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लखनऊ में ई-रिक्शा जाम की बड़ी वजह बन गए हैं। हाईकोर्ट ने इनके खरीद-बिक्री और संचालन के लिए नियम बनाने का आदेश दिया है। इसके बाद दैनिक भास्कर ने शहर के प्रमुख चौराहों की पड़ताल की। आदेश के 4 दिन बाद भी हालात नहीं बदले। ई-रिक्शा चालक बीच सड़क और चौराहों पर सवारी बैठाते मिले। इनके लिए स्थायी पार्किंग की व्यवस्था भी नहीं है। निर्धारित रूट के बजाय ई-रिक्शा मनमाने तरीके से शहर में दौड़ रहे हैं। इस रिपोर्ट में पढ़िए व्यस्ततम चौराहों के हाल… 1. चौक के चरक चौराहे पर सबसे ज्यादा समस्या लखनऊ के चौक का चरक चौराहा जो शहर का सबसे व्यस्त है, यहां ई-रिक्शा सबसे बड़ी समस्या है। बीच चौराहे पर खड़े होकर सवारी बैठाते हैं, जिसके चलते हर समय जाम की स्थिति बनी रहती है। वहीं पास में ट्रामा सेंटर हैं, जहां दिनभर शहर और शहर के बाहर के गंभीर मरीज आते हैं, जो कई बार इन ई-रिक्शा की वजह से लगे जाम में फंस जाते हैं। सवारी बैठाने के चक्कर में ई-रिक्शा चालक सिर्फ बाइक का रास्ता छोड़ते हैं। 2. पारा का बुद्धेश्वर चौराहे पर बीच सड़क खड़े होते हैं यही हालात कुछ पारा के बुद्धेश्वर चौराहे पर देखने को मिला। गलत तरीके से चौराहे पर ई-रिक्शा खड़ा करके सवारी भरते हैं। इसके चलते रोजाना जाम की समस्या बनी रहती है। कई बार वहां मौजूद ट्रैफिक और पुलिसकर्मी भी इस समस्या को नजरअंदाज कर देते हैं। इसके चलते कई बार पैसा लेकर चौराहे पर गाड़ी खड़ी करवाने का आरोप भी लग चुका है। 3. पॉलिटेक्निक पर चलाया चेकिंग अभियान पड़ताल के दौरान दैनिक भास्कर की टीम पॉलिटेक्निक चौराहे पर पहुंची। यहां उस समय व्यवस्था कुछ बेहतर दिखी। चौराहे पर ई-रिक्शा की चेकिंग की जा रही थी और उनके परमिट व तय रूट भी देखे जा रहे थे। हालांकि, यहां डग्गामार वाहन भी ट्रैफिक के लिए बड़ी समस्या बने हैं। रोजाना लखनऊ से गोरखपुर जाने वाली 150 से ज्यादा गाड़ियां सड़क किनारे खड़ी होकर सवारी भरती हैं। कार्रवाई से बचने के लिए कई बार ई-रिक्शा चालक बीच सड़क से यात्रियों को इन गाड़ियों तक पहुंचाते हैं। इससे चौराहे पर ट्रैफिक व्यवस्था बिगड़ जाती है। अब पढ़िए कुछ पुराने नियम- कलर कोडिंग का कोई असर नहीं हुआ लखनऊ में 2024 में पुलिस ने शहर को 16 जोन में बांटा और ई-रिक्शा को तय रास्तों तक ही सीमित रखने के लिए कलर-कोडेड सिस्टम शुरू किया। लगभग 26,890 एप्लीकेशन मिलीं, जिनमें से 23,761 को योग्य पाया गया और लॉटरी के जरिए जोन बांटे गए। ड्राइवरों से जोन नंबर, इलाके का नाम और बारकोड या QR कोड वाले स्टिकर दिखाने के लिए कहा गया था, पुलिस ने चेतावनी दी कि नियम तोड़ने पर चालान या सीज हो सकता है। इस सिस्टम से भी बहुत कम फर्क पड़ा है। ई-रिक्शा शहर भर में यात्रियों को ले जाते रहे और इस दौरान चेक की गई गाड़ियों पर कलर कोडेड स्टिकर नहीं मिले। 2024 में लखनऊ म्यूनिसिपल कॉर्पोरेशन (LMC) ने भी सड़क किनारे पार्किंग और जाम को रोकने के लिए ऑटो और ई-रिक्शा के लिए 45 खास स्टैंड बनाने का प्रस्ताव रखा था। यह पहल कामयाब नहीं हो पाई, क्योंकि ड्राइवर सड़क किनारे की जगहों और व्यस्त चौराहों पर ही निर्भर रहे। प्रशासन और पुलिस ने 2025 में फिर से जोन-बेस्ड कलर कोडिंग की ओर कदम बढ़ाया, लेकिन नए प्लान को लागू करने पर भी सवाल उठ रहे हैं। पुराने ई-रिक्शा सरेंडर करने के बाद नया मिले ई-रिक्शा चालक कल्याण समिति एसोसिएशन के प्रेसिडेंट मयंक श्रीवास्तव ने लखनऊ में नए ई-रिक्शा रजिस्ट्रेशन पर पूरी तरह रोक लगाने की मांग की है। उन्होंने शहर के बाहर के आई या पते का इस्तेमाल करके रजिस्टर्ड लोगों की भी जांच करने की मांग की और सुझाव दिया कि पुरानी गाड़ी सरेंडर करने के बाद ही नए रजिस्ट्रेशन की इजाजत दी जाए। लखनऊ ऑटोरिक्शा थ्री व्हीलर संघ (LARTS) के प्रेसिडेंट पंकज दीक्षित ने ई-रिक्शा और ई-ऑटो के लिए एक जरूरी परमिट सिस्टम की मांग की है, क्योंकि ऐसे सिस्टम की कमी से बिना निगरानी के ग्रोथ, सड़क पर कब्जा और जाम की समस्या बढ़ रही है। टेम्पो-टैक्सी और ऑटो-रिक्शा जॉइंट फ्रंट ने अलग से डिविजनल कमिश्नर से 2026 में लखनऊ में नए ई-रिक्शा और ई-ऑटो रजिस्ट्रेशन पर रोक लगाने की मांग की है। सरकार सोई नहीं रह सकती : हाईकोर्ट शहर में ई रिक्तों की बढ़ती संख्या यातायात व्यवस्था पर दबाव डाल रही है. इसलिए सरकार हाथ पर हाथ रखकर नहीं बैठ सकती। राज्य सरकार इस गंभीर मुद्दे पर सोई नहीं रह सकती। उसे सही नीति बनाकर समस्या से प्रभावी ढंग से निपटना होगा। पर्याप्त पार्किंग न होने से चौराहों और प्रमुख सड़कों पर ट्रैफिक बाधित होता है। सरकार को ई-रिक्शा की बिक्री और संचालन नियंत्रित करने की योजना बतानी होगी। ट्रैफिक हम देख रहे, ई-रिक्शा की संख्या सरकार देखे : ट्रैफिक पुलिस डीसीपी ट्रैफिक रवीना त्यागी ने बताया कि पुलिस के स्तर से ई-रिक्शा के सुव्यवस्थित संचालन, निर्धारित मार्गों, पार्किंग/स्टैंड व्यवस्था और ट्रैफिक में आ रही बाधाओं कम करने से जुड़े व्यावहारिक पहलुओं पर संबंधित विभागों के साथ तालमेल किया जा रहा है। डीसीपी ट्रैफिक रवीना त्यागी ने कहा- ई-रिक्शा की बिक्री, पंजीकरण या उनकी कुल संख्या को नियंत्रित करने जैसे विषय नीतिगत हैं। इन मुद्दों पर शासन और संबंधित विभागों के स्तर से निर्णय लेना होगा।
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लखनऊ की सड़कों पर हाईकोर्ट का आदेश बेअसर:बीच चौराहों पर ई-रिक्शा लगाकर बैठा रहे सवारी, 2 साल के सभी नियम ठंडे बस्ते में