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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने गोरखपुर के तत्कालीन CO विनोद कुमार द्विवेदी को राहत दी है। उन्हें वर्ष 2018 में विभागीय कार्रवाई में दंडित किया गया था। उन पर विवेचना की गोपनीय सूचना लीक करने का आरोप था। कोर्ट ने उनके खिलाफ पारित दंडादेश और निलंबन अवधि के वेतन से जुड़ा आदेश रद्द कर दिया। ट्रिब्यूनल का फैसला भी निरस्त कर दिया गया। कोर्ट ने आदेश का पालन चार सप्ताह में करने का निर्देश दिया है। न्यायमूर्ति अरिंदम सिन्हा और न्यायमूर्ति सत्यवीर सिंह की खंडपीठ ने यह आदेश दिया। याचिका में विभागीय जांच रिपोर्ट, दंडादेश, अपीलीय और पुनरीक्षण आदेशों को चुनौती दी गई थी। आरोपी की गिरफ्तारी के लिए महिला से संपर्क का था दावा मामला वर्ष 2018 का है। उस समय विनोद कुमार द्विवेदी गोरखपुर के कोतवाली क्षेत्र में CO के पद पर तैनात थे। एक हत्या और हत्या के प्रयास से जुड़े मुकदमे की विवेचना के दौरान संदिग्धों के कॉल डिटेल रिकॉर्ड की जांच हुई थी। विभागीय कार्रवाई में आरोप लगाया गया कि इसी दौरान एक महिला से उनका संपर्क हुआ। विभाग का कहना था कि बातचीत के जरिए विवेचना से जुड़ी गोपनीय सूचना लीक हुई। इस आरोप में उनके खिलाफ विभागीय कार्रवाई की गई। याची की ओर से अधिवक्ता ने कोर्ट को बताया कि घटना 13 अगस्त 2018 की थी। विनोद कुमार द्विवेदी उस समय विवेचना का नेतृत्व कर रहे थे। उनके प्रयासों से 28 अगस्त को मुख्य आरोपी गिरफ्तार हुआ था। याची का पक्ष था कि महिला से बातचीत का उद्देश्य आरोपी की गिरफ्तारी के लिए जानकारी जुटाना था। गिरफ्तारी के बाद महिला से कोई बातचीत नहीं हुई। तीन वेतनवृद्धियां रोकने के साथ वेतन भी रोका गया था विभागीय कार्रवाई में विनोद कुमार द्विवेदी को परिनिंदा का दंड दिया गया था। उनकी तीन वार्षिक वेतनवृद्धियां भी रोक दी गई थीं। इसके अलावा 15 फरवरी 2019 से 2 जून 2020 तक की निलंबन अवधि के वेतन का भुगतान भी नहीं किया गया था। इन आदेशों को भी याचिका में चुनौती दी गई थी। सरकार ने कहा- जांच में आरोप साबित हुए राज्य सरकार की ओर से कोर्ट में कहा गया कि विभागीय जांच के दौरान याची को अपना पक्ष रखने का पूरा अवसर दिया गया था। कॉल रिकॉर्ड के आधार पर उनके खिलाफ आरोप साबित हुए थे। सरकार ने कहा कि विवेचना के दौरान गोपनीयता भंग करना गंभीर मामला है। निलंबन अवधि के वेतन को लेकर भी संबंधित नियमों के तहत निर्णय लिया गया था। गिरफ्तारी के बाद महिला से बातचीत नहीं होने की बात अहम हाईकोर्ट ने मामले में याची के बचाव पर गौर किया। याची का स्पष्ट पक्ष था कि महिला से संपर्क आरोपी की गिरफ्तारी के लिए जानकारी जुटाने के उद्देश्य से किया गया था। कोर्ट ने यह भी देखा कि घटना के कुछ ही समय बाद मुख्य आरोपी गिरफ्तार हो गया था। इसके साथ ही महिला से गिरफ्तारी के बाद कोई बातचीत नहीं होने के याची के विशिष्ट कथन का खंडन नहीं किया गया। इन तथ्यों को देखते हुए हाईकोर्ट ने विभागीय कार्रवाई से जुड़े आदेशों को बरकरार नहीं रखा। दंडादेश और ट्रिब्यूनल का फैसला निरस्त हाईकोर्ट ने ट्रिब्यूनल का 2 अप्रैल 2026 का आदेश निरस्त कर दिया। इसके साथ ही 2 जून 2020 का दंडादेश भी रद्द कर दिया गया। 15 फरवरी 2019 से 2 जून 2020 तक की निलंबन अवधि के वेतन से संबंधित 24 फरवरी 2021 का आदेश भी निरस्त कर दिया गया। कोर्ट ने याची को परिणामी लाभ देने का निर्देश दिया है। आदेश की प्रमाणित प्रति संबंधित अधिकारी को उपलब्ध कराने को कहा गया है। कोर्ट ने चार सप्ताह के भीतर आदेश का अनुपालन सुनिश्चित करने का निर्देश दिया है।
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गोपनीय सूचना लीक के आरोपी CO को राहत:इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सजा और निलंबन अवधि का वेतन रोकने का आदेश रद्द किया