सार्वजनिक भूमि पर नमाज नहीं, इलाहाबाद हाईकोर्ट का आदेश:संभल मामले में कोर्ट बोला- सभी का अधिकार, एक पक्ष उपयोग नहीं कर सकता


इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने सार्वजनिक भूमि पर नमाज अदा करने को लेकर एक महत्वपूर्ण आदेश जारी किया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि सार्वजनिक भूमि का उपयोग किसी एक धर्म विशेष के लिए नहीं किया जा सकता। यह आदेश 6 अप्रैल 2026 को रिट याचिका संख्या 10803/2026 (असीन बनाम उत्तर प्रदेश सरकार) में पारित किया गया। याचिकाकर्ता ने संभल की तहसील गुन्नौर के थाना कैलादेवी क्षेत्र के गांव इकौना में आबादी भूमि पर बैनामे के आधार पर नमाज पढ़ने की अनुमति मांगी थी। न्यायालय ने अपने निर्देश में कहा कि सार्वजनिक भूमि का उपयोग किसी एक पक्ष द्वारा नमाज अदा करने के लिए नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि कोई पक्ष परंपरा से हटकर कोई कार्य करता है, तो कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए राज्य सरकार को हस्तक्षेप करने का पूरा अधिकार है। इसके अतिरिक्त, न्यायालय ने यह भी निर्देशित किया कि किसी भी पक्ष की धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार अन्य पक्षों की स्वतंत्रता पर भी निर्भर करता है। उच्च न्यायालय ने यह भी निर्देश दिया कि यदि किसी व्यक्ति द्वारा गलत तरीके से सार्वजनिक भूमि का हस्तांतरण किया जाता है और भीड़ एकत्र कर नमाज पढ़ने की मांग की जाती है, तो ऐसा हस्तांतरण या बैनामा अवैध माना जाएगा। न्यायालय ने तर्क दिया कि सार्वजनिक भूमि पर सभी व्यक्तियों का समान अधिकार होता है। इन्हीं आधारों पर उच्च न्यायालय ने याचिका को निरस्त कर दिया। न्यायमूर्ति गरिमा प्रसाद और न्यायमूर्ति सरल श्रीवास्तव की डबल बेंच ने न्यायमूर्ति श्रीधरन के एक पूर्व निर्णय को भी पूरी तरह पलट दिया। कोर्ट ने कहा कि वह पूर्व निर्णय कानून व्यवस्था और सार्वजनिक व्यवस्था की दृष्टि से सही नहीं था। उस निर्णय में संभल के डीएम डॉ. राजेंद्र पैंसिया और एसपी कृष्ण विश्नोई पर तबादला लेने या नौकरी छोड़ने की टिप्पणी की गई थी।

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