राजनैतिक तनाव के बीच अमेरिका में वर्ल्ड कप:युद्ध के साये में ईरान; 40 घंटे बस में सफर कर पहुंचे, सपोर्ट स्टाफ को वीसा नहीं


28 फरवरी को जब ईरान पर अमेरिका ने बमबारी की, तो एक पल के लिए लगा कि शायद ईरानी फुटबॉल टीम इस बार वर्ल्ड कप में नहीं खेल पाएगी। लेकिन तमाम मुश्किलों और अनिश्चितताओं को पार करते हुए, टीम तुर्की के अंताल्या से होकर मैक्सिको के तिजुआना पहुंच गई है। युद्ध की वजह से इस टीम को तेहरान से तुर्किए बॉर्डर तक 40 घंटे का लंबा बस का सफर तय करना पड़ा था। हालात इतने मुश्किल थे कि 6 फुट 5 इंच लंबे गोलकीपर अलीरेजा बेइरानवांड को अपने पैर फैलाने के लिए बस की फर्श पर सोकर सफर करना पड़ा था। इस सफर में बड़ी अड़चन अमेरिकी वीसा की भी रही। ग्रुप जी में ईरान को अपने अहम मैच लॉस एंजिलिस और सिएटल में खेलने हैं। खिलाड़ियों और मुख्य कोच आमिर घलेनोई को तो वीसा मिल गया, लेकिन अमेरिकी प्रशासन ने ‘आतंकवादियों की घुसपैठ’ का हवाला देते हुए टीम के 13 सपोर्ट स्टाफ, विश्लेषकों और मीडिया अधिकारियों को वीसा देने से इनकार कर दिया। आखिरकार फीफा को बीच-बचाव करने के लिए आना पड़ा। अमेरिका ने शर्त रखी है कि ईरानी खिलाड़ियों को मैच के दिन ही अमेरिका में एंट्री मिलेगी और उसी दिन लौटना भी होगा। इन सबके बीच टीम का हौसला नहीं टूटा है। अपना चौथा वर्ल्ड कप खेलने जा रहे 32 वर्षीय स्टार खिलाड़ी अलिरेजा जहानबख्श का कहना है, ‘हालात बिल्कुल आसान नहीं हैं, लेकिन हमारा मकसद टीम को एकजुट रखना है। एक ईरानी होने के नाते हमारी सबसे बड़ी प्रेरणा अपने देशवासियों और माता-पिता के चेहरों पर मुस्कान लाना है।’ टीम ने तुर्की के लग्जरी होटल में एक साथ फिल्में देखकर (खासकर 2007 के युद्धग्रस्त इराक की एशियन कप जीत की डॉक्यूमेंट्री) अपनी बॉन्डिंग मजबूत की है। युद्ध का असर टीम चयन पर भी पड़ा है। दिग्गज खिलाड़ी सरदार अजमौन को टीम से बाहर कर दिया गया है, क्योंकि युद्ध शुरू होने के बाद उनकी एक तस्वीर यूएई के शासक के साथ सामने आई थी, जिससे ईरानी प्रशासन नाराज था। खिलाड़ियों ने तय किया है कि वे वर्ल्ड कप मैचों से पहले अपना दायां हाथ सीने पर बैज के ऊपर रखकर देश के हालातों के प्रति अपना सम्मान जताएंगे। अब यह देखना बेहद दिलचस्प होगा कि अगर नॉकआउट दौर में ईरान और अमेरिका भिड़ते हैं, तो क्या फुटबॉल इस युद्ध के बीच शांति का कोई नया रास्ता खोल पाएगा। ईरान में प्रैक्टिस के लिए ऑफिशियल गेंदें तक नहीं थीं युद्ध और प्रतिबंधों का असर खेल के सबसे अहम हिस्से फुटबॉल पर भी पड़ा। तेहरान में ट्रेनिंग के दौरान ईरानी टीम के पास अभ्यास करने के लिए इस वर्ल्ड कप की आधिकारिक गेंदें ही मौजूद नहीं थीं, क्योंकि युद्ध के कारण इनकी डिलीवरी ईरान तक हो ही नहीं पाई थी। जब टीम तुर्की पहुंची, तब जाकर उन्हें आधिकारिक गेंदों के साथ वॉर्म-अप और प्रैक्टिस करने का मौका मिला।

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