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अयोध्या जिले के किसानों के लिए कृषि विभाग ने बड़ी पहल की है। किसानों को अब 50 प्रतिशत अनुदान पर ढैंचा बीज उपलब्ध कराया जाएगा। योजना के तहत ढैंचा बीज सिर्फ 155 रुपये प्रति किलो की दर से मिलेगा। बीज का वितरण लॉटरी प्रणाली के जरिए किया जाएगा, जिसकी पहली लॉटरी 10 मई को निकाली जाएगी। उप कृषि निदेशक डॉ. पी.के. कनौजिया ने बताया कि जिले के सभी विकास खंडों के लिए कुल 462 क्विंटल ढैंचा बीज की व्यवस्था की गई है। अप्रैल माह से ही किसान ऑनलाइन आवेदन कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि 10 मई को लॉटरी निकालकर चयनित किसानों को अनुदान पर बीज दिया जाएगा। यदि पहली प्रक्रिया के बाद भी बीज शेष रहता है, तो उसका वितरण भी लॉटरी के माध्यम से किया जाएगा। धान की खेती के लिए फायदेमंद है ढैंचा
कृषि वैज्ञानिक रवि प्रकाश मौर्य के अनुसार, ढैंचा की बुवाई का यह सबसे उपयुक्त समय है। धान की रोपाई से पहले इसे हरी खाद के रूप में उगाने से मिट्टी में नाइट्रोजन की मात्रा बढ़ती है और जमीन की उर्वरता सुधरती है। उन्होंने बताया कि ढैंचा के प्रयोग से फसल उत्पादन में 15 से 20 प्रतिशत तक बढ़ोतरी हो सकती है। किसानों को प्रति एकड़ 18 से 20 किलो बीज का उपयोग करना चाहिए। कम लागत में बेहतर खेती का विकल्प
विशेषज्ञों के मुताबिक, ढैंचा की खेती में ज्यादा जुताई या अतिरिक्त खाद की जरूरत नहीं होती। यह फसल खुद ही मिट्टी में पोषक तत्व बढ़ाने का काम करती है। बेहतर परिणाम के लिए किसान सीमित मात्रा में सुपर फॉस्फेट का इस्तेमाल कर सकते हैं। मिट्टी की सेहत सुधारने में मददगार
रासायनिक खादों के अत्यधिक प्रयोग से खराब हो रही मिट्टी की सेहत के बीच ढैंचा किसानों के लिए किफायती और असरदार विकल्प बनकर उभरा है। कम लागत और कम मेहनत में तैयार होने वाली यह फसल न केवल पैदावार बढ़ाने में मदद करती है, बल्कि भूमि की गुणवत्ता सुधारने में भी अहम भूमिका निभा रही है। एक से सवा महीने में 3 फीट तक लंबा होता है ढैंचा जब खेत खाली होता है तो तब इसे सामान्य तरीके से बो दिया जाता है। एक से सवा महीने में ही यह 3 फीट तक लंबा हो जाता है। ढैंचा के पौधे की जड़ में गांठ होती है। यह हरी खाद के रूप में अगली फसल को मदद करता है। दूसरा, इसकी जड़ की गांठें नाइट्रोजन सोखकर रखती हैं। फसल बुआई का समय आने पर ढैंचा को बखरकर खेत में ही फैला दिया जाता है। यह हरी खाद के रूप में काम आती है। चार तरह से ऐसे बचता है पैसा ऐसे तैयार होती है ढैंचा की हरी खाद हरी खाद ढैंचा की बुवाई खरीफ से पहले गर्मी के मौसम में की जाती है। खेत में लगाने के बाद इसे तब तक लगे रहने देना चाहिए, जब तक कि इसमें फूल न निकलने लगे। फूल निकलने के बाद इस हरी घास को खेत में ही पलट देना चाहिए। कुछ समय बाद यह हरी खाद में बदल जाता है। जड़ों में इकट्ठा हो जाता है नाइट्रोजन इस पौधे की जड़ों में नाइट्रोजन फिक्सिंग बैक्टीरिया रहता है। ढैंचा का पोधा पर्यावरण से नाइट्रोजन अवशोषित कर अपनी जड़ों तक पहुंचा देता है। 45 से 50 दिन के बाद जैसे ही इसके पौधे में फूल आने लगते हैं इसे काटकर वहीं छोड़ दिया जाता है। इसकी जड़ों में जमा नाइट्रोजन नमी और पानी से मिट्टी में अवशोषित हो जाती है।
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अयोध्या में 50% अनुदान पर ढैंचा बीज मिलेगा:हरी खाद से बढ़ेगी पैदावार और सुधरेगी मिट्टी की सेहत, 462 क्विंटल बीज बांटे जाएंगे