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इलाहाबाद हाई कोर्ट ने 1983 में बांदा जिले के पैलानी थाना क्षेत्र में हुई दीनदयाल की हत्या के मामले में सात साल की सजा पाए दो अभियुक्तों जगनायक और संतोष को बरी कर दिया। न्यायमूर्ति तेज प्रताप तिवारी ने यह फैसला सुनाया। अदालत ने कहा कि अभियोजन आरोप को
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क्या है मामला जानिये
अभियोजन के अनुसार 27/28 सितंबर 1983 की रात गांव अलीना में दीनदयाल अपनी पत्नी धुरिया और बेटे रामाधार के साथ घर के बरोठे में सो रहे थे। आरोप था कि तीन लोग दीवार फांदकर घर में घुसे। जगनायक के पास तमंचा, संतोष के पास फरसा और रामराज के पास लाठी थी। विरोध करने पर दीनदयाल को गोली मारी गई और फरसे से हमला किया गया। बचाने आई धुरिया के सिर पर भी लाठी मारी गई। दीनदयाल की मौत हो गई।बांदा के विशेष न्यायाधीश ने 25 जनवरी 1985 को तीनों को भारतीय दंड संहिता की धारा 460 के तहत दोषी मानकर सात साल के सश्रम कारावास की सजा सुनाई थी।
कई बातें साबित नहीं हुईं
मृतक को घातक चोटें आईं और धुरिया घायल हुईं, यह साबित है। लेकिन अपीलकर्ता धारा 460 के तहत रात में सेंधमारी या घर में चोरी-छिपे घुसने में संयुक्त रूप से शामिल थे, यह साबित नहीं हुआ।
जांच अधिकारी ने बरोठे के दरवाजे के पास जमीन पर खून और खाट पर शव मिलने के बावजूद यह नहीं पूछा कि मृतक को खाट तक कैसे लाया गया। कोर्ट ने इसे अहम चूक माना।
संदेह प्रमाण का स्थान नहीं ले सकता
अदालत ने कहा, “संदेह कितना भी प्रबल हो, प्रमाण का स्थान नहीं ले सकता।” साक्ष्य से दो निष्कर्ष संभव होने पर अभियुक्त के पक्ष वाला निष्कर्ष अपनाया जाना चाहिए।
अपील लंबित रहने के दौरान तीसरे अभियुक्त रामराज की मृत्यु हो गई थी, इसलिए उसके विरुद्ध अपील समाप्त मानी गई। दोनों बरी अभियुक्त जमानत पर थे, इसलिए उनके जमानत मुचलके रद्द कर दिए गए। सीआरपीसी की धारा 437-ए के तहत उन्हें दो सप्ताह में 50-50 हजार रुपये का निजी मुचलका और दो जमानती देने हों