नई दिल्ली15 मिनट पहले
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सरकार ने वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही यानी अप्रैल से जून के GDP के आंकड़े जारी कर दिए हैं। इस दौरान देश की अर्थव्यवस्था 7.8% की दर से बढ़ी है। देश में बने सामान और सेवाओं की कुल वैल्यू 7.8% बढ़कर ₹81.36 लाख करोड़ पहुंच गई है।
आइए आसान भाषा में सवाल-जवाब से समझते हैं कि देश की आर्थिक सेहत का यह आंकड़ा आपके लिए क्या मायने रखता है।
सवाल: पहली तिमाही (Q1) में भारत की GDP और GVA ग्रोथ कितनी रही?
जवाब: सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय (MoSPI) के आंकड़ों के मुताबिक, रियल जीडीपी 7.8% की दर से बढ़कर ₹81.36 लाख करोड़ रही। एक साल पहले यह ₹75.46 लाख करोड़ थी। वहीं रियल जीवीए 8.2% बढ़कर ₹73.82 लाख करोड़ रहा।
नॉमिनल जीडीपी 10.3% बढ़कर ₹88.27 लाख करोड़ दर्ज की गई। पिछले साल यह ₹80 लाख करोड़ थी। नॉमिनल जीवीए 11.5% की बढ़त के साथ ₹80.53 लाख करोड़ तक पहुंच गया।
सवाल: क्या जीडीपी की कैलकुलेशन मैथेडोलॉजी में कोई बदलाव हुआ है?
जवाब: हां, मंत्रालय ने फरवरी 2026 में 2022-23 को नया बेस ईयर मानकर नई सीरीज लागू की थी। इसमें मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर के GVA के लिए ‘डबल डिफ्लेशन अप्रोच’ अपनाई गई है।
इसके तहत आउटपुट और इनपुट (कच्चे माल) की कीमतों को अलग-अलग प्रोड्यूसर प्राइस इंडेक्स (PPI) से एडजस्ट किया जाता है, जिससे मैन्युफैक्चरिंग की सही वैल्यू-एडेड स्थिति सामने आती है।
सवाल: आम नागरिक और उद्योग जगत के लिए इस जीडीपी डेटा का क्या मतलब है?
जवाब: वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच 7.8% की ग्रोथ इस बात का संकेत है कि घरेलू मांग और निवेश दोनों मजबूत हैं। पैसेंजर व्हीकल और हाउसहोल्ड व्हीकल रजिस्ट्रेशन में 13.9% और 15.9% की ग्रोथ यह दर्शाती है कि आम उपभोक्ता की खरीदारी क्षमता और विश्वास दोनों बने हुए हैं।
सवाल: जीडीपी के अगले आंकड़े कब जारी किए जाएंगे?
जवाब: सरकार के कैलेंडर के मुताबिक, चालू वित्त वर्ष 2026-27 की दूसरी तिमाही (जुलाई-सितंबर) के जीडीपी आंकड़े 30 नवंबर 2026 को जारी किए जाएंगे।
नए बेस ईयर 2022-23 के साथ जारी हुआ डेटा
सांख्यिकी मंत्रालय ने वित्त वर्ष 2025-26 के पूरे साल के जीडीपी आंकड़ों को एक नए बदलाव के साथ पेश किया है। इस बार पूरे साल के डेटा को नए बेस ईयर 2022-23 के पैमाने पर कैलकुलेट करके जारी किया गया है।
नौकरों, ड्राइवर और ई-वाहन डेटा भी शामिल किया
GDP की नई सीरीज में 2022-23 को बेस ईयर बनाया गया है। आर्थिक अनुमानों को ज्यादा सटीक बनाने के लिए इसमें अब जीएसटी नेटवर्क, ई-वाहन डेटाबेस और घरों में काम करने वाले कुक, ड्राइवर और घरेलू नौकरों की सेवाओं से जुड़ा डेटा भी शामिल किया गया है।
आमतौर पर हर 5 साल में बदला जाता है बेस-ईयर
समय के साथ अर्थव्यवस्था में आने वाले बड़े बदलावों को दर्ज करने के लिए समय-समय पर बेस ईयर बदला जाता है। आमतौर पर मंत्रालय हर पांच साल में डेटा सीरीज को अपडेट करता है, लेकिन कोविड महामारी और जीएसटी लागू होने की वजह से इस काम में देरी हुई।
1950 तक के नए आंकड़े दिसंबर 2026 तक आएंगे
सरकार सिर्फ नए आंकड़े ही नहीं जारी करेगी, बल्कि पुराने आंकड़ों को भी नए बेस ईयर के हिसाब से दोबारा कैलकुलेट करेगी। मंत्रालय ने संकेत दिया है कि इस नए फ्रेमवर्क के तहत ‘बैक-सीरीज’ डेटा (1950-51 तक के आंकड़े) दिसंबर 2026 तक आने की उम्मीद है।
नए माप से सटीकता बढ़ेगी; हर 5 से 10 साल में मानक बदलना चाहिए
आखिर जीडीपी मापने का तरीका क्यों बदला गया?
2011-12 वाला पैमाना 14 साल पुराना हो गया था। तब यूपीआई, जोमैटो, ओटीटी, गिग इकोनॉमी जैसी चीजें थीं ही नहीं। इसीलिए ये जरूरी था। 2022-23 को ही आधार वर्ष क्यों चुना गया? यह साल ‘सामान्य’ था। कोरोना खत्म हो चुका था। अर्थव्यवस्था स्थिर थी। डिजिटल इंडिया स्थापित हो चुका था। आधार वर्ष हमेशा ऐसा चुनते हैं जब न बहुत उछाल हो, न गिरावट।
इससे आम आदमी पर क्या असर पड़ेगा?
जेब पर सीधा असर नहीं, लेकिन सही आंकड़ों से सरकार बेहतर नीतियां बनाएगी। सही जगह पैसा लगेगा और विदेशी निवेश भी बढ़ेगा, जिसका फायदा धीरे-धीरे आम नागरिक को मिलेगा। आंकड़े बदले या कुछ छुपाया तो नहीं गया? नहीं। नए पैमाने से नापने पर माप बदलती है, यह स्वाभाविक है। अमेरिका, ब्रिटेन, चीन सब यही करते हैं। आंकड़े बदलना सटीकता की निशानी है।
कितने अंतराल पर इसे बदलना चाहिए?
अंतरराष्ट्रीय मानक के अनुसार हर 5 से 10 वर्ष में बदलना चाहिए। देश में 5 साल तय, पर 2017-18 में नोटबंदी व जीएसटी के कारण देरी हो गई। इसके बाद कोविड आ गया, इसलिए अब किया।
नॉलेज पार्ट: क्या होता है बेस ईयर
बेस ईयर वह साल है जिसकी कीमतों को ‘फिक्स’ मानकर आज की आर्थिक तरक्की को मापा जाता है। यह महंगाई के असर को हटाकर देश की ‘असली’ ग्रोथ दिखाने में मदद करता है।
उदाहरण: अगर 2011 में एक पेन 5 रुपए का था और आज 10 रुपए का है। अगर हम आज भी 100 पेन बना रहे हैं, तो 2011 के हिसाब से जीडीपी 500 रुपए दिखेगी।
वहीं ये आज के हिसाब से 1000 रुपए होगी। बेस ईयर हमें यह समझने में मदद करता है कि हम पेन ज्यादा बना रहे हैं या सिर्फ पेन महंगा हो गया है।
बेस ईयर क्यों बदला जाता है?
समय के साथ बाजार में आ रहे बदलावों, नई तकनीकों और उपभोग के नए तरीकों को जीडीपी की गणना में शामिल करने के लिए आधार वर्ष (Base Year) को बदला जाता है, ताकि आर्थिक विकास के सटीक और सही आंकड़े मिल सकें।
GVA क्या होता है?
ग्रॉस वैल्यू ऐडेड (GVA) से पता चलता है कि अर्थव्यवस्था के प्रमुख सेक्टर्स (जैसे खेती, इंडस्ट्री और सर्विस) में कुल कितना प्रोडक्शन और वैल्यू एडिशन हुआ है। यह जीडीपी में से टैक्स और सब्सिडी के तालमेल को हटाकर देखा जाने वाला शुद्ध पैमाना है।
इकोनॉमी की सेहत बताती है GDP
GDP यानी देश के भीतर एक तय समय में कितनी वैल्यू का सामान बना और कितनी सर्विसेज दी गईं। इसे देश की आर्थिक सेहत का ‘रिपोर्ट कार्ड’ भी कह सकते हैं। इसमें भारतीय कंपनियां ही नहीं, बल्कि देश में काम करने वाली विदेशी कंपनियों का प्रोडक्शन भी जोड़ा जाता है।
दो तरह की GDP: रियल और नॉमिनल
रियल जीडीपी: इसमें सामान और सेवाओं की कीमत बेस से तय की जाती है। अभी तक इसका साल 2011-12 था। इससे पता चलता है कि देश में उत्पादन सच में बढ़ा है या नहीं।
नॉमिनल जीडीपी: यह मौजूदा बाजार भाव पर आधारित होती है। इसमें महंगाई भी शामिल होती है। अगर चीजों के दाम बढ़ रहे हैं, तो नॉमिनल जीडीपी भी बढ़ी हुई दिखेगी।
कैसे की जाती है जीडीपी की गिनती?
जीडीपी निकालने के लिए एक खास फॉर्मूले का इस्तेमाल होता है:
$GDP = C + G + I + NX$
C (कंजम्प्शन): यानी हम और आप जो अपनी जरूरतों पर खर्च करते हैं।
G (गवर्नमेंट): सरकार द्वारा देश के विकास और सुविधाओं पर किया गया खर्च।
I (इन्वेस्टमेंट): कंपनियों द्वारा बिजनेस को बढ़ाने के लिए किया गया निवेश।
NX (नेट एक्सपोर्ट): दूसरे देशों को बेचे गए सामान में से खरीदे गए सामान को घटाना।
