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सावन के अंतिम सोमवार को अयोध्या जिले में बाबा भोलेनाथ की भक्ति में श्रद्धालु सराबोर नजर आए। जिले के विभिन्न शिव मंदिरों और शिवालयों में भोर से ही भक्तों की भीड़ उमड़ने लगी। महर्षि बामदेव तपोस्थली, बवां, ज्यवनेश्वर महादेव, सिद्धनाथन शिव मंदिर, बाबा मौलेश्वर नाथ और रमपुरवा शिवाला सहित कई मंदिरों में सुबह करीब चार बजे से ही श्रद्धालुओं का पहुंचना शुरू हो गया था। भक्तों ने भगवान शिव का जलाभिषेक कर पूजा-अर्चना की। इस दौरान मंदिरों में ‘हर-हर महादेव’ और ‘बम-बम भोले’ के जयकारे गूंजते रहे। श्रद्धालुओं ने शिवलिंग पर दूध, बेलपत्र, भांग, धतूरा और गंगाजल अर्पित कर परिवार की सुख-समृद्धि की कामना की। मान्यता है कि सावन मास में भगवान शिव की पूजा-अर्चना करने से वर्षभर की पूजा का फल प्राप्त होता है। अंतिम सोमवार को पूजा-अर्चना करने वाली महिलाओं की संख्या भी काफी अधिक थी। महर्षि बामदेव तपोस्थली को लेकर कई धार्मिक और ऐतिहासिक मान्यताएं प्रचलित हैं। आश्रम के पुजारी राजू पंडित के अनुसार, यह माना जाता है कि अयोध्या के राजा दशरथ के छोटे पुत्र भरत का मुंडन संस्कार इसी तपोस्थली में हुआ था। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान श्रीराम की शिक्षा-दीक्षा भी इसी आश्रम में हुई थी। वेद-पुराण और श्रीरामचरितमानस में भी महर्षि बामदेव तपोस्थली का वर्णन मिलता है। आश्रम परिसर में आदिकाल से भगवान शंकर का शिवलिंग विद्यमान बताया जाता है। परिसर के आसपास मौजूद प्राचीन वट वृक्ष और खुदाई में मिली मूर्तियां व शिलालेख भी इस स्थल की प्राचीनता के प्रमाण माने जाते हैं। श्रद्धालु इन प्राचीन अवशेषों पर भी पूजा-अर्चना करते हैं। पुजारी राजू पंडित ने बताया कि पड़ोसी जिलों के साथ-साथ अन्य प्रदेशों से भी श्रद्धालु यहां दर्शन-पूजन के लिए पहुंचते हैं। मान्यता है कि सच्चे मन से पूजा करने वाले भक्तों की भगवान शिव मनोकामनाएं पूरी करते हैं। बुजुर्गों के अनुसार, हरि सागर में कभी पत्थर की गाय तैरती हुई दिखाई देती थी, जिसे बाद में पत्थर काटने वालों ने खंडित कर दिया। इसे लेकर भी क्षेत्र में कई किंवदंतियां प्रचलित हैं। ऋषि पंचमी से यहां 15 दिनों तक मेला भी लगना शुरू हो जाता है।
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बामदेव तपोस्थली में दर्शन के लिए उमड़ी भीड़:सावन के अंतिम सोमवार को भक्तों ने किया जलाभिषेक, बम -बम भोले के जयकारे लगाए