20 वें तीर्थंकर भगवान मुनिसुव्रतनाथ का पंचकल्याणक महोत्सव आज से:देश भर से जैन धर्म के 2 हजार श्रद्धालुओं का समूह पहुंचा, 700 कमरों मं ठकहने की व्यवस्था


ज्येष्ठ माह की शुक्ल पक्ष तृतीया से सप्तमी अर्थात आज 17 से 21 जून 2026 तक इस जैन मंदिर का पंचकल्याणक प्रतिष्ठा महोत्सव और शिखर पर कलशारोहण समारोह मनाया जा रहा है। इससे पहले विशेषरूप से भगवान श्री रामचंद्र जी का जन्म जिन तीर्थंकर के काल में हुआ था, ऐसे बीसवें तीर्थंकर भगवान मुनिसुव्रतनाथ का भी एक अत्यन्त सुंदर जिनमंदिर इसी तीर्थ परिसर में निर्मित हुआ है। दक्षिण भारतीय अद्वितीय प्राचीन शैली में निर्मित भगवान मुनिसुव्रतनाथ जी की वेदी अत्यन्त मनमोहक एवं कलात्मक बनायी गयी है। इस वेदी में 21 इंची काले पाषाण में भगवान के विराजमान होते ही 17 जून से भगवान मुनिसुव्रतनाथ जी का पंचकल्याणक मनाया जायेगा। जैनधर्म : कभी 923 दिव्य पुत्रों से समृद्ध थी अयोध्या जैनधर्म इस भारत दरर्ण इतिखनादिकालीन सांस्कृतिक धरोहर मानी जाती अयोध्या के साथ जैनधर्म का पुरातनकालीन महत्वपूर्ण इतिहास आज पूरे विश्व के समक्ष नये स्वरूप में है। वहीं इस युग में अयोध्या में जन्म लेने वाले प्रथम अवतार के रूप में भगवान ऋषभदेव का नाम सुसज्जित प्राप्त होता है। 24 में से जैनधर्म के प्रथम तीर्थंकर भगवान कतार के ने जब यहाँ जन्म लिया। पश्चात् उनका विवाह रानी यशस्वती और रानी सुनंदा के साथ हुआ, जिनसे चकठती सम्राट भरत आदि 101 पुत्रों और ब्राह्मी-सुन्दरी दो पुत्रियों ने जन्म लिया। पुनः इसी परम्परा में भरत चक्रवर्ती का विवाह होने के उपरांत उनके 923 पुत्र जन्में, जिन्होंने उसी भव में कठोर तपश्चरण करके मोक्ष प्राप्त वकतलया। ये अद्‌भुत इतिहास है, जो जैन आगम पुराणों में वर्णित जन सामान्य को जानने के लिए अभी तक रत्सुिलभ नहीं था, लेकिन अब सर्वोच्च जैन साध्वी गणिनीप्रमुख ज्ञानमती माताजी की प्रेरणा व दूरदर्शिता और नई सोच से एक जिनमंदिर के आकार में परिवर्तित होता दिख रहा है। हाल ही में भगवान ऋषभदेव दिगम्बर जैन तीर्थ, बड़ी मूर्ति, रायगंज में इन्हीं 923 पुत्रों का एक सुन्दर जिनमंदिर निर्मित किया गया है, जो इस इतिहास को आने वाले भक्तों के लिए जानने योग्य बनाकर अजर-अमर करेगा। पाषाण में बनीं ये प्रतिमाएँ भगवान का आकार तभी लेती हैं, जब इनके मस्तक पर मंत्रों के संस्कार और प्राण-प्रतिष्ठा सम्पन्न होती है। इसी प्राण प्रतिष्ठा का स्वरूप राष्ट्रीय स्तर पर हम सब देखने जा रहे हैं। इस महोत्सव में सर्वोच्च जैन साध्वी पूज्य गणिनीप्रमुख ज्ञानमती माताजी का सान्निध्य, आर्यिका चंदनामती माताजी का मार्गदर्शन एवं पीठाधीश स्वामी रवीन्द्रकीर्ति स्वामी का नेतृत्व प्राप्त हो रहा है। साथ ही इस अवसर पर आचार्य भद्रबाहुसागर महाराज संघ सहित तीर्थ पर पधार चुके हैं, जो अपना मंगलमयी सान्निध्य प्रदान करेंगे। स्वामी रवीन्द्रकीर्ति ने बताया कि जैनधर्म में पंचकल्याणक का अति विशेष महत्त्व है। जिनके मंत्रों एवं क्रियाविधि में इतनी शक्ति मानी गयी है कि एक धातु अथवा पाषाण की प्रतिमा इन मंत्रों से मंत्रित होते ही पूजा-अर्चना और दर्शन के योग्य बनकर भक्तों को मनोवांछित फल की पूर्ति कराने लगती है। इस महोत्सव में सर्वप्रथम झण्डारोहण, घटयात्रा, मण्डप उद्घाटन, वेदी शुद्धि, मंगल कलश एवं अखण्ड दीप स्थापना, सकलीकरण, यागमण्डल विधान आदि अनेक क्रियाएँ कंकणबंधनपूर्वक सम्पन्न होंगी। डाक्टर जीवन प्रकाश जैन ने बताया कि प्रथम दिवस गर्भकल्याणक की क्रियाएँ सम्पन्न की जायेंगी। पुनः द्वितीय जन्मकल्याणक महोत्सव भारी धूमधाम के साथ मनाया जायेगा और नगर भ्रमण के साथ विशाल जुलूस एवं पाण्डुकशिला पर जन्माभिषेकपूर्वक भक्तजन पुण्य अर्जित करेंगे। तृतीय दिवस दीक्षाकल्याणक के दिन भगवान के वैराग्य का दृश्य प्रस्तुत होगा और केशलोंच आदि के साथ पिच्छी-कमण्डलु भेंट करके दीक्षाकल्याणक के संस्कार सम्पन्न होंगे। इस अवसर पर भगवान को मतिज्ञान, श्रुतज्ञान एवं अवधिज्ञान के साथ ही चतुर्थ मनःपर्ययज्ञान भी प्रगट हो जाता है और भक्तजन चार बाती का दीपक जलाकर पुण्यार्जन करते हैं। चतुर्थ दिवस केवलज्ञान कल्याणक का मनाया जायेगा, जिसमें भगवान को दिव्य ज्ञान की प्राप्ति होती है और समवसरण रचना में उनकी दिव्य प्रवचन सभा में वाणी खिरती है। पंचम दिवस मोक्षकल्याणक सम्पन्न होगा, जिसमें भगवान आठों कर्मों को नाश करके जन्म और मरण से मुक्ति प्राप्त कर लेते हैं और इस लोक के अग्रभाग पर ब्रह्म स्थान में उनकी आत्मा निराकार स्वरूप में अनंत सुख के साथ विलीन हो जाती है। इस प्रकार ये सारे दृश्य धार्मिक-संस्कारों एवं अनुष्ठानविधिपूर्वक महोत्सव के प्रतिष्ठाचार्यों द्वारा सम्पन्न कराये जाते हैं। इस महोत्सव में प्रतिष्ठाचार्य के रूप में वरिष्ठ विद्वानों में प्रतिष्ठाचार्य विजय कुमार जैन-हस्तिनापुर, पं. दीपक कुमार जैन-सांगली, पं. अकलंक जैन-लखनऊ तथा अनेक सहयोगी विद्वानों के द्वारा यह महान आयोजन पूर्ण पवित्रता के साथ सम्पन्न कराया जायेगा। पूजन करने वाले इन्द्र-इन्द्राणियों के लिए महोत्सव के मध्य ब्रह्मचर्यव्रत, चौबीस घंटे में एक समय शुद्ध अनाज का भोजन, चारों दिशाओं का बंधन, व्यापार आदि गृहबंधनों का त्याग, व्यसनों का पूर्ण त्याग आदि बाध्यताएं नियमपूर्वक मान्य रहेंगी। महोत्सव का झण्डारोहण 17 जून को शुभ मुहूर्त में प्रातः 7.30 बजे प्रमोद जैन अनीमा जैन-दिल्ली के द्वारा किया गया है। मुख्यरूप से दिनाँक 21 जून को विभिन्न मंदिर के गगनचुम्बी विशाल शिखरों पर स्वर्ण कलशारोहण एवं ध्वजारोहण का भी आयोजन सम्पन्न होगा। नवनिर्मित भगवान मुनिसुव्रतनाथ जिनमंदिर, 923 पुत्र जिनमंदिर, 101 भगवान जिनमंदिर, तीस चौबीसी जिनमंदिर के 7 शिखरों पर स्वर्ण ध्वज और कलश जिनधर्म की कीर्ति को दिग्दिगंत रखने वाली द्योतकरूप सिद्ध होंगे। इस महोत्सव में लगभग 2000 श्रद्धालुओं ठहरने और भोजन व्यवस्था का प्रबंध श्री दिगम्बर जैन अयोध्या तीर्थक्षेत्र कमेटी के द्वारा किया गया है। आवासीय व्यवस्था में लगभग 700 कमरे आरक्षित किये गये हैं। यात्रियों के आवागमन हेतु ई-रिक्शा का प्रबंध भी कमेटी के द्वारा रखा गया है। यहाँ विशाल पंडाल में 2000 इन्द्र-इन्द्राणियों के बैठने का प्रबंध किया गया है। सभी के लिए पूजन हेतु 4000 थाली, क्विंटलों अष्टद्रव्य सामग्री, फल-फूल का प्रबंध तथा इन्द्र-इन्द्राणियों के लिए विशेष पूजन के शुद्ध साड़ी-धोती-दुपट्टा आदि वस्त्रों का वितरण भी कमेटी के द्वारा रखा गया है। लगभग सभी व्यवस्थाएँ चाक-चौबंद की जा रही हैं, जिसमें कमेटी के पदाधिकारीगण अमरचंद जैन, शुभचंद जैन, डॉ. जीवन प्रकाश जैन, विजय जैन, आदीश जैन, अंकुर जैन, तेजकुमार जैन, नमन जैन, सुजाता शाह आदि के प्रयास पूर्ण सफलता की ओर हैं।

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