्टर रब्बी कंदोला शामिल हो चुके हैं। आने वाले दिनों में और भी अकाली नेता अमृतपाल की पार्टी जॉइन कर सकते हैं। ऐसी सूरत में चुनाव तक अमृतपाल की पार्टी में नेताओं की संख्या और बढ़ सकती है।
अमृतपाल की बढ़ती ताकत से किसे कितना नुकसान
- सबसे ज्यादा अकाली दल पर: एक तरफ अमृतपाल पंजाब की राजनीति में नए पंथक चेहरे के तौर पर उभर रहे हैं। दूसरी तरफ उनके दिग्गज नेता अब पार्टी छोड़ अमृतपाल को जॉइन कर रहे हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अमृतपाल की पार्टी की सबसे बड़ी दावेदारी फिलहाल पंथक वोट बैंक पर है। जिसका सीधा असर अकाली दल पर पड़ेगा।
- AAP भी अछूती नहीं रहेगी: अगर 2027 में खडूर साहिब और फरीदकोट की विधानसभा सीटों का रिजल्ट 2024 के लोकसभा चुनाव नतीजे जैसा रहा तो AAP के लिए बड़ा झटका हो सकता है। इन दोनों लोकसभा की 18 में से 15 सीटें AAP ने जीती थी। AAP को इन सीटों पर कड़ी चुनौती मिल सकती है।
- कांग्रेस पर सीमित असर: कांग्रेस पर इसका सीमित असर हो सकता है। ऑपरेशन ब्लू स्टार और 1984 के सिख विरोधी दंगों का मुद्दा लंबे समय से कांग्रेस के खिलाफ उठता रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि कट्टर पंथक वोटों में कांग्रेस की पकड़ सीमित रही है। अगर पंथक वोटों का बड़ा हिस्सा अमृतपाल के साथ जाता है, तो कांग्रेस के लिए खुद को AAP के मुख्य विकल्प के रूप में स्थापित करना कुछ क्षेत्रों में मुश्किल हो सकता है।
- BJP पर ज्यादा असर नहीं: पंजाब में भाजपा की राजनीति शहरी सीटों तक सीमित है, वहां अमृतपाल का असर नहीं है। ऐसे में भाजपा को इससे ज्यादा फर्क नहीं पड़ेगा। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भाजपा फिलहाल पंजाब में अपना स्वतंत्र संगठन मजबूत करने पर जोर दे रही है। इसी कारण वह अकाली दल के साथ गठबंधन की वापसी को लेकर जल्दबाजी में नहीं दिख रही। भाजपा की पंथक राजनीति में बदलते समीकरण पर नजर बनी हुई है।

अमृतपाल फिलहाल जेल में हैं, लेकिन उनके पिता तरसेम सिंह ने अब वारिस पंजाब दे को संगठन नहीं बल्कि राजनीतिक पार्टी का रूप दे दिया है। फाइल फोटो
अमृतपाल का उभार क्यों हो रहा?
इसके पीछे सबसे बड़ी वजह शिरोमणि अकाली दल का लगातार कमजोर होना माना जा रहा है। 2015 में श्री गुरु ग्रंथ साहिब की बेअदबी की घटनाओं और बहबल कलां-कोटकपूरा गोलीकांड के बाद अकाली दल की साख को बड़ा झटका लगा। 2007 और 2012 में लगातार सरकार बनाने वाली पार्टी 2017 के विधानसभा चुनाव में घटकर 15 सीटों पर आ गई। 2020 में कृषि कानूनों के मुद्दे पर भाजपा से 24 साल पुराना गठबंधन भी टूट गया। इसके बाद 2022 के विधानसभा चुनाव में अकाली दल सिर्फ 3 सीटें जीत सका और 2024 लोकसभा चुनाव में एक भी सीट नहीं जीत पाया।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अकाली दल के लगातार कमजोर होने से पंथक राजनीति में नेतृत्व का एक खालीपन बना। इसी दौर में अमृतपाल सिंह ने 2024 का लोकसभा चुनाव डिब्रूगढ़ जेल में रहते हुए रिकॉर्ड अंतर से जीता। फरीदकोट से सरबजीत सिंह खालसा की जीत ने भी इस बदलाव को और मजबूत संकेत दिया।
आगे क्या होगा?
2027 के चुनाव में असली परीक्षा अमृतपाल सिंह की नहीं, बल्कि पंजाब की पंथक राजनीति की होगी। सवाल यह होगा कि क्या लोकसभा चुनाव में मिला समर्थन विधानसभा चुनाव तक कायम रहता है या नहीं। अगर ऐसा होता है, तो तीन दशक तक पंथक राजनीति का केंद्र रहे शिरोमणि अकाली दल के सामने अब तक की सबसे बड़ी चुनावी चुनौती खड़ी हो सकती है।
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