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बदलते दौर के साथ दोस्ती के मायने भी बदल गए हैं। अब दोस्तों के साथ समय बिताने से स्ट्रेस कम नहीं होते बल्कि उनकी वजह से बढ़ जा हैं। यह समस्या ज्यादातर Gen Z की दोस्तियों में देखा जा रहा है। ऐसा कहना है गोरखपुर जिला अस्पताल के साइकेट्रिस्ट डॉ. संजीव का। आज इंटरनेशनल फ्रेंडशिप डे के मौके पर उन्होंने बताया कि आजकल OPD में ऐसे भी पेशेंट आ रहे हैं, जो किसी तरह के मानसिक रोग या सामाजिक दबाव के वजह से नहीं बल्कि अपने दोस्तों के व्यवहार की वजह से अत्यधिक तनाव से ग्रसित रहते हैं। अपने खास दोस्त को किसी और से बातचीत करने से जेलस हो जाते हैं या उनकी छोटी- छोटी बात पर ओवर थिंकिंग करते हैं और कई बार डिप्रेशन में चले जाते। केस-1. सहेली ने किसी और से बढ़ाई बातचीत तो बेहोश होने लगी छात्रा उन्होंने बताया कि 13 साल की एक लड़की की उसी के क्लास की दूसरी लड़की से बहुत पुरानी दोस्ती थी। सब कुछ अच्छा चल रहा था। उसकी क्लास में एक नया लड़का आया और उसकी सहेली से ज्यादा बातचीत करने लगा। फिर लड़की को लगने लगा मेरी दोस्त उसको ज्यादा पसंद कर रही है और मेरे से दूर जा रही। इस बात को लेकर वह बार- बार परेशान होती थी। अपने दोस्त से लड़ती फिर ठीक हो जाती थी। एक टाइम ऐसा आया कि वह सहेली का अटेंशन पाने के लिए नए- नए तरीके अपनाने लगी थी। कई बार जानबुझकर बेहोश हो जाती थी। नए लोग से बातचीत बढ़ता देख हमेशा दुःखी रहने लगी थी और ओवर थिंकिंग करती थी। इतना ही नहीं पढ़ाई- लिखाई भी उससे ठीक से नहीं हो पाता था। परेशानी हद से ज्यादा बढ़ने पर हॉस्पिटल आई। जिसके बाद उसकी काउन्सिलिंग की गई। धीरे- धीरे उसे चीजों को हैंडल करना सिखाया गया। कुछ दवाईयां भी दी गई। अब उसकी सहेली के साथ पहले जैसे रिश्ते हो गए हैं। करीब डेढ़ साल से उसका इलाज चल रहा। केस-2. हमेशा सोचती की दोस्त कर रहे मेरी बुराई
इसी तरह एक और मामला देखने को मिला। यह एक कॉलेज गोइंग लड़की है। वह बीसीए (BCA) का कोर्स कर रही है। उसके बैच में खास सहेलियों की एक अच्छी ग्रूप थी। लड़की को OCD की प्रॉब्लम थी। उसके साफ-सफाई से उसके दोस्त थोड़े बहुत कभी- कभी परेशान हो जाते थे। इसी वजह से उसे लगने लगा ये लोग मुझे पसंद नहीं करते हैं। जब कोई उसके अब्सेंस में कुछ बात करता था, उसे लगता था कि मेरी ही बुराई चल रही है। यह खुद के बारे में नेगेटिव हो गई। उसे लगने लगा कि वह दोस्तों में फिट नहीं बैठती है। इस बात को सोचकर इतना परेशान हुई कि सुबह की बैच बदलकर दोपहर वाली ले ली । ताकि उन सहेलियों से मुलाकात ही न हो। उसके बाद भी ओवर थिंकिंग कम नहीं हुई। जब इलाज के लिए हॉस्पिटल पहुंची तो पूरी बात बताई। उसके बाद धीरे- धीरे उसकी बातों को समझा गया। उससे उभरने के कई तरीके बताए गए। बकायदा ट्रीटमेंट और काउंसलिंग भी हुई। करीब 2.5 साल उसका इलाज चल रहा है। अभी स्थित बहुत सही है। नए बैच की लड़कियों से दोस्ती बढ़ रही है। उसमें घुलना मिलना शुरू दी है। घर के किसी बड़े से सलाह लेना चाहिए- डॉ. संजीव डॉ. संजीव ने बताया कि यह समस्या ज्यादातर स्कूल या जल्द ही कॉलेज शुरू करने वाले बच्चों में देखा जाता है। जो बच्चे ज्यादा सेंसिटिव होते हैं। उन्हें दोस्तों के हर बात से फर्क पड़ने लगता है। और जब अपनी बात सामने वाले को समझा नहीं पाते हैं, तब तनाव में जाने लगते हैं। ऐसे में उन्हें घर के किसी बड़े से सलाह लेना चाहिए। पूरी बात खुलकर बताना चाहिए। साथ ही अपने आप को किसी और एक्टिविटी में व्यस्त कर लेना चाहिए। या फिर साइकेट्रिस्ट से सलाह लेना चाहिए। हेल्पलाइन नंबर पर करें कॉल
उन्होंने बताया कि किसी तरह की समस्या या प्रेशर महसूस होने पर भारत सरकार के ‘डेली मानस’ नंबर 14416 पर 24 घंटे, सातो दिन कॉल करके काउंसलिंग कर सकते हैं। इसके अलावा हॉस्पिटल में आकर साइकेट्रिस्ट से परामर्श ले सकते हैं। मनकक्ष के 9336929266 नंबर पर भी फोन करके परेशानी दूर कर सकते हैं।
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स्ट्रेसफुल हैं GEN-Z की दोस्तियां:डिप्रेशन में जा रहे स्कूल- कॉलेज गोइंग बच्चे, गोरखपुर में साइकेट्रिस्ट से लेना पड़ रहा काउंसलिंग