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लखनऊ में शनिवार रात ‘दावत ए सुख़न’ मुशायरा और कवि सम्मेलन का आयोजन हुआ। महफिल में देश के अलग अलग हिस्सों से एक दर्जन से अधिक शायर और कवियों ने हिस्सा लिया। मंच पर भारतीय संस्कृति और साहित्य का अद्भुत संगम देखने को मिला। कलमकारों ने अपनी रचनाओं से लोगों को बेहद प्रभावित किया । दर्शकों को वाह – वाह कहने पर मजबूर कर दिया। हिस्सा लेने वाले कवि और शायर इस अवसर पर नदीम फर्रूख़ , हसन काज़मी , वासिफ फ़ारूक़ी , शबीना अदीब , सर्वेश अस्थाना , जौहर कानपुरी , प्रियांशु गजेंद्र , हेमंत पांडे , शंभू शिखर समेत विभिन्न कवियों ने शेर सुनाये। कार्यक्रम में शायरों और कवियों ने अपनी रचनाओं से श्रोताओं को बांधे रखा। हास्य, व्यंग्य, गजल, गीत और कविताओं के रंगों से सजी इस महफिल में साहित्य प्रेमियों ने पूरे उत्साह के साथ हिस्सा लिया। कार्यक्रम में कविता और शायरी की परंपरा को आगे बढ़ाने के साथ समाज में आपसी भाईचारे और सांस्कृतिक मूल्यों को भी मजबूत करने का संदेश दिया। मुशायरे में पढ़े गए शेर… अपना गम इस तरह थोड़ा कम कीजिए दूसरों के लिए आंख नम कीजिए कुछ गरीबों के दिन भी संवर जाएंगे आप अपनी जरूरत को कम कीजिए शबीना अदीब
फूल सबके लिए महकते हैं लोग लेकिन कहाँ समझते हैं ज़िंदगी जी रहे हैं हम फिर भी ज़िंदगी के लिए तरसते हैं डॉ. सोनरूपा
उसको खिलाये बिन मैं कुछ भी खाता नहीं हूँ और घूम मैं अकेले भी तो पाता नहीं हूँ ऊंचाइयों से गिरने लगे जबसे हैं पति पत्नी के साथ छत पे भी मैं जाता नहीं हूँ शंभू शिखर
मैं तेरी आँख में आंसू की तरह रहता हूं जलते बुझते हुए जुगनू की तरह रहता हूं सब मेरे चाहने वाले हैं मेरा कोई नहीं मैं भी इस मुल्क में उर्दू की तरह रहता हूं हसन काज़मी
बस्ती के इक बुजुर्ग की मय्यत को देख कर मैं अपने बूढ़े बाप से जाकर लिपट गया जौहर कानपुरी
रिश्तों में तकरार बहुत है लेकिन इनमें प्यार बहुत है सारी दुनिया खुश रखने को बस अपना परिवार बहुत है सर्वेश अस्थाना
उसने भी सबके साथ मिरी की मुखालिफ़त जिसके लिए मैं सारे जमाने से लड़ गया नदीम फ़र्रुख़
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लखनऊ में सजी 'दावत ए सुख़न' की महफिल:एक दर्जन शायरों ने लिया हिस्सा , 'ऊंचाइयों से गिरने लगे जबसे हैं पति , पत्नी के साथ छत पे भी मैं जाता नहीं हूँ'