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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मिर्जापुर जिले के कोतवाली देहात थाना क्षेत्र में वर्ष 1988 में हुए बहुचर्चित गोलीकांड मामले में निचली अदालत के फैसले को सही ठहराया।
न्यायमूर्ति सिद्धार्थ और न्यायमूर्ति विनय कुमार द्विवेदी की पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए जीवित बचे चार अभियुक्तों मलिक खान, इरशाद खान, रुस्तम खान और हासिम खान की अपील को खारिज कर दिया तथा उनकी सजा को बरकरार रखा है।
हाईकोर्ट ने जमानत पर बाहर चल रहे इन चारों अभियुक्तों की जमानत रद्द करते हुए उन्हें एक महीने के भीतर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट मिर्जापुर की अदालत में आत्मसमर्पण करने का आदेश दिया है। जानिये क्या है पूरा मामला मामला 24 अक्टूबर 1988 का है, जहां चितवनपुर गांव में आराजी नंबर 1387 खेत को जोतने को लेकर विवाद शुरू हुआ था। वादी फखरुद्दीन के अनुसार, जब उनके नाना जासिम खान खेत जोत रहे थे, तब बाबू खान ने उन्हें रोका। विवाद बढ़ने पर बंदूकें और तमंचे लेकर कई लोग मौके पर पहुंच गए और अंधाधुंध फायरिंग शुरू कर दी। इस घटना में बदरुद्दीन नामक व्यक्ति की गोली लगने से अस्पताल ले जाते समय मौत हो गई, जबकि जासिम, फखरुद्दीन समेत कुल 9 लोग गंभीर रूप से घायल हुए थे। मिर्जापुर की सत्र अदालत ने वर्ष 1993 में इस मामले में फैसला सुनाते हुए हासिम खान को हत्या (धारा 302) के तहत आजीवन कारावास और अन्य धाराओं में सजा दी थी, जबकि बाबू खान, मलिक खान, इरशाद खान, रुस्तम खान समेत अन्य अभियुक्तों को जानलेवा हमले (धारा 307) और बलवे के तहत दोषी ठहराया था। इस फैसले के खिलाफ अभियुक्तों ने हाईकोर्ट में अपील दाखिल की थी। चार आरोपियों की मौत हो चुकी अपील के लंबित रहने के दौरान बाबू खान, सईद खान, जाफरू खान और नजरू खान की मृत्यु हो गई, जिसके कारण उनके खिलाफ मामला समाप्त हो गया था। हाईकोर्ट ने बचे हुए चार दोषियों की याचिका पर सुनवाई करते हुए प्रत्यक्षदर्शियों के बयानों और मेडिकल साक्ष्यों को पर्याप्त माना और निचली अदालत के फैसले में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया। हाईकोर्ट ने स्पष्ट निर्देश दिया है कि यदि अभियुक्त तय सीमा में आत्मसमर्पण नहीं करते हैं, तो सीजेएम मिर्जापुर उनके खिलाफ गैर-जमानती वारंट जारी कर गिरफ्तारी सुनिश्चित करें।
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मिर्जापुर हत्याकांड में 4 दोषियों की सजा बरकरार:हाईकोर्ट ने सजा बरकरार रखी, चारों आरोपियों की जमानत रद्द