बांग्लादेश बॉर्डर पर कांग्रेस सांसद ने क्यों खरीदी जमीन:इमरान प्रतापगढ़ी समेत 7 के नाम 95 एकड़ रजिस्ट्री, लोग बोले– मेडिकल कॉलेज का लालच दिया


“हमसे कहा गया था कि यहां मेडिकल कॉलेज बनेगा, फैक्ट्री लगेगी, हमारे बच्चे यहीं पढ़ेंगे, गांव के युवाओं को रोजगार भी मिलेगा। इसी भरोसे पर हम किसानों ने 12 लाख रुपए प्रति एकड़ के हिसाब से 95 एकड़ जमीन बेच दी। अब पता चल रहा है कि यहां आर्मी स्टेशन बनने वाला है। सेना के अधिकारी यहां विजिट कर रहे हैं।” ये कहना है किशनगंज के भेलागुड़ी गांव के किसान मुजफ्फर आलम का, जिन्होंने कांग्रेस सांसद इमरान प्रतापगढ़ी और उनके रिश्तेदारों को जमीन बेची है। दरअसल, बिहार के किशनगंज के ठाकुरगंज प्रखंड स्थित भेलागुड़ी में आर्मी स्टेशन बनाए जाने की घोषणा की गई है। इसके बाद से यहां की जमीन की बिक्री बढ़ गई है, बड़ी संख्या में बाहरी लोग यहां जमीन खरीद रहे हैं। बांग्लादेश बॉर्डर पर स्थित किशनगंज जिले में कांग्रेस सांसद ने जमीन क्यों खरीदी, किन लोगों ने उन्हें जमीन बेची? उसका उपयोग क्या बताया गया? ये जानने के लिए दैनिक भास्कर टीम ग्राउंड पर पहुंची.. सबसे पहले जानिए, क्यों महत्वपूर्ण है किशनगंज की ये जमीन? बांग्लादेश बॉर्डर पर स्थित किशनगंज जिले का भेलागुड़ी मौजा बिहार के उस इलाके में है, जहां से करीब 2 किलोमीटर दूर देश का सबसे संवेदनशील भू-भाग माना जाने वाला सिलीगुड़ी कॉरिडोर (चिकन नेक) शुरू होता है। करीब 20 किलोमीटर चौड़ा यह कॉरिडोर भारत के पूर्वोत्तर राज्यों से जोड़ने वाला एकमात्र जमीनी मार्ग है। नेपाल, बांग्लादेश और भूटान की सीमाओं के पास होने के कारण यह इलाका सुरक्षा की दृष्टि से बहुत ज्यादा महत्वपूर्ण है। इसी वजह से यहां सेना का नया स्टेशन बनाए जाने का ऐलान किया गया है। साल 2025 के सितंबर महीने में इस इलाके में आर्मी स्टेशन के लिए जमीन चिह्नित की गई। 189.68 एकड़ जमीन अधिग्रहित की जानी है। इसकी प्रक्रिया शुरू हो गई है। UP-दिल्ली के लोग जमीन खरीदने आने लगे उत्तर-प्रदेश और दिल्ली में रहने वाले लोग किशनगंज की जमीन में करोड़ों रुपए निवेश कर रहे हैं। कोई चाय बगान खरीद रहा है तो कोई उपजाऊ जमीन। इस बीच कांग्रेस सांसद इमरान प्रतापगढ़ी ने जमीन खरीदी तो मामला हाईलाइट हो गया। सांसद ने करीब 7 एकड़ 18 डिसमिल जमीन खरीदी है। इसी क्षेत्र के जिला परिषद सदस्य गनी से उन्होंने कैश में जमीन खरीदीं। इसके लिए करोड़ों रुपए में सौदे हुए। इसके अलावा यहां के स्थानीय लोगों में चर्चा ये भी है कि गनी ने सांसद को 20 एकड़ जमीन दान में दी है। जब दैनिक भास्कर की टीम ने गनी को फोन कर इस बारे में जानकारी लेना चाहा तो उन्होंने कॉल रिसीव नहीं किया। दैनिक भास्कर ने करीब 3 दिनों तक इस पूरे मामले की पड़ताल की। रजिस्ट्री दस्तावेजों को पढ़ा, किसानों से बातचीत की, स्थानीय प्रशासन का पक्ष जाना और सरकारी प्रक्रिया की टाइमलाइन को खंगाला। जांच में सामने आया कि जिस समय आर्मी स्टेशन बनाने की प्रशासनिक प्रक्रिया आगे बढ़ रही थी, उसी दौरान बिहार से बाहर के लोगों ने बड़ी मात्रा में जमीन खरीदनी शुरू कर दी थी। किसानों का दावा है कि उनसे जमीन मेडिकल कॉलेज, अस्पताल, फैक्ट्री और खेल अकादमी बनाने के नाम पर ली गई। अब आर्मी स्टेशन बनने की चर्चा तेज हुई तो सवाल उठ रहे हैं कि जमीन खरीदने का असली उद्देश्य क्या था? क्यों झूठ बोला गया? किसान बोले- हमें मेडिकल कॉलेज का सपना दिखाया गया भेलागुड़ी गांव के किसान जय प्रकाश दास बताते हैं कि करीब सात-आठ महीने पहले हमलोगों से कांग्रेस सांसद ने कई टुकड़ों में जमीन खरीदी। कहा गया था कि यहां मेडिकल कॉलेज बनेगा। खेल अकादमी बनेगी। रोजगार मिलेगा। इसी भरोसे पर हमने करीब 12 लाख रुपए प्रति एकड़ के हिसाब से जमीन बेच दी। अगर यहां मेडिकल कॉलेज बनता तो पूरे इलाके के युवाओं को फायदा मिलता। अब सुन रहे हैं कि सरकार आर्मी स्टेशन बनाने वाली है। सेना देश के लिए जरूरी है, लेकिन अगर मेडिकल कॉलेज और खेल अकादमी की जगह सेना का स्टेशन बन गया तो जिस उम्मीद में लोगों ने जमीन दी थी, वह पूरी नहीं होगी। जब जमीन खरीदी गई थी, तब यहां का बाजार भाव आज जितना नहीं था। हमें लगा कि मेडिकल कॉलेज बनने से गांव के जमीन की कीमत बढ़ेगी। आने वाली पीढ़ियों को फायदा होगा। बच्चों को पढ़ाई के लिए बाहर नहीं जाना पड़ेगा। बच्चों के भविष्य के लिए 2 एकड़ जमीन दी किसान मुजफ्फर आलम बताते हैं कि ‘मैंने करीब 2 एकड़ जमीन बेची। हमसे कहा गया था कि यहां मेडिकल कॉलेज खुलेगा, फैक्ट्री लगेगी और रोजगार मिलेगा। मुझे लगा कॉलेज बनेगा तो आने वाली पीढ़ियों का भविष्य सुधर जाएगा। इसी भरोसे पर जमीन दी। अब सुन रहे हैं कि यहां बीएसएफ या सेना का स्टेशन बनेगा। गांव के अधिकांश परिवार खेती और चाय बागानों पर निर्भर हैं। मेडिकल कॉलेज या उद्योग लगते तो रोजगार बढ़ता। हर जमीन की कीमत 12 लाख रुपए प्रति एकड़ ग्रामीण गुलाम नकबानी ने कहा कि तीन गांवों को मिलाकर लगभग 40 से 50 किसानों ने जमीन बेची। जमीन अलग-अलग किसानों से अलग-अलग समय पर खरीदी गई। अधिकांश किसानों को करीब 12 लाख रुपए प्रति एकड़ भुगतान मिला। अगर यहां मेडिकल कॉलेज और अस्पताल बनते तो पूरे इलाके के लोग खुश होते। दूसरे जिलों से भी लोग पढ़ने और रोजगार के लिए आते। बाजार बढ़ता। छोटे दुकानदारों और स्थानीय युवाओं को रोजगार मिलता। फरवरी-मार्च 2026 में बढ़ी जमीन की बिक्री भेलागुड़ी मौजा भारत के सबसे संवेदनशील इलाकों में से एक सिलीगुड़ी कॉरिडोर (चिकन नेक) से सिर्फ 2KM दूर स्थित है। नेपाल, बांग्लादेश और भूटान की सीमाओं से सटा यह क्षेत्र लंबे समय से सुरक्षा एजेंसियों की नजर में रहा है। रक्षा मंत्रालय के रक्षा संपदा विभाग और जिला प्रशासन ने 1 अक्टूबर 2025 से यहां सेना स्टेशन स्थापना को लेकर प्रारंभिक प्रक्रिया शुरू की। इसके बाद 7 नवंबर को अधिकारियों ने संयुक्त निरीक्षण किया। जनवरी 2026 में जिला प्रशासन और भू-अर्जन कार्यालय के बीच बैठक हुई। फरवरी में अंतिम प्रशासनिक चर्चाएं शुरू हुईं और इसी दौरान भेलागुड़ी में जमीनों की रजिस्ट्रियां अचानक तेज हो गईं। भास्कर को मिले दस्तावेज बताते हैं कि जनवरी से अप्रैल 2026 के बीच केवल 7 बाहरी खरीदारों ने 24 रजिस्ट्रियों के जरिए करीब 95 एकड़ जमीन ली। 7 खरीदार 95 एकड़ जमीन, एक सांसद का नाम रजिस्ट्रियों की पड़ताल में 7 ऐसे खरीदार सामने आए, जिनका स्थाई पता बिहार नहीं है। इनमें उत्तर प्रदेश और दिल्ली के निवासी शामिल हैं। इन्हीं नामों में कांग्रेस के राज्यसभा सांसद इमरान प्रतापगढ़ी भी शामिल हैं। दस्तावेजों के अनुसार उनके नाम करीब 7 एकड़ जमीन की 9 रजिस्ट्रियां दर्ज हैं। जमीन खरीदने वाले 7 लोग इन सभी के नाम पर कुल मिलाकर लगभग 70.91 एकड़ जमीन दर्ज है, जबकि स्थानीय लोगों का दावा है कि 20 एकड़ जमीन दान में मिलने से यह रकबा और बढ़ गया है। हालांकि, अब तक यह स्पष्ट नहीं है कि इन सभी लोगों ने जमीन किस उद्देश्य से खरीदी है। कांग्रेस सांसद इमरान प्रतापगढ़ी की ओर से भी इस संबंध में कोई सार्वजनिक स्पष्टीकरण सामने नहीं आया है। सांसद ने रजिस्ट्री के समय लिखा- खेती हमारा पेशा है बता दें कि राज्यसभा की आधिकारिक सदस्य निर्देशिका और रजिस्ट्री दस्तावेजों में दर्ज पते का मिलान करने पर इमरान प्रतापगढ़ी का स्थायी पता उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ जिले का पाया गया। रजिस्ट्री में उनके पेशे के कॉलम में खेती और पार्लियामेंट मेंबर दर्ज है। दस्तावेजों की पड़ताल में सामने आया कि चार महीने में सात खरीदारों के नाम 24 रजिस्ट्रियां हुईं। चार खरीदारों के पिता का नाम एक ही दर्ज है। कुछ दस्तावेजों में एक ही व्यक्ति द्वारा कहीं पर जमीन बेचे जाने और कहीं दान किए जाने का जिक्र है। अफसर बोले- सेना के कैंप के लिए अभी अधिग्रहण फाइनल नहीं है इस मामले में ठाकुरगंज के सब रजिस्ट्रार डॉ. कुमार दीनबंधु ने कहा कि रजिस्ट्री ऑफिस यह तय नहीं करता कि जमीन का इस्तेमाल क्या होगा। यहां सिर्फ निर्धारित राजस्व के अनुसार रजिस्ट्री की जाती है। ठाकुरगंज के अंचलाधिकारी मृत्युंजय कुमार ने कहा कि फिलहाल अंतिम भूमि अधिग्रहण नहीं हुआ है। अभी केवल नापी, सत्यापन और प्रारंभिक जांच की प्रक्रिया चल रही है। जांच पूरी होने के बाद ही अंतिम सूची जारी होगी। अभी यह तय होना बाकी है कि अंतिम रूप से कौन-कौन सी जमीन अधिग्रहित होगी। सेना का कैंप कितनी जमीन पर बनेगा और कहां तक अधिकग्रहण होगा। इस पर अभी वर्किंग चल रही है। हालांकि, इस मामले को लेकर जब दैनिक भास्कर की टीम ने किशनगंज के DM नवीन कुमार से बात की तो उन्होंने बताया कि सरकार की तरफ से अभी फिलहाल सेना स्टेशन के लिए जमीन फिक्स नहीं की गई है। इसी वजह से अभी कोई भी व्यक्ति भेलागुड़ी मौजा में जमीन खरीद सकता है।

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