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केरल हाईकोर्ट ने महिला की छाती पर कोहनी मारने के मामले में एक व्यक्ति को बरी कर दिया। कोर्ट ने कहा कि इससे महिला की गरिमा भंग करने का इरादा साबित नहीं होता। जस्टिस जोबिन सेबेस्टियन ने क्रिमिनल रिव्यू पिटीशन मंजूर की। उन्होंने चालक्कुडी की ज्यूडिशियल फर्स्ट क्लास मजिस्ट्रेट कोर्ट-I की सजा रद्द कर दी। इस सजा को त्रिशूर की एडिशनल सेशंस कोर्ट-III ने भी बरकरार रखा था। मामला IPC की धारा 354 के तहत दर्ज था। मजिस्ट्रेट कोर्ट ने आरोपी को एक महीने की कैद और ₹1000 जुर्माने की सजा सुनाई थी। इसके बाद अपीलीय अदालत ने भी दोषसिद्धि और सजा बरकरार रखी थी। क्या था मामला अभियोजन के मुताबिक, महिला पंचायत रोड से पैदल जा रही थी। तभी आरोपी ने उसकी दाईं छाती पर कोहनी से वार किया। अभियोजन ने आरोप लगाया कि इस घटना से महिला की गरिमा भंग हुई। इसी आधार पर आरोपी के खिलाफ IPC की धारा 354 के तहत कार्रवाई की गई। निचली अदालत के फैसले के बाद आरोपी ने हाईकोर्ट में पुनरीक्षण याचिका दायर की थी। बचाव पक्ष की दलील आरोपी की ओर से पेश एमिकस क्यूरी ने कहा कि निचली अदालतों ने सबूतों का सही आकलन नहीं किया। उन्होंने दोनों पक्षों के बीच पुराने विवाद के कारण झूठे फंसाए जाने की संभावना भी बताई। महिला ने जिरह के दौरान स्वीकार किया था कि उसके पति के खिलाफ आरोपी की शिकायत पर एक मामला लंबित है। बचाव पक्ष ने कहा कि महिला और उसकी मां के बयानों में विरोधाभास हैं। मां को अभियोजन पक्ष ने गवाह के तौर पर पेश किया था। बचाव पक्ष ने यह भी कहा कि घटना के पक्ष में कोई स्वतंत्र सबूत नहीं है। FIR दर्ज कराने में एक दिन की देरी की बात भी अदालत के सामने रखी गई। दलील दी गई कि IPC की धारा 354 के लिए जरूरी तत्व इस मामले में साबित नहीं हुए हैं। सरकार का पक्ष सरकारी वकील ने कहा कि ट्रायल कोर्ट और अपीलीय अदालत ने सबूतों का सही आकलन किया था। उन्होंने कहा कि फैसलों में ऐसा कोई गैरकानूनीपन, अनियमितता या गंभीर गलती नहीं है, जिसके आधार पर पुनरीक्षण में दखल दिया जाए। हाईकोर्ट ने क्या कहा हाईकोर्ट ने कहा कि IPC की धारा 354 लगाने के लिए महिला की गरिमा भंग करने का इरादा साबित होना जरूरी है। कोर्ट ने कहा कि घटना की प्रकृति और परिस्थितियों की बारीकी से जांच करनी होगी। इससे आरोपी के इरादे का पता लगाया जा सकता है। कोर्ट ने कहा, “इरादा व्यक्ति के मन की स्थिति होता है। आमतौर पर इसे सीधे सबूत से साबित नहीं किया जा सकता। किसी काम के पीछे का इरादा जानने के लिए अदालत व्यक्ति के मन में नहीं झांक सकती।” कोर्ट ने कहा कि आरोपी पर लगाया गया खास आरोप महिला की छाती पर कोहनी से मारने का है। मामले में सामने आई परिस्थितियों के आधार पर इस काम से आपराधिक इरादा साबित नहीं होता। अदालत ने कहा, “मामले में आरोपी पर लगाया गया खास आरोप यह है कि उसने शिकायतकर्ता की छाती पर कोहनी से वार किया। मुझे समझ नहीं आता कि ऐसे काम से महिला की गरिमा भंग करने का आपराधिक इरादा कैसे माना जा सकता है।” कोर्ट ने आगे कहा, “इसलिए मुझे यह मानने में कोई हिचक नहीं है कि IPC की धारा 354 का अपराध बनाने के लिए जरूरी आपराधिक इरादा इस मामले में मौजूद नहीं है।” सबूतों की भी जांच की हाईकोर्ट ने दोषसिद्धि के आधार की भी जांच की। कोर्ट ने कहा कि ट्रायल कोर्ट ने मुख्य रूप से महिला और उसकी मां की गवाही पर भरोसा किया था। अपीलीय अदालत ने भी इन्हीं दोनों के बयानों के आधार पर दोषसिद्धि बरकरार रखी थी। कोर्ट ने कहा कि महिला के पति के खिलाफ आरोपी की शिकायत पर दर्ज मामला पहले से लंबित था। इससे महिला को झूठा फंसाए जाने की संभावना पैदा होती है। ऐसी स्थिति में महिला की गवाही की ज्यादा सावधानी से जांच जरूरी थी। अदालत ने कहा कि उस पर भरोसा करने से पहले स्वतंत्र पुष्टि जरूरी थी। हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यौन हमले के मामले में पीड़ित की गवाही को घायल गवाह की गवाही के समान माना जाता है। कोर्ट ने कहा कि गवाह का शिकायतकर्ता से संबंध होना, अपने आप में, उसकी गवाही खारिज करने का आधार नहीं है। हालांकि, अदालत ने पाया कि घटना होने या घटना के समय महिला की मां के मौके पर मौजूद होने का कोई स्वतंत्र सबूत पेश नहीं किया गया। कोर्ट ने कहा कि दोनों गवाहों की घटना से जुड़ी गवाही को पूरी तरह सही मान भी लिया जाए, तब भी यह काम IPC की धारा 354 के अपराध की जरूरी शर्तें पूरी नहीं करता। हाईकोर्ट ने इसके बाद दोषसिद्धि और सजा रद्द कर दी। आरोपी को बरी कर दिया गया। यह आदेश 9 अक्टूबर 2026 को सामने आया। मामले का संदर्भ 2026 लाइव लॉ (केरल) 569 है। पुनरीक्षण याचिकाकर्ता की ओर से एम.एच. हनील कुमार और गोपिका अनिल पेश हुए। प्रतिवादी की ओर से सरकारी वकील तानिया जॉय ने पैरवी की। एमिकस क्यूरी के तौर पर क्लारा शेरिन फ्रांसिस अदालत में मौजूद थीं।
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केरल हाईकोर्ट बोला-महिला की छाती पर कोहनी मारना छेड़छाड़ नहीं:कहा- यह हरकत गरिमा भंग करने का इरादा साबित नहीं करती; मजिस्ट्रेट कोर्ट का फैसला पलटा