अलीगढ़ नगर निगम के आदेश पर हाईकोर्ट की मुहर:​अवैध कब्जेदारों की बेदखली का मामला, याचिकाकर्ताओं के दावे खारिज


इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अलीगढ़ नगर निगम द्वारा बनाए गए आवासीय क्वार्टरों पर अवैध रूप से रह रहे लोगों को बड़ा झटका दिया है।
कोर्ट ने वहां अवैध रूप से रह रहे लोगों को बेदखल करने के नगर निगम के आदेश और नोटिस को पूरी तरह सही ठहराते हुए उनकी याचिका खारिज कर दी है। ​यह आदेश न्यायमूर्ति जेजे मुनीर एवं न्यायमूर्ति अरुण कुमार की खंडपीठ ने शफीकुर रहमान व छह अन्य की याचिका पर उनके अधिवक्ता और अलीगढ़ नगर निगम के अधिवक्ता को सुनकर दिया है।
जानिये क्या है पूरा मामला अलीगढ़ जिले की कोल तहसील के मौजा दोदपुर माफी के प्लॉट नंबर 78 और 87 पर नगर निगम अलीगढ़ ने अपने कर्मचारियों के लिए आवासीय क्वार्टर बनाए थे। याचियों का कहना था कि उनके पूर्वज इन क्वार्टर में किराएदार के रूप में रह रहे थे और नगर निगम को नियमित किराया दे रहे थे। यह भी कहा गया था कि याचियों ने इस जमीन को फ्रीहोल्ड कराने के लिए पैसे भी जमा किए थे। जब नगर निगम ने गत 15 मई को आपत्ति खारिज कर दी और छह जून को 15 दिनों के भीतर क्वार्टर खाली करने का नोटिस दिया तो याचियों ने यह याचिका दाखिल की। ​नगर निगम के अधिवक्ता ने याचिका का विरोध करते हुए कहा कि याची केवल धोखे से इन खाली क्वार्टरों में घुस आए हैं। वे पूरी तरह अतिक्रमणकारी हैं। उन्होंने यह भी कहा ने कि याचियों के पास न तो कोई अलॉटमेंट लेटर है, न कोई रेंट एग्रीमेंट और न ही कोई ऐसा पुख्ता दस्तावेज जो उनके किराएदार होने की पुष्टि करता हो। एडवोकेट विभु राय ने कहा कि मात्र कुछ पैसे जमा कर देने से सरकारी संपत्ति पर मालिकाना हक नहीं मिल जाता। ​दावों को पूरी तरह खारिज माना गया हाईकोर्ट ने सुनवाई और दस्तावेजों की जांच के बाद याचियों के दावों को पूरी तरह खारिज करते हुए कहा कि याची कभी खुद को किराएदार बताते हैं तो कभी फ्रीहोल्ड अधिकारों के वैध आवंटी लेकिन वे अपने पक्ष में कोई भी पुख्ता दस्तावेजी सबूत (जैसे अलॉटमेंट लेटर, लीज डीड या रेंट एग्रीमेंट) पेश नहीं कर सके।
याचियों ने जो रसीदें पेश की थीं, वे किसी अन्य प्लॉट से संबंधित थीं और उनसे यह साबित नहीं होता कि नगर निगम ने उनसे पैसे मांगे थे। ​कोर्ट ने स्पष्ट रूप से कहा कि महज लंबे समय तक कब्जा बनाए रखने से सार्वजनिक (सरकारी) संपत्ति पर कोई कानूनी अधिकार उत्पन्न नहीं हो जाता। ​ऐसे में नगर आयुक्त के गत 15 मई के आदेश और उसके बाद जारी बेदखली नोटिस में कोई भी अवैधता या मनमानापन नहीं है। कोर्ट ने याचिका खारिज करते हुए कहा कि नगर निगम कानून के दायरे में रहकर आगे की कार्रवाई करने के लिए स्वतंत्र है।

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