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22 घाव… घर में खून से लथपथ महिला… और फिर पिस्टल लूट की कहानी। चार साल पहले अलीगढ़ के चर्चित सुनीता वार्ष्णेय हत्याकांड में पुलिस ने 400 से ज्यादा CCTV कैमरों की पड़ताल, आरोपियों की गिरफ्तारी और पिस्टल समेत अन्य सामान की बरामदगी को केस की मजबूत कड़ी बताया था। लेकिन अदालत में एक-एक कर इन कड़ियों पर सवाल उठते गए। अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश की अदालत ने 36 पन्नों के फैसले में अभियोजन के साक्ष्यों को पर्याप्त नहीं माना और आरोपी मनोज कुमार व कैलाश बाबू को बरी कर दिया। मामले में बचाव पक्ष ने न सिर्फ गिरफ्तारी और फिंगरप्रिंट की प्रक्रिया पर सवाल उठाए, बल्कि वारदात के दो दिन बाद पिस्टल लूट में दिखाई गई बरामदगी और उसी पिस्टल को आरोपियों से बरामद किए जाने की कहानी पर भी सवाल खड़े किए।
7 मार्च की शाम… घर में अकेली थीं सुनीता
देहलीगेट थाना क्षेत्र के रामनगर में 7 मार्च 2022 की शाम पेंट कारोबारी बिजेंद्र कुमार की पत्नी सुनीता वार्ष्णेय घर में अकेली थीं। करीब 7:30 बजे बेटा अनिकेत घर पहुंचा तो मुख्य दरवाजा खुला मिला। अंदर सुनीता खून से लथपथ पड़ी थीं। शरीर पर चाकू के कई वार थे। गला दबाने की कोशिश के भी निशान बताए गए। अस्पताल ले जाने के बाद रात करीब 11 बजे उनकी मौत हो गई। शुरुआती तहरीर में दो दिन पहले घर पर काम करने आए पेंटरों पर शक जताया गया था। इसके बाद पुलिस जांच की दिशा बदल गई।
पुलिस की कहानी- लूट के लिए हत्या और पिस्टल ले गए आरोपी
पुलिस ने विवेचना करते हुए एक पेंट कंपनी के सेल्स एग्जीक्यूटिव मनोज कुमार निवासी सिद्धार्थ नगर चूहरपुर बन्नादेवी और उसके साथी कैलाश बाबू निवासी नई बस्ती बन्नादेवी को आरोपी बताते हुए 13 मार्च को गिरफ्तार दिखाया। पुलिस का दावा था कि मनोज ने पेंट कारोबारी द्वारा की गई बेइज्जती का बदला लेने व खुद पर हुए कर्ज को निपटाने के लिए लूट की नीयत से सुनीता पर हमला किया और घर से लाइसेंसी पिस्टल व नकदी ले गए। यहीं से बचाव पक्ष ने पुलिस की कहानी की टाइमलाइन पर सवाल खड़ा किया।
घटना के दो दिन बाद ही पिस्टल लूट दिखाई गई, फिर आरोपियों से बरामद कैसे?
बचाव पक्ष के अधिवक्ता चंद्रशेखर दीक्षित ने अदालत में पुलिस की उस कहानी पर सवाल उठाया, जिसमें वारदात के बाद पिस्टल लूटे जाने और बाद में उसी पिस्टल को आरोपियों से बरामद दिखाने की बात थी। बचाव पक्ष का तर्क था कि घटना के दो दिन बाद पिस्टल की लूट दिखाए जाने की प्रक्रिया और बाद में आरोपियों के कब्जे से उसकी बरामदगी की कहानी में महत्वपूर्ण विरोधाभास हैं। सवाल यह उठा कि यदि पिस्टल की लूट और उसकी बरामदगी पुलिस की कहानी का अहम आधार थी, तो उसकी कस्टडी, लूट की सूचना, बरामदगी की परिस्थितियों और आरोपियों से उसके जुड़ाव को अभियोजन किस तरह निर्विवाद रूप से साबित करता है। अदालत में इस बरामदगी को आरोपियों को हत्या से जोड़ने वाली निर्णायक कड़ी के तौर पर स्थापित नहीं किया जा सका।
पुलिस ने कहा था- मसूदाबाद से पकड़े, वहीं से बरामदगी
पुलिस का दावा था कि दोनों आरोपियों को मसूदाबाद बस स्टैंड के पास गिरफ्तार किया गया और उनके कब्जे से पिस्टल, नकदी, कैंची, रस्सी और खून से सने कपड़े बरामद किए गए। लेकिन बचाव पक्ष ने गिरफ्तारी की जगह और समय पर भी सवाल उठाया। बचाव पक्ष ने साबित किया कि मनोज को मैनपुरी के कुरावली से और कैलाश बाबू को गाजियाबाद की दुकान से पुलिस ले गई थी। यानी गिरफ्तारी की जगह से लेकर बरामदगी तक पुलिस की कहानी को बचाव पक्ष ने अदालत में चुनौती दी।
फिंगरप्रिंट में मैनिपुलेशन का सवाल
केस में फिंगरप्रिंट को वैज्ञानिक साक्ष्य के तौर पर इस्तेमाल किया गया। लेकिन बचाव पक्ष ने इसकी प्रक्रिया पर गंभीर सवाल उठाते हुए फिंगरप्रिंट में मैनिपुलेशन साबित किया। इससे आरोपियों को घटनास्थल से जोड़ने वाले वैज्ञानिक साक्ष्य की विश्वसनीयता प्रभावित हुई। हत्या जैसे गंभीर मामले में जब केस मुख्य रूप से परिस्थितिजन्य साक्ष्यों पर टिका हो, तो ऐसी कड़ी का कमजोर होना अभियोजन के लिए बड़ा झटका बना।
400 CCTV खंगाले, लेकिन चेहरे की पहचान नहीं हो सकी
पुलिस ने दावा किया था कि 400 से ज्यादा CCTV कैमरों की फुटेज खंगालकर आरोपियों तक पहुंचा गया।
लेकिन अदालत में फुटेज की गुणवत्ता और पहचान को लेकर सवाल सामने आए। फुटेज में अंधेरा था और संदिग्धों के चेहरे मास्क से ढके थे। ऐसे में केवल CCTV के आधार पर आरोपियों की पहचान निर्णायक रूप से साबित नहीं हो सकी। बचाव पक्ष के तर्क पर इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य की प्रमाणिकता को लेकर भी अभियोजन को कानूनी कसौटी का सामना करना पड़ा।
‘मनोज मुझे मत मारो’ वाला बयान भी सवालों में
बेटे अनिकेत ने अदालत में कहा कि अस्पताल ले जाते समय उसकी मां ने कथित तौर पर ‘मनोज मुझे मत मारो’ कहा था। बचाव पक्ष ने सवाल उठाया कि यह बात शुरुआती FIR और पुलिस के प्रारंभिक बयानों में दर्ज क्यों नहीं थी। इसके अलावा घटना के बाद आरोपी मनोज के अंतिम संस्कार और उठावनी में शामिल होने की बात भी सामने आई।
अभियोजन इन परिस्थितियों को आरोपी के खिलाफ निर्णायक रूप से स्थापित नहीं कर सका।
शुरुआती शक वाले पेंटरों की जांच भी बनी सवाल
परिजनों ने शुरुआती तहरीर में दो दिन पहले घर पर आए पेंटरों पर शक जताया था। लेकिन पुलिस यह स्पष्ट नहीं कर सकी कि उन पेंटरों की जांच किस स्तर तक हुई और उन्हें संदेह से बाहर करने का ठोस आधार क्या था।
कोर्ट-परिस्थितियों की पूरी कड़ी नहीं बनी अदालत ने परिस्थितिजन्य साक्ष्यों से जुड़े सुप्रीम कोर्ट के सिद्धांतों का हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि ऐसे मामले में साक्ष्यों की पूरी श्रृंखला स्थापित होनी चाहिए। इस केस में मोटिव, CCTV पहचान, फिंगरप्रिंट, गिरफ्तारी, पिस्टल की बरामदगी, कथित बयान और अन्य परिस्थितियों को जोड़कर अभियोजन आरोपियों का अपराध संदेह से परे साबित नहीं कर सका।
चार साल बाद पुलिस के ‘खुलासे’ का कोर्ट में उलटफेर
2022 में पुलिस ने जिस मामले को तेजी से सुलझाने और आरोपियों को पकड़ने का दावा किया था, उसमें चार साल बाद अदालत ने दोनों को बरी कर दिया। हत्या हुई थी, सुनीता की जान गई थी और वारदात बेहद गंभीर थी, लेकिन अदालत के सामने सवाल यह था कि क्या अभियोजन ने मनोज और कैलाश को ही हत्यारा साबित करने वाली हर कड़ी विश्वसनीय तरीके से जोड़ दी है?
अदालत का निष्कर्ष अभियोजन के पक्ष में नहीं गया।
बचाव पक्ष के अधिवक्ता चंद्रशेखर दीक्षित के अनुसार नतीजा पुलिस का 2022 का खुलासा कोर्ट में साक्ष्यों की कसौटी पर टिक नहीं सका और दोनों आरोपी बरी कर दिए गए।
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22 घाव, 400 CCTV और पिस्टल की बरामदगी:4 साल बाद कोर्ट में टूटी पुलिस की केस थ्योरी, फिंगरप्रिंट में मैनिपुलेशन पर सवाल, लूट की कहानी भी कठघरे में, दोनों आरोपी बरी