बिहार के पैसे से मालामाल हो रहे दक्षिण के राज्य?:बैंकों ने भेजे ₹2.44 लाख करोड़, ज्यादा से ज्यादा पैसा बिहारियों को क्यों देना चाह रही सरकार


23 जून को बिहार के बैंकों ने नया सीडी रेशियो (कर्ज-जमा अनुपात) जारी कर दिया। बिहार का सीडी रेशियो 60.21% हो गया है। मतलब साफ है कि बिहार में जमा राशि का 60% लोन ही बिहार के लोगों को दिया जा रहा है। बाकी के 40% रुपए को दक्षिण भारत के राज्यों में भेज दिया जा रहा है। बैंकों की इस रिपोर्ट पर सरकार भड़क गई और तुरंत ज्यादा से ज्यादा बिहारियों को कर्ज देने का आदेश दिया। सम्राट सरकार ज्यादा से ज्यादा बिहारियों को कर्ज क्यों देना चाह रही है, क्या बिहार के पैसे से साउथ के राज्य हो रहे मालामाल, समझेंगे, आज के एक्सप्लेनर बूझे की नाही में… सवाल-1ः बिहार सरकार बैंकों को बिहारियों को ज्यादा कर्ज देने की हिदायत क्यों दे रही? जवाबः 23 जून को राज्य स्तरीय बैंकर्स समिति की बैठक में डिप्टी CM और वित्त मंत्री बिजेंद्र प्रसाद यादव ने कहा- ‘बैंकों ने लोन देने के मामले में अपना परफॉर्मेंस 6 महीने के अंदर नहीं सुधारा तो उनकी शाखाओं से सरकार की जमा राशि वापस निकाल ली जाएगी। साथ ही उन्हें दी सुरक्षा भी विड्रॉ कर लिया जाएगा।’ उन्होंने बैंकों को चेतावनी दी कि जिनका सीडी रेशियो यानी कर्ज देने का अनुपात 50 प्रतिशत से कम होगा, उसमें सरकार अपना पैसा नहीं जमा करेगी। डिप्टी CM ने यह हिदायत तब दी जब बैठक में राज्य स्तरीय बैंकर्स समिति की रिपोर्ट पेश की गई। रिपोर्ट के मुताबिक, बिहार का सीडी रेशियो यानी कर्ज-जमा अनुपात 2025-26 में 60.21% है। इसका मतलब है कि बिहार के बैंकों में अगर 100 जमा हुए तो उसमें से केवल 60.21 रुपए ही लोन के रूप में स्थानीय लोगों या उद्योगों को दिए गए। मतलब 40 रुपए बैंकों ने बिहार के बाहर भेज दिए। अब इसे आंकड़ों से समझिए… 31 मार्च 2026 के अंत तक बिहार की बैंक शाखाओं में 6 लाख 15 हजार 428 करोड़ रुपये जमा थे। इसमें से लोन के तौर पर 3 लाख 70 हजार 563 करोड़ रुपए दिए गए। इनमें लगभग 17 हजार करोड़ रुपए वे भी शामिल हैं, जो या तो नाबार्ड की ओर से रूरल इन्फ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट फंड के तहत बिहार सरकार को दिए गए या दूसरे राज्यों के बैंकों ने बिहार में निवेश के लिए दिए। मतलब कि बैंकों ने बिहारियों के जमा किए पैसों में से 2 लाख 44 हजार 865 करोड़ रुपए दूसरे राज्यों में भेज दिए हैं। अगर बिहार का पैसा, बिहार में रहता तब 3 फायदे होते सवाल-2: …तो क्या UP-बिहार के पैसे से दक्षिण और गुजरात-महाराष्ट्र का विकास हो रहा है? जवाबः तकनीकी और वित्तीय रूप से, हां। बैंकिंग प्रणाली के काम करने के तरीके के आधार पर इसे समझा जा सकता है। फंड का ट्रांसफर: बैंकों के पास जो पैसा जमा होता है, वह एक केंद्रीय पूल में जाता है। चूंकि तमिलनाडु (126%), तेलंगाना (128%), और आंध्र प्रदेश (155%) का सीडी रेशियो 100% से कहीं अधिक है, इसका सीधा मतलब है कि इन राज्यों के बैंकों ने वहां जमा राशि से ज्यादा लोन बांट रखा है। और यह पैसा कम सीडी रेशियो वाले राज्यों UP-बिहार और झारखंड के हो सकते हैं। जिन राज्यों (जैसे बिहार) में जमा राशि ज्यादा है और लोन कम उठ रहा है, बैंक उस ‘अतिरिक्त पैसे’ को उन राज्यों में ट्रांसफर कर देते हैं जहां लोन की मांग बहुत ज्यादा है (जैसे दक्षिण भारत के औद्योगिक राज्य)। औद्योगिक राज्यों को फायदा: तमिलनाडु, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र और गुजरात जैसे राज्य अत्यधिक औद्योगिक हैं। वहां बड़े-बड़े कॉर्पोरेट, बुनियादी ढांचा परियोजनाएं और विनिर्माण इकाइयां हैं, जो हजारों करोड़ रुपये का लोन लेती हैं। परिणाम यह होता है कि बिहार के छोटे जमाकर्ताओं के पैसे से दक्षिण और पश्चिम भारत के बड़े उद्योगों को लोन मिलता है। इससे उन राज्यों का विकास तेजी से होता है और बिहार सिर्फ एक “डिपॉजिट सेंटर” बनकर रह जाता है। आर्थिक प्रभाव: इस व्यवस्था के कारण बिहार के जमाकर्ताओं के पैसे का इस्तेमाल दक्षिण भारत के राज्यों में उद्योगों, इंफ्रास्ट्रक्चर और व्यापार को लोन देने के लिए किया जाता है, जिससे वहां रोजगार और विकास को गति मिलती है। जन सुराज पार्टी के सूत्रधार प्रशांत किशोर ने विधानसभा चुनाव में इसे मुद्दा बनाया था। उन्होंने यही आरोप लगाया था कि राज्य के लोगों का पैसा राज्य के लोगों को रोजगार या दूसरे काम के लिए नहीं मिल पाता है, लेकिन उसी पैसे से दूसरे राज्य में लोन बांटा जाता है। इससे बिहार पिछड़ रहा है। बिहार में सीडी रेशियो बढ़ाया जाए रिटायर्ड बैंक अधिकारी राजीव कुमार दास कहते हैं, ‘बिहार में सीडी रेशियो बढ़ाया जाना चाहिए। परंतु इसके लिए यहां निवेश योग्य परियोजनाओं की संख्या और आकार भी बढ़नी चाहिए। बड़ी परियोजनाओं के लिए कॉरपोरेट स्तर पर फाइनेंसिंग की रणनीति तय होती है। दक्षिण भारत के राज्य इसी में बाजी मार ले जाते हैं। बैंकों को 3% कैश रिजर्व रेशियो और 18% एसएलआर के तौर पर रखना होता है। इन सबके बाद बची हुई राशि ट्रेजरी ऑक्शन के तौर पर एक बैंक दूसरे बैंक को देते हैं। इसके जरिए राशि पाने वाले बैंक अपनी मर्जी से फाइनेंस करते हैं।’ सवाल-3: बिहार के लोगों को बैंक लोन क्यों नहीं देते? जवाबः बैंकों के लोन नहीं देने के 3 बड़े कारण हैं… लोन डूबने का खतराः बैंकों का मानना है कि बिहार में लोन रिकवरी (ऋण वापसी) की दर खराब है। RBI और राज्य स्तरीय बैंकर्स समिति (SLBC) की रिपोर्टों के मुताबिक, बिहार में कृषि और MSME सेक्टर में NPA (नॉन परफॉर्मिंग एसेट) की दर 7.57% से 7.72% के बीच है। जो राष्ट्रीय औसत 2.15% से 2.8% से करीब 3 गुना अधिक है। इस कारण बैंक लोन देने से कतराते हैं। औद्योगिक पिछड़ेपन और बड़े उद्योगों की कमी: लोन की सबसे ज्यादा मांग बड़े उद्योगों और इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स से आती है। बिहार में बड़े उद्योगों की कमी के कारण ‘क्रेडिट अवशोषण क्षमता’ कम है। दस्तावेज और कोलेटरल (जमानत) की कमी: बिहार में एक बड़ी आबादी असंगठित क्षेत्र में काम करती है। बैंकों की ओर से मांगे जाने वाले दस्तावेज (जैसे आईटीआर, पक्का लैंड टाइटल) न होने के कारण लोन रिजेक्ट हो जाते हैं। ग्रामीण इलाकों में बहुत से लोगों का कोई क्रेडिट इतिहास नहीं होता, जिससे बैंक उन्हें लोन देने में कतराते हैं। जमीन के दस्तावेजों का विवाद: बिहार में लोन के बदले बंधक रखने के लिए जमीन के कागजात अक्सर स्पष्ट नहीं होते हैं। दाखिल-खारिज और म्यूटेशन की समस्याओं के कारण बैंक लोन रिजेक्ट कर देते हैं। जागरूकता का अभाव: आम लोगों में बैंकों की लोन प्रक्रियाओं और सरकारी योजनाओं (जैसे मुद्रा योजना, स्टैंड-अप इंडिया) की सही जानकारी और प्रोजेक्ट रिपोर्ट बनाने की समझ की कमी होती है। सवाल-4: सरकार कितना सीडी रेशियो बेहतर मानती है? जवाबः भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) और भारत सरकार के वित्तीय सेवा विभाग के मुताबिक, किसी भी राज्य या क्षेत्र के लिए 60% या उससे अधिक का सीडी रेशियो एक स्वस्थ या न्यूनतम स्वीकार्य स्तर माना जाता है। आदर्श स्थिति: आर्थिक विशेषज्ञों के अनुसार, आदर्श सीडी रेशियो 70% से 80% के बीच होना चाहिए। 60% से कम: यह दर्शाता है कि बैंक स्थानीय स्तर पर ऋण देने में रुचि नहीं ले रहे हैं या वहां आर्थिक गतिविधियां सुस्त हैं। डॉ. डी. सुभाष राव समिति ने सिफारिश की थी कि जिन राज्यों का सीडी रेशियो 60% से कम है, वहां बैंकों को विशेष जिला स्तरीय योजनाएं बनाकर लोन बढ़ाना चाहिए। 100% से अधिक: यह अत्यधिक आर्थिक गतिविधियों को दर्शाता है, लेकिन बैंकों के लिए यह जोखिम भरा भी हो सकता है क्योंकि वे अपनी जमा पूंजी से अधिक लोन दे रहे होते हैं (इसके लिए वे बाहरी फंड या आरबीआई से रीफाइनेंस पर निर्भर होते हैं)। सवाल-5: क्या विकास का पैमाना ज्यादा लोन लेना ही है? लोन राज्य के विकास को कैसे प्रभावित करते हैं? जवाबः केवल लोन लेना ही विकास का एकमात्र पैमाना नहीं है, लेकिन आधुनिक अर्थव्यवस्था में बिना लोन के तीव्र विकास असंभव है। लोन (क्रेडिट) को किसी भी अर्थव्यवस्था की “लाइफलाइन” कहा जाता है। यह राज्य के विकास को इस तरह प्रभावित करता है… पूंजी निर्माण: जब उद्योगों, स्टार्टअप्स और किसानों को लोन मिलता है, तो वे नई फैक्ट्रियां लगाते हैं, तकनीक खरीदते हैं और उत्पादन बढ़ाते हैं। इससे राज्य की GSDP बढ़ती है। रोजगार के अवसर: लोन के जरिए जब नए व्यवसाय शुरू होते हैं या पुराने व्यवसायों का विस्तार होता है, तो स्थानीय स्तर पर प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार पैदा होता है। क्रय शक्ति में वृद्धि: रिटेल लोन (जैसे होम लोन, कार लोन, पर्सनल लोन) से लोगों की खरीदारी करने की क्षमता बढ़ती है, जिससे बाजार में मांग पैदा होती है और अर्थव्यवस्था चक्र गतिशील रहता है। इन्फ्रास्ट्रक्चर का विकास: निजी और सार्वजनिक क्षेत्रों को मिलने वाले लोन से सड़कें, बिजली घर, और अस्पताल जैसे बुनियादी ढांचे तैयार होते हैं, जो दीर्घकालिक विकास की नींव रखते हैं।

Source link

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *