आभूषणों की प्रासंगिकता तथा वैज्ञानिकता पर कार्यक्रम:लखनऊ में डॉ. ऋतू सिंह ने बताए आभूषण पहनने के वैज्ञानिक और स्वास्थ्य लाभ


लखनऊ में अखिल भारतीय संस्कृत परिषद् में शनिवार को ‘भारतीय संस्कृति में आभूषणों की प्रासंगिकता तथा वैज्ञानिकता’ विषय पर विशिष्ट व्याख्यान का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में मुख्य वक्ता के रूप में महिला महाविद्यालय के संस्कृत विभाग की वरिष्ठ प्राध्यापिका डॉ. ऋतू सिंह ने भारतीय परंपरा में आभूषणों के सांस्कृतिक और वैज्ञानिक पक्ष पर विस्तार से विचार रखे। डॉ. ऋतू सिंह ने कहा कि भारतीय संस्कृति में आभूषण केवल सौंदर्य और षोडश शृंगार के साधन मात्र नहीं हैं, बल्कि ये जीवनशैली और स्वास्थ्य संबंधी वैज्ञानिक मान्यताओं से भी गहराई से जुड़े हैं। उन्होंने विभिन्न आभूषणों का महत्व स्पष्ट करते हुए बताया कि मांग टीका एकाग्रता और मानसिक संतुलन से, कर्णफूल (कान छिदवाने की परंपरा) एक्यूप्रेशर बिंदुओं से तथा नथ महिला स्वास्थ्य से जुड़ी है। इसी प्रकार कलाई पर चूड़ियों के घर्षण से रक्त संचार बेहतर होता है। उन्होंने शरीर के ऊपरी हिस्से में सोने और निचले हिस्से में चांदी के आभूषण (पायल व बिछिया) पहनने की पारंपरिक व्यवस्था के महत्व को भी रेखांकित किया। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि लखनऊ विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के पूर्व आचार्य प्रो. हरि शंकर मिश्र ने भारतीय भाषाओं के विकास में संस्कृत की भूमिका पर प्रकाश डाला और ‘केशव’ व ‘माधव’ जैसे शब्दों के उदाहरण से संस्कृत और हिंदी के संबंध को समझाया। समारोह की अध्यक्षता परिषद् के अध्यक्ष डॉ. चंद्रभूषण त्रिपाठी ने की, जबकि अतिथियों का स्वागत मंत्री प्रो. प्रयाग नारायण मिश्र ने किया। कार्यक्रम की संयोजिका डॉ. पत्रिका जैन रहीं, संचालन संयुक्त मंत्री डॉ. अनिल कुमार पोरवाल ने किया और धन्यवाद ज्ञापन प्रो. अभिमन्यु सिंह ने दिया। इस अवसर पर डॉ. गौरव सिंह, डॉ. कुसुम सिंह और डॉ. विधुदत्त पाण्डेय सहित अनेक विद्वान, शोधार्थी एवं 50 से अधिक श्रोता उपस्थित रहे।

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