लखनऊ में 'ठेस' और 'अपरिचित' नाटकों का मंचन:अंतर्राष्ट्रीय बौद्ध शोध संस्थान में पारिवारिक मूल्यों पर आधारित थीं प्रस्तुतियां


लखनऊ के गोमतीनगर स्थित अंतर्राष्ट्रीय बौद्ध शोध संस्थान में शनिवार को दो नाट्य प्रस्तुतियों ‘ठेस’ और ‘अपरिचित’ का मंचन किया गया। भारतीयम् और शिवांजना एंटरटेनमेंट्स के सहयोग से आयोजित इन नाटकों ने रिश्तों, संवेदनाओं और पारिवारिक मूल्यों को प्रभावी ढंग से प्रस्तुत किया। इस अवसर पर बड़ी संख्या में साहित्य और रंगमंच प्रेमी उपस्थित रहे। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि उत्तर प्रदेश विधान परिषद सदस्य पवन सिंह चौहान थे। इस दौरान भारतीयम् के संस्थापक पुनीत अस्थाना ने वरिष्ठ साहित्यकार पद्मश्री डॉ. विद्या बिंदु सिंह और वरिष्ठ रंगकर्मी पद्मश्री डॉ. अनिल रस्तोगी को सम्मानित किया। दोनों नाटकों का निर्माण राजीव रंजन सिंह ने किया था, जबकि उनका लेखन आशुतोष शुक्ल ने किया। वरिष्ठ रंग निर्देशक गोपाल सिन्हा ने इन प्रस्तुतियों का निर्देशन किया। महिला के जीवन संघर्ष कों दिखाया पहली प्रस्तुति ‘ठेस’ त्याग, प्रेम, विश्वास और आत्मसम्मान पर केंद्रित एक मार्मिक कहानी थी। यह नाटक एक महिला के जीवन संघर्ष और उसकी आंतरिक भावनाओं को संवेदनशीलता से दर्शाता है। कहानी ने यह संदेश दिया कि समय बीतने के बावजूद कुछ मानसिक आघात यादों का हिस्सा बने रहते हैं। प्रस्तुति के कई दृश्यों ने दर्शकों को भावुक किया। दूसरी प्रस्तुति ‘अपरिचित’ आधुनिक विज्ञान, पारिवारिक रिश्तों और मानवीय संवेदनाओं के बीच उठने वाले प्रश्नों पर आधारित थी। राधेश्याम सोनी के पुनर्लेखन ने इस कहानी को और अधिक प्रभावशाली बनाया। नाटक ने दर्शकों को यह सोचने पर विवश किया कि रिश्तों की वास्तविक पहचान रक्त संबंधों से होती है या प्रेम, विश्वास और संस्कारों से। समापन पर दर्शकों ने तालियों से गूंजा सभागार रूपाली चंद्रा, राजीव रंजन सिंह और राजीव त्रिपाठी ने अपने सशक्त अभिनय से दर्शकों की सराहना प्राप्त की। कलाकारों के संवाद, भाव-भंगिमाएं और मंच पर सहज प्रस्तुति ने पात्रों को जीवंत बना दिया। दोनों नाटकों के समापन पर दर्शकों ने तालियों की गड़गड़ाहट से कलाकारों का उत्साहवर्धन किया। इस कार्यक्रम ने एक बार फिर यह सिद्ध किया कि गुणवत्तापूर्ण रंगमंच केवल मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि समाज को विचार करने की नई दिशा भी प्रदान करता है।

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