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लखनऊ के बलरामपुर गार्डन में चल रहा 23वां राष्ट्रीय पुस्तक मेला रविवार को संपन्न हो गया। मेले में इस बार किताबों की बिक्री एक करोड़ रुपये के आंकड़े को पार कर गई। पहली अक्टूबर से चल रहे मेले में अंतिम दिन भी पुस्तक प्रेमियों की भीड़ उमड़ी। लोगों ने किताबों की खरीदारी की और साहित्यिक आयोजनों में हिस्सा लिया। मेले में प्रभात, वाणी, नवपल्लव, फ्लाईड्रीम्स, राजपाल, राजकमल, सस्ता साहित्य मंडल और ज्ञानपीठ समेत देश के 56 से अधिक प्रकाशकों और वितरकों ने हिस्सा लिया। समापन समारोह में संयोजक मनोज सिंह चंदेल और आकर्ष चंदेल ने स्टॉल संचालकों और सहयोगियों को स्मृतिचिह्न देकर सम्मानित किया। डिजिटल युग में भी किताबों के प्रति लोगों का लगाव मनोज सिंह चंदेल ने कहा कि इस बार पिछले वर्षों की तुलना में अधिक भीड़ रही। युवाओं की भागीदारी भी ज्यादा रही। इससे पता चलता है कि डिजिटल युग में भी किताबों के प्रति लोगों का लगाव बना हुआ है। स्टॉल संचालक अशोक शुक्ल ने कहा कि गोमती बुक फेयर के महज 10 दिन बाद यह मेला आयोजित हुआ। दोनों मेलों के बीच तीन महीने का अंतर होता तो बेहतर रहता। वहीं, बुलंदशहर से दूसरी बार मेले में आए पुस्तक प्रेमी रजत विवेक ने कहा कि ऐसे आयोजन नई पीढ़ी को पढ़ने की संस्कृति से जोड़ते हैं। कविताओं और साहित्यिक आयोजनों ने बांधा समां मेले के मुख्य मंच पर नवसृजन का सम्मान समारोह हुआ। इसके बाद लघुकथा सम्मेलन में श्रोताओं ने छोटी-छोटी कहानियों का आनंद लिया। मंजूषा परिषद की ओर से डॉ. डीएस शुक्ल को सरला शुक्ला स्मृति सम्मान दिया गया। कार्यक्रम में डॉ. अमिता दुबे की पुस्तक का विमोचन पद्मश्री विद्याविंदु सिंह, डॉ. कैलाशदेवी सिंह, डॉ. मंजू शुक्ला और अपूर्वा अवस्थी की मौजूदगी में हुआ। शाम को कविताओं की प्रस्तुतियां हुईं। दूसरे मंच पर अपराजिता का काव्य समारोह आयोजित किया गया। संस्कृति पर पत्रकार नवेद शिकोह, रजनीश राज, खुर्रम निजामी, शबाहत हुसैन, शिल्पा और राजवीर के बीच चर्चा हुई।
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लखनऊ पुस्तक मेले के अंतिम दिन पुस्तक प्रेमियों की भीड़:23वां राष्ट्रीय पुस्तक मेला संपन्न, सहयोगियों को स्मृतिचिह्न देकर सम्मानित किया