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इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने उत्तर प्रदेश को-ऑपरेटिव बैंक के 50 सहायक प्रबंधकों को बड़ी राहत दी है। न्यायालय ने उनकी सेवा समाप्ति के आदेश रद्द करते हुए उन्हें पूर्व पदों पर बहाल करने का निर्देश दिया है। कोर्ट ने कहा कि केवल शासन के निर्देश पर कर्मचारी की सेवा समाप्त नहीं की जा सकती। न्यायमूर्ति राजीव सिंह की एकल पीठ ने मनीष कुमार व अन्य की याचिकाओं पर यह आदेश पारित किया। न्यायालय ने 7 जून 2019 सहित सेवा समाप्ति से संबंधित सभी आदेशों को निरस्त कर दिया। हालांकि, कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि सेवा समाप्ति की तारीख से फैसले तक की अवधि के लिए इन कर्मचारियों को वेतन नहीं मिलेगा। इस अवधि को ‘नो वर्क-नो पे’ माना जाएगा। यह मामला वर्ष 2015 में को-ऑपरेटिव बैंक में सहायक प्रबंधकों की भर्ती से जुड़ा है। शुरुआत में भर्ती के लिए कुछ विशेष विषयों में स्नातक की योग्यता तय की गई थी। बाद में सक्षम प्राधिकारी की अनुमति से इसमें बदलाव किया गया और किसी भी विषय में न्यूनतम 50 प्रतिशत अंकों के साथ स्नातक को पात्र माना गया। इसके बाद संशोधित विज्ञापन जारी कर लिखित परीक्षा और साक्षात्कार के माध्यम से अभ्यर्थियों का चयन हुआ था। इस भर्ती को एक असफल अभ्यर्थी ने हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। चयनित अभ्यर्थियों की नियुक्तियां उस याचिका के अंतिम निर्णय के अधीन रखी गई थीं। हालांकि, संबंधित याचिका 1 मार्च 2023 को खारिज हो गई थी। इसी बीच, भर्ती में अनियमितता के आरोपों की जांच शुरू हुई। शासन के 27 अप्रैल 2019 के पत्र के बाद बैंक के 50 सहायक प्रबंधकों की नियुक्तियां समाप्त करने की प्रक्रिया शुरू की गई। बैंक की प्रबंध समिति ने 30 मई 2019 को नियुक्तियां खत्म करने का निर्णय लिया और 7 जून को सेवा समाप्ति के आदेश जारी कर दिए थे।
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हाईकोर्ट ने 50 सहायक प्रबंधकों की सेवा समाप्ति रद्द की:को-ऑपरेटिव बैंक को पूर्व पदों पर बहाल करने का निर्देश