बंदरों के बढ़ते आतंक पर हाइकोर्ट ने दिए सख्त आदेश:जिलाधिकारी की अध्यक्षता में बने निगरानी समिति, जरूरत पड़ी तो मारने की भी अनुमति


प्रदेश में बढ़ते मानव-बंदर संघर्ष को नियंत्रित करने के लिए सरकार ने सख्त कदम उठाए हैं। इलाहाबाद उच्च न्यायालय के निर्देशों के अनुपालन में तैयार अंतरिम कार्ययोजना के तहत अब अत्यधिक प्रभावित क्षेत्रों में सीमित अवधि के लिए बंदरों को मारने की अनुमति भी दी जा सकेगी। इस संबंध में प्रधान मुख्य वन संरक्षक सुनील चौधरी ने सभी संबंधित अधिकारियों को निर्देश जारी किए हैं। तीन स्तर पर बनेगी रणनीति सरकार की इस कार्ययोजना में तात्कालिक, निरोधात्मक और दीर्घकालीन उपाय शामिल किए गए हैं। इसका उद्देश्य बंदरों से होने वाली घटनाओं पर तुरंत नियंत्रण के साथ-साथ स्थायी समाधान तैयार करना है। ज्यादा प्रभावित इलाकों में सख्त कदम दीर्घकालीन उपायों के तहत जिन क्षेत्रों में बंदरों का आतंक अधिक है, वहां सीमित समय के लिए उन्हें मारने की अनुमति देने का प्रावधान किया गया है। इसके अलावा बंदरों की बढ़ती संख्या को नियंत्रित करने के लिए तकनीकी उपाय भी लागू किए जाएंगे। कुछ मामलों में पकड़े गए बंदरों को रेस्क्यू सेंटर में आजीवन रखने की व्यवस्था भी की जाएगी। एक महीने में सर्वे और नोडल अधिकारी तैनात तात्कालिक कार्रवाई के तहत सभी नगर निगम, नगर पालिका और नगर पंचायतों को निर्देश दिए गए हैं कि वे एक महीने के भीतर प्रभावित क्षेत्रों की पहचान करें और बंदरों की संख्या का आकलन करें। साथ ही सूचना के आदान-प्रदान के लिए नोडल अधिकारी नियुक्त किए जाएंगे। हेल्पलाइन और पकड़ने वालों का पंजीकरण जनता की सुविधा के लिए हेल्पलाइन नंबर जारी कर उसका व्यापक प्रचार किया जाएगा। इसके साथ ही बंदरों को पकड़ने में दक्ष व्यक्तियों और संस्थाओं का पंजीकरण अनिवार्य किया गया है, ताकि जरूरत पड़ने पर त्वरित कार्रवाई की जा सके। जनजागरूकता और कूड़ा प्रबंधन पर जोर योजना में जनजागरूकता अभियान, लक्ष्य आधारित संपर्क कार्यक्रम और बेहतर कूड़ा प्रबंधन को भी प्राथमिकता दी गई है। साथ ही धार्मिक कारणों से बंदरों को भोजन कराने के लिए नगरीय निकायों द्वारा निर्धारित स्थान तय किए जाएंगे, ताकि अनियंत्रित भीड़ और घटनाओं को रोका जा सके। जिलाधिकारी की अध्यक्षता में निगरानी समिति मानव-वन्यजीव संघर्ष की निगरानी के लिए जिलाधिकारी की अध्यक्षता में समिति गठित की जाएगी। इसमें वन विभाग, पुलिस, पशुपालन और स्थानीय निकायों के अधिकारी शामिल होंगे। सभी वन अधिकारियों को निर्देश दिए गए हैं कि वे समय-समय पर प्रगति रिपोर्ट जिलाधिकारी और उच्च अधिकारियों को उपलब्ध कराएं।

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