![]()
लखनऊ के राज्य संग्रहालय में संस्कृति विभाग की ओर से ‘डॉ. वासुदेव शरण अग्रवाल स्मृति व्याख्यानमाला’ का आयोजन किया गया। मौका था सूरदास कृत ‘नल-दमन’ के भावानुवाद पर विशेष व्याख्यान का। मुख्य वक्ता पद्मश्री विद्या बिंदु सिंह ने ‘नल-दमन’ को प्रेम, त्याग, संघर्ष और मानवीय संवेदनाओं की अनुपम कथा बताया। उन्होंने कहा कि प्रो. वासुदेव शरण अग्रवाल और दौलतराम जुयाल द्वारा संपादित यह ग्रंथ मध्यकालीन हिंदी साहित्य की समृद्ध परंपरा का प्रतिनिधित्व करता है। विद्या बिंदु सिंह ने बताया कि प्रो. अग्रवाल केवल पुरातत्ववेत्ता ही नहीं, बल्कि भारतीय साहित्य और लोक परंपराओं के गंभीर अध्येता भी थे। काव्यगत विशेषताओं का विश्लेषण किया उन्होंने बताया कि प्रो. अग्रवाल ने मूल काव्य की आत्मा को अक्षुण्ण रखते हुए उसके भावानुवाद को समकालीन पाठकों के लिए सहज और सुलभ बनाया। साथ ही ‘नल-दमन’ की भाषा, भाव-संरचना और काव्यगत विशेषताओं का भी विश्लेषण किया। इस अवसर पर उन्होंने राज्य संग्रहालय को ‘नल-दमन’ की एक दुर्लभ पांडुलिपि भी भेंट की। संग्रहालय के निदेशक डॉ. विनय कुमार सिंह ने स्वागत भाषण में प्रो. अग्रवाल के बहुआयामी व्यक्तित्व और भारतीय संस्कृति में उनके महत्वपूर्ण योगदान पर प्रकाश डाला। कार्यक्रम का संचालन सहायक निदेशक (सज्जा कला) डॉ. मीनाक्षी खेमका ने किया। व्याख्यान में बड़ी संख्या में शोधार्थी, विद्यार्थी और साहित्य प्रेमी शामिल हुए। कार्यक्रम के अंत में सभी प्रतिभागियों को संग्रहालय का भ्रमण भी कराया गया।
Source link
लखनऊ में डॉ. वासुदेव शरण अग्रवाल स्मृति व्याख्यान:पद्मश्री डॉ. विद्याबिंदु बोली – नल-दमन मध्यकालीन हिंदी साहित्य की समृद्ध परंपरा का प्रतीक