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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने वर्ष 1982 में अपनी पत्नी को आत्महत्या के लिए उकसाने के एक मामले में पति को बरी किया। कोर्ट ने कहा कि यह साबित नहीं हो पाया कि पति ने पीड़ित पत्नी को रेडियो की मांग को लेकर किसी भी तरह से परेशान किया, जिसके कारण कथित तौर पर उसने
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कोर्ट ने कहा-अभियोजन साबित करने में विफल रहा कि मृतक को रेडियो के लिए परेशान किया।
कोर्ट ने क्या कहा जानिये
जस्टिस संजीव कुमार की पीठ ने अपने फैसले में यह टिप्पणी की, “…अभियोजन पक्ष यह साबित करने में पूरी तरह विफल रहा है कि अपीलकर्ता ने मृतक को किसी भी तरह से परेशान किया और घटना से ठीक पहले उसने कोई ऐसा प्रत्यक्ष कार्य किया या कोई ऐसी चूक की, जिसने मृतक को खुद को आग लगाकर आत्महत्या करने के लिए उकसाया हो। ऐसा कोई सबूत नहीं है कि अपीलकर्ता ने दहेज की मांग को लेकर मृतक को किसी भी तरह से परेशान किया हो।”
बलिया का है मामला
मामले के अनुसार अपीलकर्ता रामेश्वर प्रसाद गुप्ता को 1985 में बलिया के एडिशनल सेशन जज द्वारा भादंसं की धारा 306 [आत्महत्या के लिए उकसाना] के तहत दोषी ठहराया गया और 5 साल के कठोर कारावास की सज़ा सुनाई गई। हालांकि, ससुराल वालों को बरी कर दिया गया। निचली अदालत ने यह निष्कर्ष निकाला कि अभियोजन पक्ष यह साबित करने में सफल रहा था कि अपीलकर्ता-पति ने मृतक को ‘टू-इन-वन रेडियो’ या 2000 रुपये के दहेज की मांग को लेकर परेशान किया। महत्वपूर्ण बात यह है कि ट्रायल कोर्ट ने मृतक के कथित पत्र पर भरोसा किया, जो उसने अपनी मां को लिखा, जिसमें उसने या तो एक रेडियो या 2000 रुपये की मांग की।
ट्रायल कोर्ट के फैसले को चुनौती
ट्रायल कोर्ट के फैसले को चुनौती देते हुए पति ने हाईकोर्ट का रुख किया। आरोपी-अपीलकर्ता ने यह तर्क दिया कि उसके खिलाफ लगाए गए आरोप को साबित करने के लिए पर्याप्त सबूत नहीं थे और यह कि पीड़ित/मृतक को अपीलकर्ता द्वारा किसी भी तरह की क्रूरता या उत्पीड़न का शिकार नहीं बनाया गया। यह दलील दी गई कि पीड़ित ने खुद अपनी मां से (एक पत्र के माध्यम से) अपने निजी इस्तेमाल के लिए रेडियो या 2000 रुपये की मांग की थी, क्योंकि वह दिन के समय अकसर अकेली रहती थी। यह तर्क दिया गया कि विचाराधीन पत्र से यह ज़ाहिर नहीं होता कि उसे अपीलकर्ता द्वारा किसी भी तरह के उत्पीड़न या क्रूरता का शिकार बनाया जा रहा था। तर्क दिया गया कि मृतक खाना बनाते समय गलती से आग की चपेट में आ गई थी और उसके जीजा ने तुरंत उसे अस्पताल पहुंचाया था।
सरकारी वकीलों की दलीलें
दूसरी ओर सरकारी वकील ने यह दलील दी कि अभियोजन पक्ष का मामला हर उचित संदेह से परे साबित हो चुका है। मृतक को अपीलकर्ता द्वारा दहेज की मांग को लेकर क्रूरता और उत्पीड़न का शिकार बनाया गया, जिसके कारण उसे आत्महत्या करने पर मजबूर होना पड़ा। मामले के तथ्यों, ट्रायल कोर्ट के फैसले और दोनों पक्षों के तर्कों की जांच करते हुए पीठ ने शुरू में ही यह पाया कि पीड़िता के पिता ने लगभग 25 दिनों की अस्पष्ट देरी के बाद मुकदमा दर्ज कराई, जिससे अभियोजन पक्ष के मामले पर गंभीर संदेह पैदा होता है।
अदालत ने आरोपी के इस तर्क में भी दम पाया कि प्राथमिकी एक मनगढ़ंत और बाद में सोचा गया कदम था, क्योंकि इस दुखद घटना के बाद अपीलकर्ता ने पीड़िता की बहन से शादी करने के प्रस्ताव को ठुकरा दिया। विचाराधीन पत्र की जांच करते हुए पीठ ने पाया कि मृतक ने अपनी मां को केवल एक ‘टू-इन-वन’ रेडियो या 2000 रुपये भेजने के लिए लिखा था। उसमें कहीं भी यह ज़िक्र नहीं था कि अपीलकर्ता द्वारा पीड़िता से उक्त मांग पूरी करने के लिए कहा जा रहा था। इसके अलावा, अदालत ने भादंसं की धारा 306 की जांच करते हुए यह पाया कि इस धारा के तहत अपराध गठित होने के लिए केवल उत्पीड़न ही पर्याप्त नहीं है।
साबित करने में विफल
परिणामस्वरूप, न्यायालय ने यह निष्कर्ष निकाला कि अभियोजन पक्ष यह साबित करने में बुरी तरह विफल रहा कि अपीलकर्ता ने मृतक को किसी भी प्रकार से परेशान किया। इसके साथ ही हाईकोर्ट ने अपील स्वीकार कर पति को बरी कर दिया।