KGMU में 3 करोड़ की दवाओं का घोटाला:6 माह वाले इंजेक्शन कागजों में एक ही महीने में कई बार चढ़ाए, जांच को 5 सदस्यीय समिति गठित


KGMU यूरोलॉजी विभाग में असाध्य योजना के तहत कैंसर मरीजों को दी जाने वाली महंगी दवाओं और इंजेक्शनों में बड़े घोटाले की संभावना जताई जा रही है। प्रारंभिक जांच में पता चला है कि इंजेक्शनों को लगाने में नियमों की अनदेखी की गई। छह माह में एक बार लगाए जाने वाला इंजेक्शन कागजों पर एक ही माह में कई बार दर्शाया गया। इससे लाखों रुपये के फर्जी भुगतान की आशंका जताई जा रही है। KGMU प्रशासन ने संबंधित दवाओं और इंजेक्शनों के बिलों का भुगतान तत्काल प्रभाव से रोक दिया है। कुलपति के निर्देश पर पूरे मामले की जांच के लिए पांच सदस्यीय कमेटी गठित की गई है। कमेटी मरीजों के रिकॉर्ड, दवा वितरण रजिस्टर, इंजेक्शन की खपत और भुगतान संबंधी दस्तावेजों की जांच करेगी। असाध्य योजना में किया गया घपला
यूरोलॉजी विभाग में प्रोस्टेट, किडनी, पेशाब की थैली समेत दूसरे अंगों के कैंसर से पीड़ितों का इलाज होता है। गरीब कैंसर मरीजों को मुफ्त इलाज मुहैया कराने के लिए असाध्य योजना का संचालन किया जा रहा है। यूरोलॉजी विभाग में असाध्य योजना में पंजीकृत कैंसर मरीजों के नाम पर महंगी दवाओं की फर्जी खपत दिखाकर सरकारी धन के दुरुपयोग की आशंका है। मामला सामने आने के बाद KGMU प्रशासन में हड़कंप मच गया। आरोप हैं कि यूरोलॉजी विभाग में नियमों को ताक पर रखकर कैंसर, आयरन व प्रोटीन की दवाएं मरीजों को लगाई गईं। इसमें दवा की डोज से लेकर समय के अंतर को भी नजरअंदाज किया गया। घपलेबाजी के चलते अचानक इन दवाओं की मांग में तेजी से इजाफा होने लगा। पांच माह में दवाओं की खपत चार गुना बढ़ी
अक्टूबर-नवम्बर 2025 में विभाग में जहां 10 लाख रुपये माह की दवाओं की खपत थी। वहीं, फरवरी 2026 में करीब 40 लाख रुपये की दवाएं खप गईं। मार्च में यह बजट बढ़कर 45 लाख रुपये से ज्यादा के आंकड़े को पार कर गया। महंगी दवाओं के तेजी से बढ़ते बजट पर अफसरों को शक हुआ। उन्होंने बिल और डॉक्टरों के प्रिसक्रिप्सन ऑडिट शुरू किया। जिसमें ढेरों खामिया पकड़ में आई। मरीजों को तय समय के हिसाब से दवाएं नहीं लगाई गई। तीन करोड़ रुपये की दवाओं की घपलेबाजी हालात यह है कि कुछ मरीज को कागजों पर आयरन व प्रोटीन के इंजेक्शन माह भर में चार से पांच लगा दिए गए। जबकि एक इंजेक्शन छह माह में एक बार लगाया जा सकता है। प्रत्येक इंजेक्शन की कीमत आठ से 10 हजार रुपये है। कैंसर के भर्ती कर दवा लगाने का नियम है। इस नियम का भी उल्लंघन किया गया। अधिकारियों ने तीन करोड़ रुपये की दवाओं की घपलेबाजी की आशंका जाहिर की है। फिलहाल कुलपति के निर्देश पर मामले की जांच शुरू कर दी गई है। संविदा कर्मचारी के भरोसे करोड़ की दवाएं यूरोलॉजी विभाग में नियमों को ताक पर रखकर अफसरों ने चेहते संविदा कर्मचारी को असाध्य योजना की दवाओं की जिम्मेदारी सौंपी। दवाओं का आर्डर देने से लेकर उसे रिसीव तक करने की जिम्मेदारी संविदा कर्मचारी को दी थी। जबकि संस्थान प्रशासन ने नियमित नर्सिंग ऑफिसर को दवाओं का आर्डर देने के लिए अधिकृत किया है। एचआरएफ से आने वाली दवा रिसीव करने की जिम्मेदारी दूसरे नर्सिंग ऑफिसर को देने का आदेश जारी कर रखा है। KGMU के ज्यादातर विभाग में यही व्यवस्था लागू है। लेकिन यूरोलॉजी विभाग में नियमों की अनदेखी की गई है। नतीजतन महंगी दवाओं को खपाने में बड़ा गड़बड़झाला सामने आ रहा है।

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