एआईसीटीई के चेयरमैन प्रो. योगेश सिंह।
अगर आप स्टार्टअप या किसी इंक्यूबेटर के साथ काम करते हुए पेटेंट कराते हैं, तब भी आप पीएचडी कर सकते हैं। ऑल इंडिया काउंसिल फॉर टेक्निकल एजुकेशन (AICTE) के चेयरमैन प्रो. योगेश सिंह ने कानपुर में बताया कि हम रूल्स चेंज करने की कोशिश कर रहे हैं। जो आज पीए
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बदलाव की तैयारी बताते प्रो. योगेश सिंह।
सीड मनी के लिए एआईसीटीई देगी फंड
एआईसीटीई के चेयरमैन ने कहा कि आप अगर अपनी कंपनी शुरू करना चाहते हैं, आपका स्टार्टअप कंपनी है और इनोवेशन में कुछ करेंगे, तो आप 5 साल इन्वेस्ट कीजिए, इनक्यूबेटर में काम कीजिए। वहाँ पर आपको सीड मनी है और व्यवस्थाएं मिलेंगी, उसको एआईसीटीई फंड करेगी। और बाद में आप अपना प्रोडक्ट बनाते हैं, आपकी कंपनी चलती है, तो साथ-साथ में आपको पीएचडी भी मिल जाएगी।
रीजनल लैंग्वेज से पढ़ने वाले बच्चों के मन में भय
प्रो. योगेश सिंह ने टेक्निकल एजुकेशन के कोर्सेज को रीजनल लैंग्वेजेज में ट्रांसलेट पर बताया कि आज फर्स्ट ईयर, सेकंड ईयर, थर्ड ईयर तक का पूरा करिकुलम भारतीय भाषाओं में उपलब्ध है। फिलहाल कुछ सौ बच्चे एडमिशन ले रहे हैं, बहुत सारी जगह सीट्स खाली हैं। तो उसका रीज़न एक ही है कि बच्चों के मन में कहीं भय है। उनको लगता है कि अगर इंग्लिश माध्यम में पढ़ाई करेंगे, तो हमको अच्छी जॉब मिलेगी।
कार्पोरेट वर्ल्ड की जिम्मेदारी भय को निकाले
अभी कॉर्पोरेट वर्ल्ड की ज़िम्मेदारी है और हम एजुकेशन से जुड़े लोगों की भी ज़िम्मेदारी है कि इस भय को बच्चों के मन से निकालें। यह धीरे-धीरे जाएगा, तो उसके बाद में यह आपको इसमें बढ़त देखने को मिलेगी। तो भाषा एक प्रभावी माध्यम है किसी भी चीज़ के लिए। लेकिन अब देश बदलता है, तो धीरे-धीरे ही बदलता है। शिक्षा के परिवर्तन बहुत धीरे आते हैं और धीरे आने भी चाहिए।
एआई से फायदा होने वाला
एआई के बढ़ते उपयोग पर कहा कि एआई से फायदा ही होने वाला है। भारत को तो नुकसान नहीं होगा। कंपैरिजन और एनालिसिस करना है, तो एआई आपको करके दे रहा है। पर उसमें से नया क्या निकालना है, क्या इनोवेशन हो सकती है, क्या समझ से हम लोगों की जिंदगी को अच्छा बनाने के लिए कुछ निकाल सकते हैं। यह तो मानव के मस्तिष्क का काम है।