सम्भल में इमाम जैनुल आबेदीन को किया याद:शबीह-ए-ताबूत व अलम-ए-मुबारक का जुलूस निकाला


सम्भल के कस्बा सिरसी के मोहल्ला शर्की सादात में शुक्रवार शाम 8 बजे हजरत इमाम ज़ैनुल आबेदीन अलैहिस्सलाम की याद में शबीह-ए-ताबूत व अलम-ए-मुबारक का आयोजन किया गया। यह कार्यक्रम पूरे धार्मिक उत्साह और अकीदत के साथ संपन्न हुआ, जिसमें बड़ी संख्या में अकीदतमंदों ने शिरकत की। कार्यक्रम की शुरुआत मजलिस-ए-सय्यदुश शोहदा से हुई। इसमें जनाब एजाज़ आलम ने अपने साथियों के साथ सोज़खानी पेश की। अकीदतमंदों ने मजलिस में शामिल होकर इमाम को श्रद्धांजलि अर्पित की। मजलिस को संबोधित करते हुए मौलाना मेंज़र रज़ा ने हज़रत इमाम ज़ैनुल आबेदीन अलैहिस्सलाम के जीवन, चरित्र और उनके धार्मिक योगदान पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि इमाम अपनी अत्यधिक इबादत और सज्दों के कारण ‘सज्जाद’ तथा ‘ज़ैनुल आबेदीन’ के नाम से प्रसिद्ध हुए। मौलाना ने आगे कहा कि कर्बला की ऐतिहासिक जंग के दौरान बीमारी की वजह से इमाम ज़ैनुल आबेदीन युद्ध में शामिल नहीं हो सके थे। इसके बाद उन्होंने इमामत की जिम्मेदारी संभाली और इस्लाम की वास्तविक शिक्षाओं तथा इंसानियत के संदेश को दुनिया तक पहुंचाया। हज़रत इमाम जैनुल आबेदीन शिया समुदाय के बारह इमामों में चौथे इमाम थे। वे हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के पुत्र, हज़रत इमाम हसन अलैहिस्सलाम के भतीजे और हज़रत अली अलैहिस्सलाम के पौत्र थे। कर्बला की त्रासदी के बाद उन्हें यज़ीद के दरबार दमिश्क ले जाया गया, जहाँ कठिन परिस्थितियों और कैद के बावजूद उन्होंने सब्र, इबादत और धार्मिक शिक्षा के माध्यम से इस्लाम की मूल शिक्षाओं को जीवित रखा। मजलिस के उपरांत शबीह-ए-ताबूत व अलम-ए-मुबारक का जुलूस निकाला गया। जुलूस में स्थानीय अंजुमनों ने नौहाखानी और सीनाज़नी कर इमाम की बारगाह में नज़राना-ए-अकीदत पेश किया। अंजुमन जुल्फेकार-ए-हैदरी और अंजुमन पंजेतनी सहित अन्य मातमी अंजुमनों ने गमगीन माहौल में मातम किया। जुलूस निर्धारित मार्गों से होकर इमामबाड़ा मोहल्ला शर्की सादात पहुंचकर शांतिपूर्वक संपन्न हुआ। पूरे आयोजन के दौरान क्षेत्र में श्रद्धा, अनुशासन और गम का माहौल बना रहा। स्थानीय लोगों ने बड़ी संख्या में शामिल होकर हज़रत इमाम ज़ैनुल आबेदीन अलैहिस्सलाम की शिक्षाओं को याद किया और उनके बताए हुए सब्र, इबादत तथा इंसानियत के रास्ते पर चलने का संकल्प लिया।

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