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इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने संविदा पर कार्यरत शिक्षकों के नियमितीकरण के मुद्दे पर राज्य सरकार से जवाब मांगा है। न्यायालय ने पूछा है कि 15 साल या उससे अधिक समय से संविदा पर काम कर रहे शिक्षकों के नियमितीकरण के लिए कोई नीति या योजना बनाई गई है या नहीं। न्यायमूर्ति पंकज भाटिया की एकल पीठ ने यह आदेश अमेठी के कस्तूरबा गांधी आवासीय बालिका विद्यालय की संविदा शिक्षिका अर्चना बूध की याचिका पर दिया। कोर्ट ने अर्चना की संविदा का नवीनीकरण न करने संबंधी 16 जून 2026 के विभागीय आदेश पर अंतरिम रोक लगा दी है और उन्हें फिलहाल सेवा जारी रखने की अनुमति दी है। याची की ओर से अधिवक्ता सक्षम अग्रवाल ने न्यायालय को बताया कि अर्चना बूध 16 जनवरी 2010 से विद्यालय में संविदा शिक्षिका के तौर पर कार्यरत हैं। लगभग 16 वर्षों से उनकी संविदा का लगातार नवीनीकरण किया जा रहा था, लेकिन जून 2026 में विभाग ने उनका नवीनीकरण रोक दिया। अधिवक्ता ने दलील दी कि याची अब 39 वर्ष की हो चुकी हैं और किसी अन्य विद्यालय में नए सिरे से आवेदन करने के लिए पात्र नहीं हैं। इतने लंबे समय तक सेवा देने के बाद उन्हें अचानक सेवा से हटाना उनके लिए गंभीर समस्या उत्पन्न करेगा। न्यायालय ने मामले पर टिप्पणी करते हुए कहा कि शिक्षक को राष्ट्र निर्माता के रूप में सम्मान दिया जाता है, लेकिन एक शिक्षक के साथ ऐसा व्यवहार किया जा रहा है कि 16 साल की लंबी सेवा के बाद उसे उसके हाल पर छोड़ दिया गया। कोर्ट ने यह भी नोट किया कि याची के खिलाफ कोई व्यक्तिगत आरोप नहीं है। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि यह मामला केवल याचिकाकर्ता तक सीमित नहीं है, बल्कि 15 साल या उससे अधिक समय से संविदा पर कार्यरत शिक्षकों के भविष्य से जुड़ा एक व्यापक और गंभीर मुद्दा है। इसी कारण कोर्ट ने राज्य सरकार से नियमितीकरण की नीति या योजना के बारे में स्पष्ट जवाब मांगा है। मामले की अगली सुनवाई 8 सितंबर को होगी।
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हाईकोर्ट संविदा शिक्षिका को हटाने पर सख्त:15 साल से अधिक सेवा वालों के नियमितीकरण की क्या है योजना?